आईडीएफसी फर्स्ट बैंक

590 करोड़ के कथित फ्रॉड से हिला आईडीएफसी फर्स्ट बैंक,शेयर 20% टूटा; हरियाणा सरकार ने बैंक को कामकाज से हटाया

मुंबई,23 फरवरी (युआईटीवी)- निजी क्षेत्र के प्रमुख बैंक आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के शेयरों में सोमवार को भारी गिरावट दर्ज की गई। बैंक के शेयर में दिन के कारोबार के दौरान 20 प्रतिशत की गिरावट के साथ लोअर सर्किट लगा। यह तेज गिरावट बैंक की चंडीगढ़ शाखा में सामने आए 590 करोड़ रुपये के कथित धोखाधड़ी मामले के बाद आई है। इस खबर से निवेशकों में घबराहट फैल गई और बाजार खुलते ही शेयरों में बिकवाली का दबाव दिखा।

कारोबार की शुरुआत में बैंक का शेयर पिछले सत्र के 83.51 रुपये के बंद भाव के मुकाबले करीब 10 प्रतिशत गिरकर 75.16 रुपये पर खुला। हालाँकि,गिरावट यहीं नहीं थमी और कुछ ही समय में यह 20 प्रतिशत तक लुढ़ककर 66.80 रुपये पर पहुँच गया,जहाँ लोअर सर्किट लग गया। बाद में हल्की रिकवरी देखने को मिली और सुबह 11:38 बजे के आसपास यह करीब 15.71 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 70.39 रुपये प्रति शेयर पर कारोबार करता दिखा। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि फ्रॉड की खबर ने निवेशकों के भरोसे को झटका दिया है,जिससे तत्काल बिकवाली बढ़ी।

बैंक ने स्टॉक एक्सचेंज को दी गई सूचना में बताया कि यह मामला चंडीगढ़ की एक विशेष शाखा में हरियाणा सरकार से जुड़े कुछ खातों तक सीमित है। बैंक के अनुसार,प्रारंभिक जाँच में संकेत मिले हैं कि शाखा के कुछ कर्मचारियों ने अनधिकृत और धोखाधड़ी वाली गतिविधियों को अंजाम दिया,जिनमें संभवतः अन्य व्यक्ति,संस्थाएँ या सहयोगी भी शामिल हो सकते हैं। बैंक ने इस मामले की जानकारी नियामक प्राधिकरणों को दे दी है और पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। जाँच पूरी होने तक चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है।

स्वतंत्र ब्रोकरेज फर्मों के अनुमानों के मुताबिक,संदिग्ध धोखाधड़ी की राशि बैंक की कुल संपत्ति का लगभग 0.9 प्रतिशत है और यह वित्त वर्ष 2026 के अनुमानित कर-पूर्व लाभ का करीब 20 प्रतिशत हो सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि यह नुकसान पूरी तरह से मान्यता प्राप्त करता है,तो इससे बैंक की लाभप्रदता और बैलेंस शीट पर अल्पकालिक दबाव पड़ सकता है। हालाँकि,कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बैंक की पूँजी पर्याप्त है और यह झटका लंबी अवधि में सँभाला जा सकता है,बशर्ते आंतरिक नियंत्रण प्रणाली को मजबूत किया जाए।

मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब हरियाणा सरकार ने एक आधिकारिक परिपत्र जारी कर आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक को तत्काल प्रभाव से अगले आदेश तक सरकारी कामकाज से हटा दिया। राज्य सरकार ने सभी विभागों,बोर्डों, निगमों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को निर्देश दिया है कि वे इन बैंकों का उपयोग जमा,निवेश या किसी भी अन्य वित्तीय लेनदेन के लिए न करें। इसके साथ ही संबंधित अधिकारियों को इन दोनों बैंकों में मौजूद शेष राशि को तुरंत स्थानांतरित करने और खातों को बंद करने के निर्देश दिए गए हैं।

हरियाणा के वित्त विभाग ने अपने परिपत्र में सावधि जमा संबंधी निर्देशों के पालन में कमियों की ओर भी इशारा किया है। विभाग के अनुसार,कुछ मामलों में लचीली जमा योजनाओं या उच्च ब्याज दर वाली सावधि जमा योजनाओं में जमा की जाने वाली धनराशि कथित तौर पर बचत खातों में रखी गई थी। इससे राज्य को अपेक्षित ब्याज नहीं मिला और वित्तीय नुकसान हुआ। विभाग ने कहा कि इस तरह की विसंगतियाँ प्रशासनिक निगरानी में ढिलाई की ओर संकेत करती हैं।

वित्त विभाग ने सभी विभागों को निर्देश दिया है कि वे अनुमोदित जमा शर्तों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करें,बैंकों द्वारा अनुपालन की नियमित पुष्टि करें और मासिक मिलान प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से पूरा करें। किसी भी प्रकार की विसंगति पाए जाने पर तुरंत रिपोर्ट करने के आदेश दिए गए हैं। राज्य सरकार ने 31 मार्च 2026 तक सभी मिलान प्रक्रियाएँ पूरी करने और 4 अप्रैल 2026 तक प्रमाणित अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने की समयसीमा तय की है।

बैंकिंग क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यह प्रकरण आंतरिक नियंत्रण और निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है। किसी भी बैंक में सरकारी खातों से जुड़ी गतिविधियाँ अत्यधिक संवेदनशील मानी जाती हैं और इन पर विशेष निगरानी रखी जाती है। ऐसे में यदि शाखा स्तर पर अनियमितताएँ हुई हैं,तो यह प्रबंधन के लिए गंभीर चिंता का विषय है। हालाँकि,बैंक ने दावा किया है कि मामला एक शाखा तक सीमित है और इससे उसकी समग्र परिचालन क्षमता प्रभावित नहीं होगी।

शेयर बाजार में आई गिरावट से यह भी स्पष्ट होता है कि निवेशक बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता और सख्त अनुपालन की अपेक्षा रखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों में कॉर्पोरेट गवर्नेंस को लेकर सख्ती बढ़ी है। ऐसे में किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या नियामकीय उल्लंघन की खबर निवेशकों के विश्वास को तुरंत प्रभावित करती है।

फिलहाल बाजार और निवेशक इस मामले की आगे की जाँच रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। यदि जाँच में धोखाधड़ी का दायरा सीमित पाया जाता है और बैंक प्रभावी सुधारात्मक कदम उठाता है,तो स्थिति सँभल सकती है,लेकिन यदि अनियमितताओं का दायरा व्यापक निकला,तो इससे बैंक की साख और वित्तीय स्थिति पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।

यह प्रकरण न केवल आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के लिए,बल्कि पूरे बैंकिंग तंत्र के लिए एक चेतावनी है कि सरकारी धन और सार्वजनिक संसाधनों के प्रबंधन में किसी भी प्रकार की लापरवाही गंभीर परिणाम ला सकती है। आने वाले दिनों में जाँच की दिशा और नियामकीय कार्रवाई यह तय करेगी कि यह संकट कितना गहरा है और इससे उबरने में बैंक को कितनी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।