आरबीआई

12 साल में सबसे बड़ी छलांग,आरबीआई की सट्टेबाजी पर सख्ती के बाद डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत

नई दिल्ली,2 अप्रैल (युआईटीवी)- भारतीय मुद्रा बाजार में गुरुवार को एक ऐतिहासिक उछाल देखने को मिला, जब भारतीय रुपया 12 साल से अधिक समय में अपनी सबसे बड़ी एकदिवसीय मजबूती के साथ उभरा। डॉलर के मुकाबले रुपया 1.7 प्रतिशत तक मजबूत होकर 93.25 के स्तर पर पहुँच गया,जो सितंबर 2013 के बाद की सबसे बड़ी तेजी मानी जा रही है। इस अप्रत्याशित मजबूती के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक की हालिया सख्त नीतियाँ प्रमुख कारण मानी जा रही हैं,जिनका उद्देश्य मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी पर लगाम लगाना है।

दरअसल,पिछले कुछ दिनों में आरबीआई ने विदेशी मुद्रा बाजार में बढ़ती अस्थिरता को देखते हुए कई अहम कदम उठाए हैं। खासतौर पर ऑफशोर डेरिवेटिव मार्केट पर प्रतिबंधों का विस्तार और बैंकों की स्थानीय मुद्रा स्थिति पर नियंत्रण ने बाजार में बड़ा असर डाला है। इन कदमों से उन निवेशकों पर दबाव बना है,जो रुपया के खिलाफ सट्टेबाजी कर रहे थे,जिससे मुद्रा में मजबूती देखने को मिली।

तीन दिन की छुट्टियों के बाद जब मुद्रा बाजार फिर से खुले,तो रुपये में यह तेजी साफ तौर पर नजर आई। बाजार 31 मार्च को महावीर जयंती, 1 अप्रैल को नए वित्त वर्ष की शुरुआत और 3 अप्रैल को गुड फ्राइडे के कारण बंद रहे थे। इस दौरान वैश्विक स्तर पर कई आर्थिक और राजनीतिक घटनाक्रम हुए,जिनका असर बाजार खुलते ही दिखा।

रुपये की मजबूती ऐसे समय में आई है,जब एशियाई क्षेत्र की अधिकांश मुद्राएँ दबाव में थीं। वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है,खासकर डोनाल्ड ट्रंप के पश्चिम एशिया को लेकर दिए गए बयानों के बाद तनाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। इस कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में निवेशकों का रुझान सतर्क बना हुआ है,जिससे कई एशियाई मुद्राओं में कमजोरी देखने को मिली।

कमोडिटी बाजार की बात करें तो कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया। ब्रेंट क्रूड 5.24 प्रतिशत की तेजी के साथ 106.47 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया,जबकि यूएस डब्ल्यूटीआई क्रूड 4.5 प्रतिशत बढ़कर 104.64 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया। तेल की कीमतों में यह उछाल भारत जैसे आयातक देश के लिए चिंता का विषय हो सकता है,क्योंकि इससे चालू खाते का घाटा बढ़ने की संभावना रहती है।

वहीं,एशियाई शेयर बाजारों में गिरावट का माहौल रहा। जापान का निक्केई,हांगकांग का हैंग सेंग और दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स लगभग 3 प्रतिशत तक गिर गए। इस वैश्विक दबाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ा,जहाँ कारोबार की शुरुआत में सेंसेक्स और निफ्टी में करीब 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

आरबीआई द्वारा उठाए गए कदमों पर नजर डालें तो केंद्रीय बैंक ने बैंकों को रुपये से जुड़े नॉन-डिलीवेरेबल फॉरवर्ड (एनडीएफ) कॉन्ट्रैक्ट्स की पेशकश करने से रोक दिया है। इसके अलावा,कंपनियों को कैंसिल किए गए फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स को दोबारा बुक करने की अनुमति भी नहीं दी गई है। इन उपायों का उद्देश्य बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना और सट्टेबाजी को सीमित करना है।

इससे पहले भी आरबीआई ने बैंकों की नेट ओपन रुपये पोजिशन पर 100 मिलियन डॉलर की सीमा तय की थी,जिससे बैंकों की जोखिम लेने की क्षमता सीमित हो गई। साथ ही, बैंकों को अपने संबंधित पक्षों के साथ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट करने से भी रोका गया है। इन सभी कदमों का संयुक्त प्रभाव यह हुआ कि रुपये पर दबाव कम हुआ और इसकी स्थिति मजबूत हुई।

विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई की यह रणनीति अल्पकालिक रूप से प्रभावी साबित हो रही है,लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का अनुकूल होना भी जरूरी है। खासतौर पर तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और भू-राजनीतिक तनाव रुपये के लिए चुनौती बने रह सकते हैं।

हालाँकि,भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार इस स्थिति से निपटने में मददगार साबित हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार,देश के पास 700 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है,जो किसी भी आपात स्थिति में बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को स्थिर बनाए रखने के लिए पर्याप्त माना जाता है।

गुरुवार को रुपये में आई यह ऐतिहासिक मजबूती आरबीआई की सक्रिय नीति और सख्त कदमों का परिणाम है। यह संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक मुद्रा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह मजबूती कायम रहती है या वैश्विक कारकों का दबाव फिर से रुपये पर हावी होता है।