नई दिल्ली,10 जुलाई (युआईटीवी)- सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को लेकर बुधवार,10 जुलाई, 2024 को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत मुस्लिम महिला तलाक के बाद अपने पति से गुजारा भत्ता माँग सकती है। कोर्ट ने कहा कि इसके लिए मुस्लिम महिलाएँ याचिका भी दायर कर सकती हैं।
तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता देने के आदेश को एक मुस्लिम शख्श मोहम्मद अब्दुल समद ने फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अपनी याचिका में शख्स ने कहा था कि गुजारा भत्ता 125 सीआरपीसी के बजाय मुस्लिम महिला अधिनियम,1986 के प्रावधानों द्वारा शासित होना चाहिए। कोर्ट ने इस याचिका पर बुधवार को सुनवाई किया और गुजारा भत्ता को लेकर अहम फैसला दिया है।
मोहम्मद अब्दुल समद द्वारा सीआरपीसी की धारा 125 के तहत तलाकशुदा पत्नी को गुजारा भत्ता देने के निर्देश के खिलाफ दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि धर्मनिरपेश कानून पर ‘मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986’ हावी नहीं हो सकता है। जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस मसीह ने इस मामले में अलग-अलग निर्णय दिए हैं,लेकिन दोनों के निर्णय सहमति वाले हैं। मोहम्मद समद को हाईकोर्ट ने 10 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था।
जस्टिस नागरत्ना ने फैसला सुनाते हुए कहा कि सभी महिलाओं पर सीआरपीसी की धारा 125 लागू होती है,न कि सिर्फ शादीशुदा महिला पर। इसलिए इस निष्कर्ष के साथ हम आपराधिक अपील को खारिज कर रहे हैं।
अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि यदि किसी मुस्लिम महिला का तलाक सीआरपीसी की धारा 125 के तहत आवेदन के लंबित रहने के दौरान होता है,तो वह ‘मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 2019’ का सहारा ले सकती है। कोर्ट ने कहा कि ‘मुस्लिम अधिनियम 2019’ सीआरपीसी की धारा 125 के तहत उपाय के अलावा अन्य समाधान भी मुहैया कराता है।
शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि सीआरपीसी की धारा 125 एक धर्मनिरपेक्ष प्रावधान है और यह मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है। हालाँकि ‘मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम,1986’ के जरिए सीआरपीसी की धारा 125 को रद्द कर दिया गया था। इसके बाद 2001 में कानून की वैधता को बरकरार रखा गया। सीआरपीसी की धारा 125 पत्नी, बच्चे और माता-पिता को भरष-पोषण का प्रावधान करती है और इसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति समर्थ रहने के बावजूद भी अपनी पत्नी, बच्चे या माता-पिता के भरण-पोषण से इनकार करता है,तो उसे अदालत द्वारा भरण-पोषण के लिए मासिक भत्ता देने का आदेश दिया जा सकता है।