कोलकाता,2 अप्रैल (युआईटीवी)- पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की गंभीर घटना ने राज्य की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों को हिला दिया है। इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ा रुख अपनाते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने राज्य के पुलिस महानिदेशक से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। यह घटना कालियाचक क्षेत्र में उस समय हुई जब मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर नाराज लोगों के एक समूह ने सात न्यायिक अधिकारियों को करीब नौ घंटे तक बंधक बनाकर रखा।
जानकारी के अनुसार,यह घटना मालदा जिले के कालियाचक इलाके में बुधवार को सामने आई,जहाँ मतदाताओं के एक समूह ने “तार्किक विसंगति” श्रेणी के तहत अपने नाम हटाए जाने का विरोध करते हुए न्यायिक प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों को घेर लिया। इस दौरान तीन महिला अधिकारियों सहित कुल सात लोगों को प्रदर्शनकारियों ने बंधक बना लिया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि अधिकारियों को वहाँ से सुरक्षित निकालने के लिए बड़े पैमाने पर पुलिस बल तैनात करना पड़ा।
गुरुवार तड़के जिला पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के नेतृत्व में एक विशेष अभियान चलाया गया,जिसके बाद सभी न्यायिक अधिकारियों को प्रदर्शनकारियों के चंगुल से मुक्त कराया गया। बताया जा रहा है कि इन अधिकारियों को करीब नौ घंटे तक घेराव में रखा गया था। इतना ही नहीं,जब उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाया जा रहा था,तब भी काफिले पर हमले का प्रयास किया गया,जिससे स्थिति की संवेदनशीलता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
इस घटना के दौरान प्रदर्शनकारियों के एक अन्य समूह ने कालियाचक ब्लॉक-I के पास राष्ट्रीय राजमार्ग को भी जाम कर दिया था,जिससे यातायात पूरी तरह बाधित हो गया। हालाँकि,बाद में प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को समझाने में सफलता हासिल की और यह आश्वासन दिया कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं,उन्हें जल्द-से-जल्द पुनः शामिल करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने नाकाबंदी हटा ली।
इस पूरी घटना ने चुनावी प्रक्रिया और कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव आयोग ने इसे अत्यंत गंभीर मामला मानते हुए राज्य सरकार से पूरी रिपोर्ट माँगी है,ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों। आयोग का मानना है कि चुनावी प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और इसमें किसी प्रकार की चूक बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
घटना के बाद राज्य की राजनीति भी गर्मा गई है। सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी भारतीय जनता पार्टी के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। भाजपा ने इस घटना के लिए राज्य सरकार और मुख्यमंत्री को जिम्मेदार ठहराया है,जबकि तृणमूल कांग्रेस ने इसका ठीकरा चुनाव आयोग के सिर फोड़ा है।
केंद्रीय शिक्षा राज्यमंत्री और भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार ने इस घटना की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह स्थिति मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी द्वारा चुनाव आयोग के खिलाफ दिए जा रहे भड़काऊ बयानों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) एक अखिल भारतीय प्रक्रिया है और अन्य राज्यों में इसे लेकर कोई विवाद नहीं है,लेकिन पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी दल इसे बाधित करने की कोशिश कर रहा है।
मजूमदार ने यह भी कहा कि राज्य में प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह से निष्पक्ष तरीके से काम नहीं कर पा रहा है और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उनके अनुसार,इस तरह की घटनाएँ लोकतंत्र के लिए खतरा हैं और इन्हें सख्ती से रोकने की जरूरत है।
वहीं,तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों का जोरदार खंडन किया है। पार्टी के प्रदेश महासचिव कुणाल घोष ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है और इसमें किसी प्रकार की चूक आयोग की ओर से हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी कानून को अपने हाथ में लेने में विश्वास नहीं रखती और किसी भी प्रकार की हिंसा या अराजकता का समर्थन नहीं करती।
कुणाल घोष ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाए जाने का शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रही है,लेकिन जो लोग इस तरह की हिंसक गतिविधियों में शामिल हैं,वे भाजपा समर्थित अन्य छोटे दलों से जुड़े हो सकते हैं। उन्होंने इशारों में कुछ क्षेत्रीय दलों की ओर भी संकेत किया,हालाँकि उन्होंने किसी का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया।
इस घटना ने पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया है। एक ओर जहाँ मतदाता सूची में नाम हटाए जाने को लेकर असंतोष बढ़ रहा है,वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दल इस मुद्दे को लेकर एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में राज्य में चुनावी माहौल और अधिक गरमाने वाला है।
प्रशासन के लिए यह घटना एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है,क्योंकि उसे एक ओर कानून-व्यवस्था बनाए रखनी है,वहीं दूसरी ओर निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी निभानी है। चुनाव आयोग द्वारा माँगी गई रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी,जिससे यह स्पष्ट होगा कि इस मामले में किस स्तर पर चूक हुई और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कदम उठाए जाएँगे।
मालदा की यह घटना केवल एक कानून-व्यवस्था का मामला नहीं है,बल्कि यह चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है। ऐसे में सभी की नजरें अब चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं,जो इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी।
