वाशिंगटन,7 अप्रैल (युआईटीवी)- पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़े और बेहद जोखिम भरे अमेरिकी रेस्क्यू ऑपरेशन का खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि ईरान के भीतर फँसे दो अमेरिकी पायलटों को बचाने के लिए 100 से ज्यादा विमानों को शामिल करते हुए एक विशाल हवाई अभियान चलाया गया,जिसे हाल के वर्षों के सबसे कठिन लड़ाकू खोज और बचाव मिशनों में गिना जा रहा है। इस ऑपरेशन ने न केवल अमेरिकी सैन्य क्षमता को प्रदर्शित किया,बल्कि दुश्मन के इलाके में भी अपने सैनिकों को सुरक्षित वापस लाने की अमेरिका की नीति को एक बार फिर मजबूती से सामने रखा।
यह पूरा घटनाक्रम उस समय शुरू हुआ जब एफ-15ई फाइटर जेट ईरान के खिलाफ चल रहे ऑपरेशन के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह हादसा तथाकथित “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के तहत गुरुवार देर रात हुआ,जिसमें जेट के दोनों क्रू मेंबर को इमरजेंसी इजेक्शन करना पड़ा। दोनों पायलट ईरानी क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर जा गिरे,जिससे उनकी स्थिति और अधिक गंभीर हो गई। दुश्मन के इलाके में गिरने के कारण उनके पकड़े जाने या मारे जाने का खतरा लगातार बना हुआ था।
ट्रंप ने व्हाइट हाउस में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि दुर्घटना के तुरंत बाद अमेरिकी सेना ने तेजी से प्रतिक्रिया देते हुए एक बड़े पैमाने पर रेस्क्यू मिशन शुरू किया। उन्होंने कहा, “कुछ ही घंटों में हमारी सेना ने दुश्मन के एयरस्पेस में 21 सैन्य विमान तैनात कर दिए। हमें भारी फायरिंग का सामना करना पड़ा और हम ईरान के ऊपर दिन में सात घंटे तक उड़ान भरते रहे।” यह बयान इस मिशन की जटिलता और जोखिम को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
इस ऑपरेशन के शुरुआती चरण में एक पायलट को कुछ ही घंटों के भीतर खोज लिया गया और सुरक्षित निकाल लिया गया। हालाँकि,दूसरा पायलट,जो एक वेपन सिस्टम ऑफिसर था,लापता हो गया और उसकी तलाश एक बड़ी चुनौती बन गई। वह गंभीर रूप से घायल था और क्रैश साइट से काफी दूर जाकर गिरा था,जहाँ वह दुश्मन के बीच घिरा हुआ था। ट्रंप ने बताया कि वह “आतंकवादियों से भरे इलाके” में फँसा हुआ था और पकड़े जाने से बचने के लिए उसे ऊबड़-खाबड़ और खतरनाक इलाके से गुजरना पड़ा।
इस स्थिति ने अमेरिकी सेना को और अधिक आक्रामक और व्यापक रेस्क्यू मिशन शुरू करने के लिए मजबूर किया। दूसरे चरण में इस ऑपरेशन का दायरा तेजी से बढ़ाया गया और कुल 155 विमानों को इसमें शामिल किया गया। इनमें चार बॉम्बर,64 फाइटर जेट,48 रिफ्यूलिंग टैंकर और 13 विशेष रेस्क्यू एयरक्राफ्ट शामिल थे। इस स्तर का सैन्य अभियान यह दर्शाता है कि अमेरिका अपने सैनिकों को बचाने के लिए किस हद तक जाने को तैयार है।
डैन केन,जो ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन हैं, ने बताया कि इजेक्शन के बाद दोनों पायलट पूरी तरह अलग-थलग हो गए थे। इस वजह से उनके सुरक्षित रेस्क्यू के लिए तत्काल कार्रवाई जरूरी थी। उन्होंने कहा कि पहला पायलट दिन के उजाले में बचाया गया,जबकि दूसरा पायलट लगातार खतरे में बना रहा और उसे बचाने के लिए विशेष रणनीति अपनानी पड़ी।
इस मिशन में जॉन रैटक्लिफ के नेतृत्व में सीआईए ने भी अहम भूमिका निभाई। रैटक्लिफ ने इसे “समय के खिलाफ एक दौड़” बताया और कहा कि पायलट को ढूँढ़ना“रेगिस्तान में रेत के एक कण को खोजने” जैसा था। उन्होंने बताया कि एजेंसी ने मानव संसाधनों और अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए न केवल पायलट की लोकेशन का पता लगाया,बल्कि ईरानी खोज टीमों को भ्रमित करने के लिए एक विशेष अभियान भी चलाया।
जब दूसरे पायलट की सटीक स्थिति का पता चल गया,तो अमेरिकी सेना ने रात के अंधेरे में अंतिम रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। पीट हेगसेथ ने इस मिशन को “हाई रिस्क और हाई स्टेक्स” वाला बताया। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन दुश्मन के इलाके के बीचोंबीच किया गया,जहाँ हर कदम पर खतरा था। घायल पायलट ने अपना बीकन एक्टिवेट करते हुए एक छोटा सा संदेश भेजा—“गॉड इज गुड”—जो उसके जीवित होने और उम्मीद बनाए रखने का संकेत था।
रेस्क्यू के दौरान ए-10 सपोर्ट प्लेन और ड्रोन ने दुश्मन बलों से मुकाबला किया,जबकि हेलीकॉप्टर पायलट को निकालने के लिए आगे बढ़े। इस दौरान एक अमेरिकी विमान पर भारी फायरिंग हुई और उसे बाद में सुरक्षित क्षेत्र में छोड़ना पड़ा। वहीं,पहले चरण के रेस्क्यू में शामिल कुछ हेलीकॉप्टरों में आग लगने की भी घटना सामने आई,हालाँकि पायलटों को केवल मामूली चोटें आईं।
इन सभी चुनौतियों के बावजूद,अमेरिकी सेना ने बिना किसी जान-माल के नुकसान के इस मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया। हेगसेथ ने कहा, “किसी भी अमेरिकी की जान नहीं गई,” जो इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है। ट्रंप ने भी इस मिशन की सराहना करते हुए कहा कि यह अमेरिकी सैन्य इतिहास के सबसे साहसिक अभियानों में से एक है।
हालाँकि,ट्रंप ने यह भी खुलासा किया कि कुछ सैन्य अधिकारियों ने इस मिशन का विरोध किया था। उनका मानना था कि इतने बड़े जोखिम के चलते सैकड़ों लोगों की जान जा सकती है। ट्रंप ने कहा, “कुछ अधिकारियों ने कहा कि ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए,” लेकिन उन्होंने अंततः इस मिशन को हरी झंडी दी और इसे अंजाम तक पहुँचाया गया।
इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका को लेकर भी ट्रंप ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि पायलट के लापता होने की खबरें सामने आने के बाद ईरानी अधिकारी सतर्क हो गए और उन्होंने बड़े पैमाने पर खोज अभियान शुरू कर दिया। ट्रंप के मुताबिक, “पूरा ईरान जानता था कि एक पायलट अपनी जान के लिए लड़ रहा है,” जिससे मिशन और अधिक कठिन हो गया।
अधिकारियों के अनुसार,हाल के हफ्तों में ईरान के खिलाफ चलाए गए अमेरिकी अभियानों का पैमाना बेहद बड़ा रहा है। इसमें 10,000 से ज्यादा फाइटर जेट मिशन और 13,000 से अधिक हमले शामिल हैं। ट्रंप ने इसे “अभूतपूर्व” बताते हुए कहा कि यह अमेरिका की सैन्य ताकत और रणनीतिक क्षमता का प्रमाण है।
इस मिशन के दौरान एफ-15ई फाइटर जेट का गिराया जाना इस पूरे अभियान में पहला ऐसा मामला था,जिसमें किसी मानवयुक्त विमान को नुकसान हुआ। यह घटना इस बात का संकेत भी देती है कि ईरान के साथ संघर्ष किस स्तर तक पहुँच चुका है।
अमेरिका की सैन्य नीति लंबे समय से यह रही है कि वह अपने सैनिकों को किसी भी कीमत पर दुश्मन के इलाके से सुरक्षित वापस लाता है। यह सिद्धांत वियतनाम युद्ध से लेकर इराक युद्ध और अफगानिस्तान युद्ध तक की लड़ाइयों में लगातार देखा गया है। ऐसे मिशन बेहद जटिल होते हैं और इनमें हवाई,जमीनी और खुफिया एजेंसियों के बीच सटीक तालमेल की आवश्यकता होती है।
वर्तमान परिदृश्य में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कई दशकों से चला आ रहा है। यह विवाद मुख्य रूप से ईरान के परमाणु कार्यक्रम,क्षेत्रीय प्रभाव और सैन्य गतिविधियों को लेकर है। हाल के घटनाक्रमों ने इस तनाव को और बढ़ा दिया है,जिससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता का माहौल बना हुआ है।
यह रेस्क्यू ऑपरेशन न केवल सैन्य दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है,बल्कि यह अमेरिका की उस प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है,जिसमें वह अपने सैनिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। हालाँकि,इस तरह के अभियानों के साथ जुड़े जोखिम और संभावित परिणाम भी उतने ही गंभीर होते हैं,जो भविष्य में क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा पर गहरा असर डाल सकते हैं।
