पटना,6 अगस्त (युआईटीवी)- बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत मतदाता सूची को लेकर जारी सियासी आरोप-प्रत्यारोप के बीच भारतीय चुनाव आयोग ने बड़ा खुलासा किया है। आयोग ने बुधवार को कहा कि मतदाता सूची के प्रारूप प्रकाशन के बाद अब तक किसी भी राजनीतिक दल ने कोई दावा या आपत्ति दर्ज नहीं कराई है। जबकि लगातार यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि लाखों योग्य मतदाताओं के नाम सूची से गायब हैं या अयोग्य लोगों के नाम अभी भी उसमें शामिल हैं।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि 1 अगस्त 2025 को बिहार की प्रारूप मतदाता सूची जारी कर दी गई थी और इसके साथ ही सभी राजनीतिक दलों और आम जनता से आग्रह किया गया था कि वे यदि किसी तरह की त्रुटि पाते हैं,तो सात दिनों की निर्धारित समयसीमा के भीतर अपने दावे और आपत्तियाँ दर्ज कराएँ। आयोग का कहना है कि किसी योग्य मतदाता का नाम छूटने या अयोग्य मतदाता का नाम जुड़ने जैसी त्रुटियाँ न हों,यह सुनिश्चित करने के लिए सभी पक्षों को प्रक्रिया में भागीदारी करनी चाहिए थी,लेकिन अब तक किसी दल ने कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।
चुनाव आयोग ने बुधवार को एक विशेष एसआईआर बुलेटिन जारी कर बताया कि आयोग को इस प्रक्रिया के तहत अभी तक मतदाताओं से कुल 3,659 दावे और आपत्तियाँ प्राप्त हुई हैं। ये सभी आवेदन सीधे मतदाताओं की ओर से आए हैं,जिनमें नाम जुड़वाने,संशोधन कराने या आपत्ति दर्ज कराने से संबंधित बातें शामिल हैं। इसके अलावा आयोग को नए मतदाताओं की ओर से फॉर्म 6 और जरूरी घोषणा पत्रों के साथ कुल 19,186 आवेदन भी प्राप्त हुए हैं। यह स्पष्ट करता है कि जहाँ आम मतदाता इस प्रक्रिया में भाग ले रहे हैं,वहीं राजनीतिक दलों की भागीदारी बेहद सीमित रही है।
एसआईआर की प्रक्रिया के अनुसार,अब प्राप्त सभी दावों और आपत्तियों की जाँच संबंधित निर्वाचन अधिकारी (ईआरओ और एईआरओ) द्वारा की जाएगी। आयोग ने यह भी दोहराया कि प्रारूप मतदाता सूची से किसी भी व्यक्ति का नाम बिना जाँच,उचित सुनवाई और लिखित आदेश के नहीं हटाया जा सकता। आयोग का कहना है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और नियमों के तहत संचालित की जा रही है।
बिहार में एसआईआर प्रक्रिया 24 जून से 25 जुलाई 2025 तक चलाया गया। इस दौरान राज्य के कुल 7.89 करोड़ मतदाताओं में से 7.24 करोड़ से अधिक लोगों ने गणना फॉर्म भरकर अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। आयोग के अनुसार,इस विशेष गहन पुनरीक्षण का मकसद मतदाता सूची को अद्यतन और सटीक बनाना था,ताकि आगामी चुनावों में कोई भ्रम या विवाद की स्थिति न पैदा हो।
1 अगस्त को प्रकाशित बिहार की प्रारूप मतदाता सूची में करीब 65 लाख लोगों के नाम नहीं पाए गए,जिसके बाद राजनीतिक हलकों में विवाद शुरू हो गया। इन 65 लाख लोगों में करीब 22 लाख ऐसे लोग थे,जिनकी मृत्यु हो चुकी है,लेकिन उनके नाम अब तक मतदाता सूची में बने हुए थे। आयोग ने इस त्रुटि को दूर करते हुए उन्हें सूची से हटाया है। इसके अलावा करीब 36 लाख यानी कुल मतदाताओं का 4.59 प्रतिशत हिस्सा ऐसे लोगों का है,जिन्होंने फॉर्म नहीं भरे या अब किसी अन्य स्थान पर रह रहे हैं। वहीं,लगभग 7 लाख (0.89 प्रतिशत) मतदाताओं के नाम सूची में दोहराए गए थे,जिन्हें संशोधित किया गया।
हालाँकि, इन आँकड़ों के सामने आने के बाद कुछ विपक्षी दलों ने मीडिया में बयान दिए कि मतदाता सूची से जानबूझकर कुछ वर्गों के नाम हटाए जा रहे हैं। इन आरोपों पर चुनाव आयोग ने दो टूक जवाब देते हुए कहा है कि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और किसी भी नाम को बिना प्रमाण या प्रक्रिया के हटाना संभव नहीं है। आयोग ने राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाते हुए यदि उन्हें किसी भी तरह की विसंगति नजर आती है,तो संबंधित फॉर्म के जरिए अपना दावा या आपत्ति प्रस्तुत करें।
चुनाव आयोग ने यह भी बताया कि 7 दिनों की निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के बाद सभी प्राप्त दावों और आपत्तियों की जाँच कर अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी। आयोग का यह प्रयास है कि बिहार की मतदाता सूची को निष्पक्ष, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाया जा सके,ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में प्रत्येक योग्य नागरिक की भागीदारी सुनिश्चित हो।
बिहार में मतदाता सूची से जुड़े इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ तेज होने की संभावना है,लेकिन चुनाव आयोग के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल किसी भी दल ने औपचारिक रूप से कोई दावा या आपत्ति प्रस्तुत नहीं की है। ऐसे में अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन तक राजनीतिक दल अपनी रणनीति में कोई बदलाव लाते हैं या नहीं।
