नई दिल्ली,12 मार्च (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अब पर्यावरण और स्वास्थ्य संकट की आशंका भी गहराने लगी है। हाल ही में ईरान के तेल प्रतिष्ठानों और ऊर्जा ढांचे पर हुए हमलों के बाद कुछ इलाकों में “ब्लैक रेन” यानी काली बारिश की घटनाओं की रिपोर्ट सामने आई है। इस स्थिति को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने गंभीर चेतावनी जारी की है। संगठन का कहना है कि तेल प्रतिष्ठानों में लगी आग और उससे उठने वाले जहरीले धुएँ के कारण वातावरण में खतरनाक रसायन फैल सकते हैं,जिससे लोगों को सांस संबंधी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
डब्ल्यूएचओ ने ईरानी अधिकारियों द्वारा जारी उस एडवाइजरी का समर्थन किया है,जिसमें नागरिकों से एहतियात के तौर पर घरों के अंदर रहने की अपील की गई है। संगठन ने कहा है कि मौजूदा हालात को देखते हुए लोगों का घरों के अंदर रहना और बाहरी गतिविधियों को सीमित करना स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र की यह स्वास्थ्य एजेंसी ईरान में भी सक्रिय है और आपातकालीन स्वास्थ्य स्थितियों में स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर काम करती है।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार हाल के दिनों में उसे कई ऐसी रिपोर्ट मिली हैं,जिनमें बारिश के साथ तेल जैसे काले पदार्थ गिरने की बात कही गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति तब पैदा होती है,जब तेल रिफाइनरियों या भंडारण स्थलों में लगी आग से निकलने वाला धुआँ और कार्बन कण वातावरण में फैलकर बादलों के साथ मिल जाते हैं और बाद में बारिश के साथ जमीन पर गिरते हैं। इस प्रकार की बारिश को आम तौर पर “ब्लैक रेन” कहा जाता है।
मौजूदा संकट की पृष्ठभूमि में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर किए जा रहे सैन्य हमलों को एक बड़ा कारण माना जा रहा है। हाल ही में राजधानी तेहरान के पास स्थित एक तेल रिफाइनरी पर हुए हमले के बाद आसमान में काले धुएँ का विशाल गुबार देखा गया था। इस घटना के बाद से आसपास के क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ गई है और लोगों के स्वास्थ्य पर इसके संभावित प्रभावों को लेकर चेतावनियाँ जारी की जा रही हैं।
जिनेवा में आयोजित एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान डब्ल्यूएचओ के प्रवक्ता क्रिश्चियन लिंडमीयर ने कहा कि ब्लैक रेन और उससे जुड़ी एसिडिक बारिश वास्तव में लोगों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। उन्होंने बताया कि ऐसे हालात विशेष रूप से उन लोगों के लिए अधिक जोखिम पैदा करते हैं,जिन्हें पहले से ही सांस संबंधी बीमारियाँ हैं,जैसे अस्थमा या फेफड़ों की अन्य समस्याएँ।
लिंडमेयर ने कहा कि ईरान के अधिकारियों द्वारा नागरिकों को घरों के अंदर रहने और अनावश्यक रूप से बाहर न निकलने की जो सलाह दी गई है,वह वर्तमान परिस्थितियों में पूरी तरह उचित है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के पर्यावरणीय संकट में लोगों को सतर्क रहना और स्वास्थ्य संबंधी दिशानिर्देशों का पालन करना बेहद जरूरी होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार तेल रिफाइनरियों और भंडारण स्थलों में आग लगने पर बड़ी मात्रा में जहरीले रसायन वातावरण में फैल जाते हैं। इनमें हाइड्रोकार्बन,सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन यौगिक जैसे कई खतरनाक पदार्थ शामिल होते हैं। जब ये रसायन हवा में मौजूद नमी और बादलों के संपर्क में आते हैं,तो वे अम्लीय या जहरीली बारिश का रूप ले सकते हैं।
इन रसायनों के संपर्क में आने से कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे प्रदूषित कणों को सांस के जरिए शरीर के अंदर लेने से सिरदर्द,चक्कर आना,आँखों में जलन और त्वचा में खुजली जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। इसके अलावा कई लोगों को सांस लेने में कठिनाई और फेफड़ों में जलन जैसी शिकायतें भी हो सकती हैं।
वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि लोग लंबे समय तक इन जहरीले रसायनों के संपर्क में रहते हैं तो इससे गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। कुछ रासायनिक यौगिकों को कैंसर जैसी घातक बीमारियों से भी जोड़ा जाता है। इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे हालात में सावधानी बरतना और स्वास्थ्य सुरक्षा के उपाय अपनाना अत्यंत आवश्यक है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने नागरिकों को सलाह दी है कि वे जितना संभव हो सके घरों के अंदर रहें और बाहर जाने से बचें। यदि किसी कारण से बाहर निकलना जरूरी हो तो मास्क पहनना चाहिए और शरीर को पूरी तरह ढककर रखना चाहिए,ताकि त्वचा का जहरीले कणों के संपर्क में आना कम से कम हो सके। इसके अलावा घरों के अंदर साफ हवा बनाए रखने के लिए खिड़कियाँ बंद रखने और एयर फिल्टर का उपयोग करने की भी सलाह दी गई है।
हालाँकि,इस समय क्षेत्र में वायु गुणवत्ता से संबंधित विस्तृत और आधिकारिक आँकड़ें उपलब्ध नहीं हैं,जिससे स्थिति की पूरी गंभीरता का आकलन करना थोड़ा मुश्किल हो रहा है। फिर भी पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि तेल प्रतिष्ठानों में लगी आग और उससे उठने वाला धुआँ निश्चित रूप से आसपास के इलाकों की हवा को प्रभावित कर सकता है।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार सप्ताह के बाकी दिनों में सूखे हालात रहने की संभावना है। अगर बारिश कम होती है और हवा की दिशा बदलती है तो धीरे-धीरे प्रदूषित कण वातावरण से हट सकते हैं और हवा की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। हालाँकि,यह प्रक्रिया समय ले सकती है और तब तक लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि युद्ध और सैन्य संघर्ष केवल राजनीतिक या रणनीतिक मुद्दा नहीं होते,बल्कि उनका असर आम नागरिकों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले जारी रहते हैं,तो इससे न केवल पर्यावरणीय संकट गहरा सकता है,बल्कि लाखों लोगों के स्वास्थ्य पर भी दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और स्वास्थ्य संगठनों की नजर इस स्थिति पर बनी हुई है। डब्ल्यूएचओ और अन्य एजेंसियां स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर हालात की निगरानी कर रही हैं और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराने की तैयारी भी कर रही हैं। फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि प्रभावित इलाकों के लोग सुरक्षित रहें और संभावित स्वास्थ्य जोखिमों से बच सकें।
