नासा

2023 के सूर्य ग्रहण में भारतीय मूल के नासा वैज्ञानिक रॉकेट मिशन का नेतृत्व करेंगे

वाशिंगटन,6 अक्टूबर(युआईटीवी)- 2023 के सूर्य ग्रहण में भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक अरोह बड़जात्या नासा में एक मिशन का संचालन कर रहे हैं। जिसका लक्ष्य 14 अक्टूबर को 2023 को होने वाले सूर्य ग्रहण के दौरान तीन रॉकेट लॉन्च करना है।

इस बारे में अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि वैज्ञानिक अरोह बड़जात्या एटमॉसफेरिक पर्टर्बेशन नामक मिशन का नेतृत्व कर रहे हैं। यह मिशन ग्रहण पथ या एपीईपी के आसपास का है। इस मिशन का उद्देश्य ग्रहण के समय जब सूरज की रोशनी में अचानक गिरावट आती है,तो इसका वायुमंडल के ऊपरी हिस्से पर प्रभाव का अध्ययन है।

बताया जा रहा है कि सूर्य ग्रहण जो इस साल के 14 अक्टूबर को लगने वाला है,उसमें सूर्य की चमक सामान्य चमक से 10 प्रतिशत तक कम होने का अनुभव होगा। क्योंकि इस सूर्य ग्रहण में सूर्य को चंद्रमा ग्रहण करेगा। जिसके कारण सूर्य का सिर्फ एक चमकदार “रिंग ऑफ फायर” ही शेष रह जाएगा।

वायुमंडल से 50 मील ऊपर और उससे आगे जिसे वैज्ञानिक आयनमंडल कहते हैं,वहाँ की हवा स्वयं विद्युत बन जाती है।आयनमंडल वह जगह है,जहाँ सूर्य के प्रकाश से निकलने वाला पराबैंगनी विकिरण (यूवी घटक) परमाणुओं से इलेक्ट्रॉनों को दूर कर ऊँची उड़ान वाले आयनों और इलेक्ट्रॉनों का एक समुद्र बना सकता है।

परस्पर आकर्षित कणों को सूर्य की निरंतर ऊर्जा अलग रखने का काम करती है। लेकिन सूरज के डूबते ही ये रात में पुनः संगठित हो जाते हैं और सूर्योदय के बाद फिर से अलग हो जाते हैं।

जब सूर्य ग्रहण होता है तो सूरज का प्रकाश गायब हो जाता है और थोड़ी देर बाद तुरंत परिदृश्य के एक छोटे से भाग पर पुनः दिखाई देती है।

जिससे अचानक से आयनोस्फियर का तापमान और घनत्व में गिरावट दर्ज किया जाता है,फिर यह तापमान और घनत्व बढ़ भी जाता है। ऐसा होने से आयनोस्फीयर में लहरें उठने लगती हैं।

अरोह बड़जात्या ने कहा कि “यदि आयनमंडल के बारे में आप सोचते हैं कि यह एक तालाब की तरह हैं,जिस पर कुछ हल्की -हल्की लहरें तैर रही है,तो ग्रहण एक मोटरबोट की भाँति है,जो अचानक ही पानी में बह जाती है।” अरोह बड़जात्या एम्ब्री-रिडल एरोनॉटिकल यूनिवर्सिटी,फ्लोरिडा में इंजीनियरिंग भौतिकी के प्रोफेसर हैं।

14 अक्टूबर को 2023 को तीन रॉकेट लॉन्च करने की योजना एपीईपी टीम ने बनाई है। बताया जा रहा है कि पहली रॉकेट स्थानीय शिखर ग्रहण से लगभग 35 मिनट पहले लॉन्च किया जाएगा। दूसरी रॉकेट शिखर ग्रहण के दौरान लॉन्च किया जाएगा और तीसरी रॉकेट शिखर ग्रहण के 35 मिनट बाद लॉन्च किया जाएगा।

तीनों रॉकेट के बारे में बताया गया है कि ये सभी रॉकेट वलयाकार पथ के ठीक बाहर उड़ेंगे,जहाँ सूर्य के सामने से चंद्रमा सीधे गुजरता है।

विद्युत और चुंबकीय क्षेत्र, घनत्व और तापमान में बदलाव को मापने के लिए प्रत्येक रॉकेट चार छोटे वैज्ञानिक उपकरण तैनात करेगा। यदि यह अपने कार्य में सफल होता है ,तो आयनमंडल में सूर्य ग्रहण के दौरान कई स्थानों से लिए गए माप का यह पहला सफल माप कहलाएगा।

बड़जात्या ने साउंडिंग रॉकेट का चयन किया है। क्योंकि यह अंतरिक्ष के विशेष क्षेत्रों को उच्च तरीके से सूचित कर सकता है,और सही तरीके से माप सकता है। विभिन्न ऊँचाई पर होने वाले बदलाव को भी साउंडिंग रॉकेट उचित तरीके से माप सकता है। एपीईपी रॉकेट अपने प्रक्षेप पथ का तो माप लेने में सक्षम तो है ही,इसके साथ ही यह भूमि से 70 से 325 किलोमीटर ऊपर तक का माप लेने में भी सक्षम है।

आयनोस्फेरिक घनत्व और तटस्थ हवा का माप एकत्र करने के लिए ग्राउंड-बेस ऑब्जर्वेशन की भी सुविधा है। आयनोस्फेरिक गड़बड़ी को मापने के लिए एक टीम को रखा गया है,जो ग्रहण पथ से दूर अपना रडार चलाएगी और इस पर अपनी नजर जमाए रखेगी। यह टीम वेस्टफोर्ड में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के हेस्टैक वेधशाला की टीम है।

इसके आलावा एक टीम जो एम्ब्री-रिडल के स्टूडेंट्स की है,वह ग्रहण के गुजरने के दौरान मौसम में होने वाले परिवर्तनों को मापने का कार्य करेंगे। एम्ब्री-रिडल के स्टूडेंट्स की यह टीम ऊँचाई वाले गुब्बारे (100,000 फीट तक पहुँचने वाले) का प्रत्येक 20 मिनट में उपयोग कर मौसम में होने वाले परिवर्तनों का माप करेंगे।

एपीईपी रॉकेटों को फिर से हासिल किया जाएगा और बाद में इसे वर्जीनिया में 8 अप्रैल 2024 को वॉलॉप्स फ्लाइट सुविधा से फिर से लॉन्च करने की योजना है। जब टेक्सास से मेन तक पूर्ण सूर्यग्रहण अमेरिका को पार करेगा।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *