नई दिल्ली,11 अप्रैल (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गया है। अमेरिका और इजरायल द्वारा कथित सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान ने इस रणनीतिक जलमार्ग को बंद करने का कदम उठाया है और अब इसे दोबारा खोलने के लिए टोल वसूलने का प्रस्ताव रखा है। हालाँकि,विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव न केवल अव्यावहारिक है,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानूनों के भी खिलाफ है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गिना जाता है,जहाँ से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में इस जलमार्ग का बंद होना या उस पर किसी तरह का शुल्क लगाना वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर सीधा असर डाल सकता है। यही वजह है कि ईरान के इस प्रस्ताव ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में चिंता पैदा कर दी है।
संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानून संयुक्त राष्ट्र के तहत लागू यूएन कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी के अनुसार,स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे समुद्री मार्गों पर ‘इनोसेंट पैसेज’ का अधिकार लागू होता है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी देश के जहाज बिना किसी रुकावट के किसी तटीय राज्य के जलक्षेत्र से होकर गुजर सकते हैं,बशर्ते वे उस देश की सुरक्षा या शांति के लिए खतरा न बनें। इस प्रावधान के तहत ऐसे जहाजों से किसी प्रकार का शुल्क लेना नियमों के विरुद्ध माना जाता है।
इनोसेंट पैसेज अंतर्राष्ट्रीय समुद्री कानून का एक मूलभूत सिद्धांत है,जिसका उद्देश्य वैश्विक व्यापार और समुद्री आवागमन को निर्बाध बनाए रखना है। हालाँकि,यूएनसीएलओएस में एक अपवाद का भी उल्लेख है,जिसके तहत यदि कोई तटीय देश जहाजों को विशेष सेवाएँ प्रदान करता है,जैसे सुरक्षा के लिए एस्कॉर्ट या अन्य सुविधाएँ,तो वह उसके बदले शुल्क ले सकता है,लेकिन वर्तमान स्थिति में यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान इस तरह की कोई सेवा प्रदान करने की स्थिति में है या नहीं।
इस बीच,अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिकी सेना ने ईरान की नौसेना को काफी हद तक कमजोर कर दिया है। उनके इस बयान ने ईरान की समुद्री सुरक्षा क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि ईरान के पास पर्याप्त नौसैनिक संसाधन नहीं हैं,तो वह जहाजों को सुरक्षा देने के नाम पर शुल्क कैसे वसूल सकता है,यह एक बड़ा प्रश्न बन गया है।
दूसरी ओर,ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने पहले संकेत दिए थे कि तेहरान ओमान के साथ मिलकर एक नया प्रोटोकॉल तैयार कर रहा है। इस प्रस्ताव के तहत स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों के लिए परमिट लेना अनिवार्य किया जा सकता है। यह कदम यदि लागू होता है,तो अंतर्राष्ट्रीय समुद्री नियमों में बड़ा बदलाव माना जाएगा।
हालाँकि,इस प्रस्ताव को लेकर ओमान ने स्पष्ट रुख अपनाया है। ओमान के परिवहन मंत्री अहमद बिन मोहम्मद अल फुतैसी ने इस तरह के किसी भी शुल्क या परमिट व्यवस्था से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक प्राकृतिक समुद्री मार्ग है और ओमान ने संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानूनों से जुड़े सभी समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, इसलिए वह किसी भी ऐसे कदम का समर्थन नहीं करेगा जो अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ हो।
इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहाँ ईरान अपनी रणनीतिक स्थिति का फायदा उठाकर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है,वहीं दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इसे कानूनों का उल्लंघन मान रहा है। यदि ईरान अपने प्रस्ताव पर अड़ा रहता है,तो इससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है और वैश्विक व्यापार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे का समाधान केवल कूटनीतिक बातचीत के जरिए ही संभव है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय,खासकर संयुक्त राष्ट्र और प्रमुख शक्तियों को इस मामले में सक्रिय भूमिका निभानी होगी,ताकि समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता बनी रहे और किसी भी तरह का टकराव टाला जा सके।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का टोल प्रस्ताव एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा बन गया है,जिसमें अंतर्राष्ट्रीय कानून,रणनीतिक हित और वैश्विक अर्थव्यवस्था तीनों ही दांव पर लगे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस विवाद का समाधान किस दिशा में जाता है और क्या अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बीच ईरान अपने रुख में बदलाव करता है या नहीं।
