व्हाइट हाउस

एच-1बी वीजा शुल्क विवाद पर व्हाइट हाउस का बचाव,अदालत के फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन ने दी अपील की चेतावनी

वॉशिंगटन,9 जून (युआईटीवी)- अमेरिका में एच-1बी वीजा को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी बहस तेज हो गई है। अमेरिकी संघीय अदालत द्वारा एच-1बी वीजा आवेदनों पर लगाए गए अतिरिक्त एक लाख डॉलर के शुल्क को रद्द किए जाने के बाद व्हाइट हाउस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति का जोरदार बचाव किया है। प्रशासन का कहना है कि राष्ट्रपति के पास राष्ट्रीय हित के आधार पर विदेशी नागरिकों के प्रवेश को नियंत्रित करने का स्पष्ट कानूनी अधिकार है और इसी अधिकार का उपयोग करते हुए यह कदम उठाया गया था। वहीं अदालत ने इस नीति को गैर-कानूनी करार देते हुए कहा है कि प्रशासन ने कांग्रेस की अनुमति के बिना एक नया कर लागू करने की कोशिश की,जो संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।

इस मामले ने न केवल अमेरिका की आव्रजन नीति को लेकर बहस को फिर से जीवित कर दिया है,बल्कि राष्ट्रपति और न्यायपालिका के बीच अधिकारों की सीमाओं पर भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत के फैसले के कुछ ही घंटों बाद व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट किया कि प्रशासन अपने फैसले को सही मानता है और कानूनी लड़ाई जारी रखेगा।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप के पास यह अधिकार है कि वे उन विदेशी नागरिकों के प्रवेश को सीमित या प्रतिबंधित कर सकें जिन्हें वह अमेरिका के सर्वोत्तम हित में नहीं मानते। उनके अनुसार एच-1बी वीजा कार्यक्रम का वर्षों से दुरुपयोग किया जाता रहा है और प्रशासन का उद्देश्य इस व्यवस्था में सुधार लाना था। उन्होंने यह भी कहा कि पहले भी एक संघीय न्यायाधीश इसी तरह के एक आदेश को वैध ठहरा चुके हैं और प्रशासन को विश्वास है कि अपील के बाद वर्तमान फैसला पलट सकता है।

हालाँकि,व्हाइट हाउस ने यह स्पष्ट नहीं किया कि अदालत के आदेश के खिलाफ औपचारिक अपील कब दायर की जाएगी। इसके बावजूद प्रशासन के अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि वे इस नीति का बचाव जारी रखेंगे। उनका मानना है कि यह कदम अमेरिकी श्रमिकों के हितों की रक्षा करने और एच-1बी वीजा कार्यक्रम में अधिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।

विवाद की शुरुआत उस समय हुई थी,जब सितंबर 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक उद्घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे। इस नीति के तहत नई एच-1बी याचिकाएँ दाखिल करने वाले नियोक्ताओं के लिए एक लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क अनिवार्य कर दिया गया था। प्रशासन का तर्क था कि इस अतिरिक्त लागत से केवल वही कंपनियाँ विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करेंगी जिन्हें वास्तव में उनकी आवश्यकता है। इसके जरिए घरेलू रोजगार बाजार की रक्षा करने और अमेरिकी नागरिकों को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी।

लेकिन इस नीति को कई उद्योग संगठनों,तकनीकी कंपनियों और आव्रजन विशेषज्ञों ने चुनौती दी। उनका कहना था कि इतनी बड़ी अतिरिक्त लागत न केवल कंपनियों पर आर्थिक बोझ डालेगी,बल्कि अमेरिका की वैश्विक प्रतिभाओं को आकर्षित करने की क्षमता को भी प्रभावित करेगी। कई याचिकाओं के बाद यह मामला अदालत तक पहुँचा, जहाँ इसकी वैधता की जाँच की गई।

मैसाचुसेट्स के अमेरिकी जिला न्यायाधीश लियो टी. सोरोकिन ने अपने विस्तृत फैसले में प्रशासन की नीति को असंवैधानिक और अवैध बताया। उन्होंने कहा कि अदालत का मानना है कि यह नीति वास्तव में एच-1बी याचिकाओं पर एक नया कर लगाने का प्रयास है। चूँकि,कांग्रेस ने ऐसा कोई अधिकार प्रशासन को नहीं दिया था,इसलिए यह कदम कानूनी रूप से टिक नहीं सकता।

न्यायाधीश ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अमेरिका के संविधान के तहत कर लगाने की शक्ति कांग्रेस के पास होती है। उन्होंने कहा कि प्रशासन द्वारा जिन आव्रजन कानूनों का हवाला दिया गया,वे राष्ट्रपति को विदेशी नागरिकों के प्रवेश संबंधी नियम बनाने का अधिकार तो देते हैं,लेकिन नए कर लगाने का अधिकार नहीं प्रदान करते। अदालत ने प्रशासन की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि यह शुल्क आव्रजन नियंत्रण की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

फैसले में यह भी कहा गया कि केवल किसी शुल्क को आव्रजन प्रतिबंध का हिस्सा बताने से उसकी कानूनी प्रकृति नहीं बदल जाती। यदि किसी भुगतान का उद्देश्य राजस्व एकत्र करना है और वह कांग्रेस की अनुमति के बिना लगाया गया है,तो उसे कर ही माना जाएगा। न्यायाधीश ने इस आधार पर पूरी नीति को अमान्य घोषित करते हुए उसे पूरे देश में लागू होने से रोक दिया।

अदालत ने उन सरकारी एजेंसियों की भी आलोचना की जो इस नीति को लागू करने में शामिल थीं। फैसले में कहा गया कि एजेंसियाँ अपने वैधानिक अधिकारों से आगे बढ़ गई थीं और उन्होंने उचित प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया। न्यायाधीश ने यह भी सवाल उठाया कि नियोक्ताओं पर इतनी बड़ी अतिरिक्त लागत डालने के लिए पर्याप्त और स्पष्ट तर्क क्यों नहीं दिए गए।

इस फैसले का सबसे अधिक प्रभाव तकनीकी उद्योग और उन कंपनियों पर पड़ सकता है,जो बड़ी संख्या में विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करती हैं। एच-1बी वीजा कार्यक्रम लंबे समय से अमेरिकी तकनीकी क्षेत्र,स्वास्थ्य सेवाओं,इंजीनियरिंग और अन्य विशेष क्षेत्रों में कुशल कर्मचारियों की जरूरतों को पूरा करने का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। भारत सहित कई देशों के पेशेवर इस वीजा कार्यक्रम के जरिए अमेरिका में रोजगार प्राप्त करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का फैसला फिलहाल उन कंपनियों और विदेशी पेशेवरों के लिए राहत लेकर आया है,जो अतिरिक्त शुल्क के कारण चिंतित थे। हालाँकि,यदि प्रशासन अपील करता है और उच्च अदालतें इस मामले पर अलग राय देती हैं,तो भविष्य में स्थिति फिर बदल सकती है।

राजनीतिक दृष्टि से भी यह मामला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ट्रंप प्रशासन लंबे समय से सख्त आव्रजन नीतियों का समर्थन करता रहा है और एच-1बी कार्यक्रम में बदलाव उसके प्रमुख एजेंडों में शामिल रहा है। दूसरी ओर,आलोचकों का कहना है कि ऐसे कदम अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को नुकसान पहुँचा सकते हैं और वैश्विक प्रतिभाओं को अन्य देशों की ओर आकर्षित कर सकते हैं।

फिलहाल संघीय अदालत का फैसला लागू है और एक लाख डॉलर का अतिरिक्त एच-1बी शुल्क रद्द कर दिया गया है,लेकिन व्हाइट हाउस के तेवरों से साफ है कि यह कानूनी और राजनीतिक संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। आने वाले समय में अपील प्रक्रिया और उच्च अदालतों की सुनवाई यह तय करेगी कि राष्ट्रपति की आव्रजन शक्तियों की सीमा क्या है और एच-1बी वीजा कार्यक्रम का भविष्य किस दिशा में आगे बढ़ेगा।