मुंबई,21 जनवरी (युआईटीवी)- भारतीय सिनेमा के इतिहास में 20 जनवरी की तारीख एक खास मुकाम रखती है। यह दिन सिर्फ फिल्मों या सितारों की वजह से नहीं,बल्कि उस सोच के लिए याद किया जाता है,जिसने यह साबित किया कि सिनेमा केवल अभिनेताओं का ही नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले तकनीकी कलाकारों का भी उतना ही बड़ा योगदान होता है। इसी दिन महान सिनेमेटोग्राफर वी.के. मूर्ति को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था,जिसने भारतीय फिल्म उद्योग में तकनीकी प्रतिभाओं को नई पहचान दी।
साल 2010 में, 20 जनवरी को, वी.के. मूर्ति को वर्ष 2008 के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया। इस सम्मान के साथ उन्होंने इतिहास रच दिया,क्योंकि वह इस प्रतिष्ठित पुरस्कार को पाने वाले पहले सिनेमेटोग्राफर बने। दादा साहब फाल्के पुरस्कार भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है,जिसकी शुरुआत 1969 में की गई थी। अब तक यह पुरस्कार ज्यादातर निर्देशकों,अभिनेताओं और फिल्म निर्माण से जुड़े बड़े नामों को मिलता रहा,लेकिन वी.के. मूर्ति को यह सम्मान देकर सरकार और सिनेमा जगत ने यह स्वीकार किया कि कैमरे के पीछे की कला भी उतनी ही महत्वपूर्ण है,जितनी पर्दे पर दिखने वाली अभिनय कला।
भारत दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाला देश है। हर साल सैकड़ों फिल्में अलग-अलग भाषाओं में बनती हैं। इन फिल्मों की सफलता के पीछे सिर्फ कहानी और अभिनय ही नहीं,बल्कि तकनीकी पक्ष का भी अहम योगदान होता है। सिनेमेटोग्राफर फिल्म का वह कलाकार होता है,जो निर्देशक की कल्पना को कैमरे के जरिए पर्दे पर उतारता है। रोशनी का इस्तेमाल,कैमरे का एंगल,फ्रेम की संरचना और दृश्य की भावनात्मक गहराई तय करने में सिनेमेटोग्राफर की भूमिका निर्णायक होती है। वी.के. मूर्ति ने अपने काम से यह साबित किया कि सही छायांकन किसी साधारण दृश्य को भी यादगार बना सकता है।
वी.के. मूर्ति का नाम खासतौर पर हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर से जुड़ा हुआ है। वह महान फिल्मकार गुरु दत्त के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक थे। 1950 और 1960 के दशक में गुरु दत्त की जिन फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया,उनमें वी.के. मूर्ति की सिनेमेटोग्राफी की अहम भूमिका रही। ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘चौदहवीं का चाँद ’ और ‘साहिब बीवी और गुलाम’ जैसी फिल्मों में उनकी लाइटिंग और कैमरा मूवमेंट आज भी सिनेमा के विद्यार्थियों के लिए पाठ्यपुस्तक की तरह मानी जाती हैं।
खासतौर पर ‘कागज के फूल’ को भारतीय सिनेमा की पहली सिनेमास्कोप फिल्म माना जाता है,जिसमें वी.के. मूर्ति की तकनीकी समझ और प्रयोगशीलता साफ नजर आती है। इस फिल्म के कई दृश्य आज भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सिनेमेटोग्राफी की मिसाल के तौर पर पढ़ाए जाते हैं। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के दौर में रोशनी और परछाइयों के साथ जो प्रयोग वी.के. मूर्ति ने किए,वे अपने समय से काफी आगे थे। उन्होंने भावनाओं को शब्दों से ज्यादा रोशनी और फ्रेमिंग के जरिए व्यक्त किया।
हालाँकि,वी.के. मूर्ति को यह सर्वोच्च सम्मान मिलने में लंबा इंतजार करना पड़ा। जिस दौर में तकनीकी कलाकारों को अक्सर पर्दे के पीछे ही सीमित रखा जाता था,उस समय उनकी प्रतिभा को उतनी सार्वजनिक पहचान नहीं मिल पाई,लेकिन समय के साथ उनकी फिल्मों की अहमियत और उनकी कला की गहराई को सिनेमा जगत ने समझा। दादा साहब फाल्के पुरस्कार का उन्हें मिलना सिर्फ एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था,बल्कि यह उन सभी तकनीकी कलाकारों के लिए भी सम्मान था,जो वर्षों तक गुमनाम रहकर सिनेमा को आकार देते रहे।
20 जनवरी का यह दिन भारतीय सिनेमा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है,क्योंकि इसने सोच में बदलाव का संकेत दिया। इसने यह संदेश दिया कि सिनेमा एक सामूहिक कला है,जिसमें हर विभाग की अपनी अहमियत है। अभिनेता चेहरे होते हैं,निर्देशक दृष्टा होता है,लेकिन सिनेमेटोग्राफर वह आँख होता है,जिससे दर्शक पूरी फिल्म को देखता है।
आज जब भारतीय सिनेमा तकनीकी रूप से विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहा है,तब वी.के. मूर्ति जैसे दिग्गजों का योगदान और भी प्रासंगिक हो जाता है। उनका जीवन और उनका काम आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। 20 जनवरी न सिर्फ एक तारीख है,बल्कि यह उस सम्मान का प्रतीक है,जो भारतीय सिनेमा ने आखिरकार अपने पर्दे के पीछे के जादूगर को दिया।
