वाशिंगटन,2 सितंबर (युआईटीवी)- अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को भारत के लिए विनाशकारी बताया है। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन के दौरान भारत और अमेरिका के बीच दशकों से विकसित होती आ रही साझेदारी को गंभीर झटका लगा। बोल्टन ने आरोप लगाया कि ट्रंप के फैसलों ने भारत को रूस और चीन के करीब जाने के लिए मजबूर कर दिया,जिससे दोनों देशों के बीच विश्वास की दीवार कमजोर हुई।
ब्रिटेन के चैनल स्काई न्यूज को दिए गए एक विशेष साक्षात्कार में जॉन बोल्टन ने कहा कि ट्रंप की नीतियों ने भारत-अमेरिका संबंधों को दशकों पीछे धकेल दिया है। उनके अनुसार,अमेरिका ने शीत युद्ध के बाद से लगातार कोशिश की कि भारत को सोवियत संघ और बाद में रूस के पुराने रिश्तों से धीरे-धीरे दूर किया जाए। खासकर रक्षा सौदों और हथियारों की खरीद में भारत को पश्चिमी देशों की ओर आकर्षित करने की रणनीति अपनाई गई थी,लेकिन ट्रंप ने उस दिशा में चल रही सारी मेहनत को निष्फल कर दिया। बोल्टन का मानना है कि ट्रंप के व्यवहार ने भारत को एक बार फिर वैकल्पिक साझेदार खोजने की स्थिति में ला दिया और यह रूस तथा चीन के लिए अवसर बन गया।
उन्होंने कहा कि भारत लंबे समय से चीन के बढ़ते खतरे को समझता आया है और एशियाई सुरक्षा चतुर्भुज (क्वाड) जैसे मंचों में अमेरिका,जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर उसकी चुनौती का सामना करने की कोशिश करता रहा है,लेकिन ट्रंप की नीतियों ने भारत में यह शंका पैदा की कि क्या अमेरिका वास्तव में भरोसेमंद साझेदार है। बोल्टन के मुताबिक,इस असमंजस का फायदा रूस और चीन ने उठाया और भारत को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश तेज कर दी।
बोल्टन ने अपने इंटरव्यू में व्यापार नीतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने भारत के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं को अचानक रोक दिया,जबकि भारत को उम्मीद थी कि ब्रिटेन की तरह वह भी एक विशेष व्यापार समझौते के करीब है। भारत को इस कदम से भारी निराशा हुई। इतना ही नहीं,ट्रंप ने भारत पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ भी थोप दिया। यह भारत की अर्थव्यवस्था और द्विपक्षीय रिश्तों दोनों के लिए बड़ा झटका था। बोल्टन ने सवाल उठाया कि जब ट्रंप ने रूस और चीन पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाया,तब भारत को निशाना क्यों बनाया गया?
उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप की शैली सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रही। अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर भी उनका रवैया भारत के लिए असहज करने वाला था। कश्मीर में हुए आतंकी हमले और उसके बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव की स्थिति का उदाहरण देते हुए बोल्टन ने कहा कि उस समय हालात बेहद गंभीर थे। हालाँकि,स्थिति धीरे-धीरे शांत हुई,लेकिन ट्रंप ने इसका पूरा श्रेय खुद लेने की कोशिश की। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि उन्होंने छह या सात युद्ध रोक दिए और इसलिए वे नोबेल शांति पुरस्कार के योग्य हैं। बोल्टन के अनुसार,भारत इस दावे से बेहद नाराज हुआ क्योंकि उसे लगा कि ट्रंप ने उसके सुरक्षा संकट का राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की।
ट्रंप के इन कदमों का असर केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रहा,बल्कि इससे भारत-अमेरिका साझेदारी की दीर्घकालिक दिशा पर भी सवाल उठने लगे। बोल्टन का कहना है कि दशकों की मेहनत से जो भरोसा और सहयोग का पुल बना था,वह ट्रंप की नीतियों से कमजोर पड़ गया। भारत,जो खुद को एक विश्वसनीय वैश्विक साझेदार के रूप में देखता है,उसे महसूस हुआ कि अमेरिका की नीतियाँ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं पर ज्यादा आधारित हैं,न कि दीर्घकालिक रणनीति पर।
जॉन बोल्टन ने यह भी इशारा किया कि ट्रंप प्रशासन की कार्यशैली में स्थिरता और गंभीरता की कमी थी। उन्होंने कहा कि भारत जैसे बड़े और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश को केवल व्यापारिक टैरिफ या तात्कालिक राजनीतिक लाभ की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। अमेरिका की दीर्घकालिक सुरक्षा और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन के लिए भारत की भूमिका अहम है,लेकिन ट्रंप ने इस वास्तविकता को नजरअंदाज कर दिया।
गौरतलब है कि बोल्टन इन दिनों खुद भी विवादों में घिरे हुए हैं। हाल ही में अमेरिकी एजेंसियों ने उनके घर और दफ्तर पर छापेमारी की। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार,यह कार्रवाई उनके पास कथित रूप से गोपनीय दस्तावेज होने के कारण की गई है। इसके बावजूद,बोल्टन ने ट्रंप पर निशाना साधने से परहेज नहीं किया और खुलकर कहा कि ट्रंप ने न केवल भारत के साथ बल्कि वैश्विक साझेदारियों के साथ भी गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार किया।
बोल्टन के इस बयान ने अमेरिकी राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय हलकों में हलचल मचा दी है। भारत-अमेरिका संबंध पिछले दो दशकों से लगातार गहरे होते रहे हैं और दोनों देशों ने रक्षा,प्रौद्योगिकी,व्यापार और आतंकवाद विरोधी सहयोग के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है,लेकिन बोल्टन की आलोचना यह संकेत देती है कि ट्रंप प्रशासन के दौरान इस प्रगति पर कहीं न कहीं विराम लगा। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि अगर ट्रंप फिर सत्ता में लौटते हैं,तो भारत-अमेरिका संबंध किस दिशा में जाएँगे।
जॉन बोल्टन की आलोचना ट्रंप के नेतृत्व की उस शैली को उजागर करती है,जिसमें व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और तात्कालिक लाभ दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारियों पर भारी पड़ गए। भारत जैसे देश के लिए यह एक स्पष्ट संदेश है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भरोसा और स्थिरता सबसे बड़े पूँजी हैं और जब इनमें सेंध लगती है,तो दशकों की मेहनत भी कमजोर पड़ जाती है।
