लखनऊ,9 मई (युआईटीवी)- ‘लिव-इन रिलेशन’ को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। पीठ ने कहा है कि इस्लाम का अनुयायी पत्नी के जीवित रहते हुए लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकता है। बुधवार को पीठ ने कहा कि इस्लामी सिद्धांत इस बात की अनुमति नहीं देता है कि अपने निकाह के बने रहते कोई मुसलमान व्यक्ति दूसरी महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहे। पीठ ने कहा कि स्थिति भिन्न हो सकती है,यदि कोई दो वयस्क व्यक्ति अविवाहित हैं,तो वे अपना जीवन जीने के तरीकों का चुनाव कर सकते हैं।
बहराइच जिले के मूल निवासी याचिकाकर्ताओं स्नेहा देवी और मोहम्मद शादाब खान को न्यायमूर्ति ए.आर. मसूदी और न्यायमूर्ति ए.के. श्रीवास्तव ने इस टिप्पणी के साथ पुलिस सुरक्षा प्रदान करने से इनकार कर दिया है। याचिकाकर्ताओं ने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने की बात को स्वीकार किया है,जबकि मोहम्मद शादाब खान के खिलाफ महिला के माता-पिता ने अपहरण और उनकी बेटी को शादी के लिए बहकाने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई है।
याचिकाकर्ताओं ने पुलिस सुरक्षा की माँग करते हुए तर्क दिया कि वे वयस्क हैं और वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के लिए स्वतंत्र हैं। पीठ ने पूछताछ में पाया कि साल 2020 में मोहम्मद शादाब खान ने फरीदा खातून से शादी की है और उनकी एक बेटी भी है। अदालत ने इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के तहत उन्हें पुलिस सुरक्षा देने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि वर्तमान मामले की परिस्थितियों के अनुसार ऐसे रिश्ते (लिव-इन रिलेशनशिप ) की अनुमति इस्लाम नहीं देता है।
पुलिस को पीठ ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता स्नेहा देवी को सुरक्षा में उसके माता-पिता के पास पहुँचा दिया जाना चाहिए। क्योंकि विवाह संस्था के मामलों में संवैधानिक और सामाजिक नैतिकता को संतुलित करने की जरुरत है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो समाज में शांति और शांति के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए सामाजिक सामंजस्य धूमिल और लुप्त हो जाएगा। अपने आदेश में अदालत ने कहा कि रूढ़ियाँ और प्रथाएँ भी विधि के समान हैं। रूढ़ियों व प्रथाओं से प्रतिबंधित रिश्ते के अधिकार को भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 मान्यता नहीं देता है।

