नई दिल्ली,18 फरवरी (युआईटीवी)- महाराष्ट्र में मुस्लिम समुदाय को दिए जाने वाले पाँच प्रतिशत आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गया है। राज्य के सामाजिक न्याय विभाग द्वारा हाल ही में जारी आदेश के बाद यह विवाद तेज हो गया है। इस निर्णय के खिलाफ कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद वर्षा गायकवाड़ ने राज्य की सरकार पर लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने और सामाजिक न्याय की भावना के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया है।
विवाद की शुरुआत तब हुई,जब मंगलवार देर रात महाराष्ट्र सरकार के सामाजिक न्याय विभाग की ओर से एक आदेश जारी किया गया,जिसमें स्पष्ट किया गया कि मुस्लिम समुदाय को अब पाँच प्रतिशत आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। हालाँकि,कानूनी दृष्टि से यह आरक्षण पिछले लगभग एक दशक से अमान्य था,लेकिन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा इस विषय को औपचारिक रूप से समाप्त करने के कदम ने इसे फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
वर्षा गायकवाड़ ने बुधवार को मीडिया से बातचीत में कहा कि भाजपा की अगुवाई वाली सरकार का यह फैसला लोकतंत्र और समान अवसरों की अवधारणा के खिलाफ है। उनका कहना है कि इस निर्णय से मुस्लिम समाज मुख्यधारा से और दूर हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के बजाय उन्हें हाशिए पर धकेलने का काम कर रही है। गायकवाड़ ने यह भी कहा कि एक ओर भाजपा ‘सबका साथ,सबका विकास’ का नारा देती है,लेकिन दूसरी ओर आरक्षण से जुड़े आवश्यक दस्तावेजों और प्रक्रियाओं को आगे नहीं बढ़ने देती।
मुंबई नॉर्थ-सेंट्रल से सांसद गायकवाड़ ने इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के पुराने फैसले का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अदालत ने मुस्लिम समुदाय को शिक्षा में पाँच प्रतिशत आरक्षण को बरकरार रखा था,लेकिन राज्य सरकार ने इसे पूरी तरह लागू नहीं किया। उनके मुताबिक सरकार ने हाईकोर्ट के अंतरिम स्थगन आदेश और अध्यादेश की अवधि समाप्त होने का हवाला देकर पहले की पूरी प्रक्रिया को ही रद्द कर दिया। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने जानबूझकर इस मामले को आगे नहीं बढ़ाया और अब औपचारिक आदेश जारी कर इसे समाप्त करने की कोशिश की है।
गायकवाड़ ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की भूमिका पर भी सवाल उठाए और उनसे इस फैसले पर स्पष्ट जवाब देने की माँग की। उन्होंने राज्य की सहयोगी पार्टियों,विशेष रूप से शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी),से भी अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। कांग्रेस का कहना है कि यह आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं,बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था। इसलिए इसे केवल धार्मिक दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं है।
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि साल 2014 से जुड़ी है। उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सरकार ने मुस्लिम समुदाय को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में पांच प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की थी। इस निर्णय के तहत मुस्लिम समुदाय को विशेष पिछड़ा वर्ग-ए (एसबीसी-ए) श्रेणी में शामिल किया गया था,ताकि वे सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ ले सकें। हालाँकि,इस अध्यादेश को अदालत में चुनौती दी गई और 14 नवंबर 2014 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी। तब से यह आदेश प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाया।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि हाईकोर्ट के अंतरिम स्थगन आदेश के बाद राज्य सरकार को मामले में ठोस कानूनी आधार तैयार करना चाहिए था,लेकिन ऐसा नहीं किया गया। दूसरी ओर भाजपा का तर्क है कि चूँकि अध्यादेश की अवधि समाप्त हो चुकी थी और अदालत ने उस पर रोक लगा दी थी,इसलिए इसे जारी रखना संभव नहीं था। सरकार के समर्थकों का कहना है कि आरक्षण का आधार संविधान के अनुरूप होना चाहिए और केवल धार्मिक पहचान के आधार पर आरक्षण देना न्यायसंगत नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में और गरमा सकता है। महाराष्ट्र की राजनीति में सामाजिक न्याय और आरक्षण जैसे मुद्दे हमेशा संवेदनशील रहे हैं। मुस्लिम समुदाय राज्य की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और शहरी क्षेत्रों में उनकी राजनीतिक भागीदारी भी प्रभावशाली है। ऐसे में इस निर्णय का राजनीतिक असर पड़ना तय माना जा रहा है।
वर्षा गायकवाड़ ने अपने बयान में कहा कि भाजपा की मानसिकता आरक्षण विरोधी रही है और यह फैसला उसी सोच को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सामाजिक न्याय की पक्षधर रही है और पिछड़े वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करती रहेगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस इस मुद्दे को विधानसभा और संसद दोनों स्तरों पर उठाएगी।
फिलहाल यह मामला राजनीतिक बयानबाजी और कानूनी व्याख्याओं के बीच उलझा हुआ है। जहाँ एक ओर भाजपा सरकार इसे कानूनी प्रक्रिया का पालन बताती है,वहीं कांग्रेस इसे सामाजिक न्याय के खिलाफ कदम करार दे रही है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस मुद्दे पर कोई नई कानूनी या राजनीतिक पहल सामने आती है या फिर यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित रह जाता है। इतना निश्चित है कि मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर प्रमुख चर्चा का विषय बन गया है।
