नई दिल्ली,4 अप्रैल (युआईटीवी)- मध्य पूर्व में जारी अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष अब 36वें दिन में प्रवेश कर चुका है और हालात लगातार जटिल होते जा रहे हैं। एक ओर जहाँ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान की सैन्य ताकत लगभग खत्म हो चुकी है,वहीं जमीनी स्तर पर सामने आ रही घटनाएँ इन दावों से अलग तस्वीर पेश कर रही हैं। हाल के घटनाक्रम में ईरान द्वारा अमेरिकी लड़ाकू विमानों को निशाना बनाए जाने और रेस्क्यू मिशन पर भी हमले की खबरों ने संघर्ष को और गंभीर बना दिया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक,ईरान ने अमेरिकी वायुसेना के उन्नत एफ-15ई लड़ाकू विमान को मार गिराया है। यह दो सीटों वाला जेट था,जो एक मिशन के दौरान ईरानी क्षेत्र में गिराया गया। अमेरिकी मीडिया के अनुसार,इस विमान में सवार दो क्रू मेंबर में से एक को अमेरिकी स्पेशल फोर्स ने सुरक्षित बचा लिया है,जबकि दूसरा अब भी लापता बताया जा रहा है। यह घटना अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए एक बड़ा झटका मानी जा रही है।
इस घटना के बाद अमेरिका ने अपने लापता पायलट को खोजने और बचाने के लिए तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। इसके तहत ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टरों को भेजा गया,लेकिन यह मिशन भी जोखिम से खाली नहीं रहा। द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार,रेस्क्यू में शामिल दो अमेरिकी सैन्य हेलीकॉप्टर ईरानी फायरिंग की चपेट में आ गए। हालाँकि,हेलीकॉप्टरों में सवार सैनिक घायल हो गए,लेकिन दोनों विमान किसी तरह सुरक्षित अपने बेस पर लौटने में सफल रहे।
इसी दौरान एक और बड़ी घटना सामने आई,जब अमेरिकी ए-10 वॉर्थोग फाइटर एयरक्राफ्ट को भी ईरान ने निशाना बनाया। रिपोर्ट्स के अनुसार,इस हमले के बाद पायलट ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए विमान को कुवैत के हवाई क्षेत्र तक लाकर खुद को इजेक्ट कर लिया। इससे यह साफ हो जाता है कि ईरान की एयर डिफेंस प्रणाली अभी भी सक्रिय और प्रभावी बनी हुई है।
इन घटनाओं ने अमेरिकी प्रशासन के उस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं,जिसमें कहा गया था कि ईरान की एयरफोर्स और नेवी पूरी तरह निष्क्रिय हो चुकी हैं। वास्तविकता यह है कि ईरान न केवल जवाबी कार्रवाई कर रहा है,बल्कि अमेरिकी सैन्य अभियानों को चुनौती भी दे रहा है।
व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने इन घटनाओं की पुष्टि करते हुए कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप को इस पूरे मामले की जानकारी दे दी गई है। वहीं,एनबीसी न्यूज से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि एफ-15 जैसे नुकसान से ईरान के साथ चल रही बातचीत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका अपनी रणनीति में कोई बदलाव नहीं करेगा और अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है।
हालाँकि,यह बयान उस स्थिति के ठीक विपरीत दिखाई देता है,जो हाल के दिनों में सामने आई है। महज एक हफ्ते पहले ही ट्रंप ने दावा किया था कि अमेरिकी विमान तेहरान और ईरान के अन्य हिस्सों के ऊपर बिना किसी बाधा के उड़ान भर रहे हैं और ईरान कुछ भी करने में सक्षम नहीं है,लेकिन अब जब अमेरिकी विमानों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आ रही हैं,तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या जमीनी हकीकत कुछ और है।
दूसरी ओर,ईरान भी इस संघर्ष में आक्रामक रुख अपनाए हुए है। ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार, एक टीवी रिपोर्टर ने घोषणा की है कि जो भी अमेरिकी पायलट को जिंदा पकड़ेगा, उसे बड़ा इनाम दिया जाएगा। इसके अलावा,एक स्थानीय गवर्नर ने भी कहा है कि जो कोई दुश्मन के सैनिकों को पकड़ता है या मारता है,उसे सम्मानित किया जाएगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि ईरान इस संघर्ष को केवल सैन्य स्तर पर ही नहीं,बल्कि मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्तर पर भी लड़ रहा है।
ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने भी पुष्टि की है कि वह दक्षिण-पश्चिमी ईरान में उस इलाके में तलाशी अभियान चला रहा है,जहाँ अमेरिकी विमान गिरा था। इस अभियान का उद्देश्य लापता पायलट का पता लगाना और उसे पकड़ना बताया जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम पर ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर कलीबाफ ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अमेरिका और इजरायल की रणनीति पर व्यंग्य करते हुए कहा कि जो युद्ध शासन परिवर्तन के उद्देश्य से शुरू किया गया था,वह अब अपने पायलटों की तलाश तक सिमट कर रह गया है। उनके इस बयान को ईरान की ओर से एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह संघर्ष अब केवल सैन्य टकराव तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि यह कूटनीतिक,मनोवैज्ञानिक और प्रचार युद्ध का भी रूप ले चुका है। दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के जरिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर भी इस संघर्ष को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। मध्य पूर्व पहले से ही एक संवेदनशील क्षेत्र है और यहां किसी भी बड़े सैन्य टकराव का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, खासकर तेल आपूर्ति और व्यापार पर पड़ सकता है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता यह तनाव पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।
संघर्ष के 36वें दिन की घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि स्थिति अभी नियंत्रण में नहीं है और आने वाले दिनों में और भी गंभीर मोड़ ले सकती है। जहाँ एक तरफ अमेरिका अपनी सैन्य ताकत और रणनीति पर भरोसा जता रहा है,वहीं ईरान लगातार जवाबी कार्रवाई करके यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह किसी भी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या इस टकराव का कोई कूटनीतिक समाधान निकलता है या यह संघर्ष और गहराता चला जाएगा।
