न्यूयॉर्क,27 मार्च (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के मतदाताओं को उनके आधार कार्ड को चुनाव फोटो पहचान पत्र (ईपीआईसी) से जोड़ने के नियम का उल्लेख किया। उन्होंने इस आधार-ईपीआईसी लिंकिंग की तुलना अमेरिका में मौजूद मतदाता पहचान की ढीली प्रणाली से की। ट्रंप ने इस पर अपने विचार रखते हुए कहा कि भारत ने अपनी चुनावी प्रणाली में बायोमेट्रिक पहचान का इस्तेमाल किया है,जबकि अमेरिका की प्रणाली नागरिकता के स्व-सत्यापन पर निर्भर करती है,जो कि उनके अनुसार,चुनावों की सुरक्षा के लिहाज से कमजोर है।
ट्रंप ने एक आदेश पर हस्ताक्षर किए,जिसमें अमेरिकी चुनावों में मतदाताओं को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए एक अतिरिक्त कदम उठाने की आवश्यकता बताई गई। इस आदेश के तहत,अमेरिकी मतदाताओं को चुनाव में वोट डालने के लिए पासपोर्ट या कुछ अन्य दस्तावेज़ दिखाने होंगे,ताकि उनकी नागरिकता साबित हो सके। उनका यह कदम भारत की चुनावी प्रणाली से प्रेरित माना जा सकता है, जहाँ मतदाताओं की पहचान बायोमेट्रिक डेटा के माध्यम से की जाती है।
ट्रंप ने इस संदर्भ में लिखा कि अमेरिका ने स्वतंत्रता की शुरुआत में बढ़त बनाई थी, लेकिन अब चुनावों की बुनियादी सुरक्षा को लागू करने में नाकाम हो रहा है,जबकि विकसित और विकासशील देशों में इस प्रकार के सुरक्षा उपाय पहले से लागू हैं। उनका कहना था कि चुनावों में पारदर्शिता और सुरक्षा की आवश्यकता को लेकर भारत जैसा बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता है, जहाँ एक मजबूत राष्ट्रीय चुनाव आयोग द्वारा चुनाव के नियमों,कानूनों और मशीनरी का संचालन किया जाता है।
भारत में, 2021 में चुनाव कानून (संशोधन) अधिनियम के तहत आधार को चुनाव फोटो पहचान पत्र (ईपीआईसी) से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की गई। चुनाव आयोग इस प्रावधान को लागू करने के लिए अंतिम रूप दे रहा है और कुछ मतदाता पहले ही इसे लागू भी कर चुके हैं। इस कदम से चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है। वहीं,अमेरिका में ऐसा कोई राष्ट्रीय चुनाव आयोग नहीं है,जो भारत के चुनाव आयोग की तरह चुनाव के संचालन,नियमों और कानूनों की निगरानी करता हो। अमेरिका में चुनाव राज्य और स्थानीय स्तर पर होते हैं और प्रत्येक राज्य के पास अपनी अलग-अलग चुनावी प्रक्रिया,मतदान प्रणाली और उम्मीदवारों के चयन के तरीके होते हैं।
ट्रंप के इस आदेश का एक और पहलू यह है कि वह चुनावों में धोखाधड़ी को लेकर चिंतित हैं। उनका मानना है कि अगर चुनावों में मतदाता पहचान को लेकर कोई ठोस व्यवस्था नहीं होगी,तो चुनाव में धांधली का जोखिम बढ़ सकता है। अमेरिकी चुनावों में वोटिंग मशीनों का उपयोग भी अलग-अलग राज्यों में भिन्न होता है और कुछ राज्यों में तो बिना फोटो के मतदाता पहचान पत्र जारी किए जाते हैं,जो चुनावों की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हैं।
कैलिफोर्निया जैसे राज्यों ने ट्रंप के आदेश का विरोध किया है,क्योंकि राज्य का कानून मानता है कि मतदाता पहचान दिखाना अवैध है। कैलिफोर्निया ने इसके खिलाफ अदालत में चुनौती देने का इरादा जताया है। डेमोक्रेट्स का यह कहना है कि गरीब लोग फोटो पहचान पत्र प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे और यह चुनावों के दौरान उनके अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। वे यह भी मानते हैं कि इस तरह के आदेश से चुनावी प्रक्रिया में असमानता पैदा होगी और मतदाता पहचान के लिए आवश्यक दस्तावेज़ों की कमी से कुछ नागरिकों का वोट डालने का अधिकार छिन सकता है।
दूसरी ओर,रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य मानते हैं कि अमेरिका में चुनावों में धोखाधड़ी को रोकने के लिए मतदाता पहचान की मजबूत प्रणाली की आवश्यकता है। उनका कहना है कि ढीली पहचान व्यवस्था के कारण चुनावों में धांधली हो सकती है और चुनावी परिणामों को प्रभावित किया जा सकता है। रिपब्लिकन का यह भी कहना है कि इस तरह की पहचान व्यवस्था से चुनाव की पारदर्शिता और सुरक्षा में सुधार होगा, जिससे नागरिकों का विश्वास चुनावी प्रणाली पर मजबूत होगा।
अमेरिका में राष्ट्रीय पहचान पत्र की व्यवस्था नहीं है,जो भारत और यूरोप के कई देशों में है। वहाँ लोग अपनी पहचान साबित करने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस,सरकारी सेवानिवृत्ति कार्यक्रम से संबंधित दस्तावेज़ या सामाजिक सुरक्षा नंबर का उपयोग करते हैं। कुछ राज्यों में तो बिना फोटो के मतदाता पहचान पत्र भी जारी किए जाते हैं, जबकि अन्य राज्यों में यह आवश्यक होता है। इस असमानता के कारण चुनावों में मतदाता पहचान और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं। ट्रंप के आदेश से यह स्पष्ट होता है कि वे चुनावों में अधिक पारदर्शिता और सुरक्षा चाहते हैं,लेकिन यह भी एक चुनौती बन सकता है,क्योंकि देश के विभिन्न हिस्सों में चुनावी नियम और पहचान दस्तावेज़ की प्रक्रिया में असमानताएँ हैं।
इस आदेश के लागू होने पर अमेरिका में एक बड़ा विवाद खड़ा हो सकता है,क्योंकि अदालतों में इसे चुनौती दी जा सकती है। इसके बावजूद,यह आदेश अमेरिकी चुनावी प्रक्रिया को पुनः जाँचने और सुधारने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालाँकि,इस पर चल रही राजनीतिक बहस और विरोधाभासों से यह भी साफ है कि अमेरिकी समाज में चुनावी सुधारों को लेकर एक बड़ा मतभेद है,जिसमें विभिन्न राजनीतिक दल और राज्य अपनी-अपनी स्थिति पर अडिग हैं।
