तमिलनाडु की राजनीति और सिनेमा जगत से जुड़े चर्चित नेता एवं अभिनेता विजय (तस्वीर क्रेडिट@Yadavshiva_171)

विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम ने करूर भगदड़ मामले की निष्पक्ष जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया

चेन्नई/नई दिल्ली,8 अक्टूबर (युआईटीवी)- अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) ने करूर भगदड़ मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। यह वही भयावह घटना है,जिसमें 41 लोगों की मौत हो गई थी और 60 से अधिक लोग घायल हुए थे। टीवीके ने अपनी याचिका में माँग की है कि इस मामले की जाँच सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए,ताकि तथ्य बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक प्रभाव के सामने आ सकें।

मामले में पहले से ही मद्रास हाईकोर्ट ने जाँच के लिए एक विशेष जाँच टीम (एसआईटी) के गठन का आदेश दिया था। हालाँकि,टीवीके पार्टी ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। पार्टी का कहना है कि हाईकोर्ट द्वारा गठित एसआईटी राज्य सरकार के अधीन काम करती है,इसलिए उसकी जाँच पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हो सकती। टीवीके ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि इस मामले की निगरानी केंद्र या न्यायपालिका के नियंत्रण में आने वाली एजेंसी से कराई जाए,ताकि पीड़ित परिवारों को न्याय मिल सके।

गौरतलब है कि करूर में विजय की एक रैली के दौरान 27 सितंबर को भगदड़ मच गई थी,जिसमें महिलाओं और बच्चों सहित दर्जनों लोगों की जान चली गई थी। इस घटना के बाद पूरे तमिलनाडु में राजनीतिक हलचल मच गई थी और विभिन्न दलों ने इस हादसे की निंदा की थी।

इससे पहले इसी मामले में एक पीड़िता के परिजनों ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी याचिका में भी यही माँग की गई थी कि मामले की जाँच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए,ताकि किसी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप न हो।

मद्रास हाईकोर्ट ने करूर भगदड़ मामले की गंभीरता को देखते हुए एक एसआईटी टीम का गठन किया था। इस टीम की अगुवाई आईपीएस अधिकारी असरा गर्ग कर रही हैं। उनके साथ नमक्कल की पुलिस अधीक्षक विमला और सीएससीआईडी पुलिस अधीक्षक श्यामला देवी शामिल हैं। अदालत ने करूर पुलिस को निर्देश दिया था कि भगदड़ से संबंधित सभी दस्तावेज,गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्य तुरंत एसआईटी को सौंपे जाएँ।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में विजय की रैली के आयोजकों को कड़ी फटकार भी लगाई थी। अदालत ने कहा था कि रैली में मौजूद भीड़ की सुरक्षा की जिम्मेदारी आयोजकों की थी,लेकिन उन्होंने न केवल भीड़ को नियंत्रित करने में विफलता दिखाई,बल्कि हादसे के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अदालत ने टिप्पणी की, “चाहे वे नेता हों या पार्टी कार्यकर्ता,इस घटना के बाद,जबकि राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और सभी राजनीतिक दलों ने दुख व्यक्त किया,कार्यक्रम के आयोजक पूरी तरह से पीछे हट गए।”

अदालत ने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों को रैलियों और सभाओं के आयोजन में जनसुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। न्यायमूर्ति सेंथिलकुमार ने अपने आदेश में कहा था कि इस तरह की घटनाओं में केवल पुलिस या प्रशासन नहीं,बल्कि आयोजक भी समान रूप से जिम्मेदार होते हैं।

अब टीवीके द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई याचिका ऐसे समय में आई है,जब इसी मामले में सीबीआई जाँच की माँग वाली एक अन्य याचिका पर 10 अक्टूबर को सुनवाई होनी है। पिछले सप्ताह भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई ने भाजपा नेता उमा आनंदन द्वारा दायर याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई थी। उमा आनंदन ने अपनी याचिका में कहा है कि राज्य पुलिस या एसआईटी की जाँच से इस मामले की सच्चाई सामने नहीं आएगी, क्योंकि इसमें सत्ताधारी दल और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

टीवीके की याचिका को लेकर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि विजय इस घटना से बेहद दुखी हैं और उन्होंने स्पष्ट किया है कि दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। पार्टी का कहना है कि उनकी रैली का मकसद सामाजिक जागरूकता फैलाना था,लेकिन कुछ अप्रत्याशित हालातों के चलते यह दुर्घटना हुई,जिसकी जिम्मेदारी तय करना जरूरी है।

इस बीच,राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए मुआवजे की घोषणा की थी,जबकि घायलों के इलाज के लिए विशेष मेडिकल टीमों को तैनात किया गया है। हालाँकि,पीड़ित परिवारों का आरोप है कि उन्हें अभी तक पूरी सहायता नहीं मिली है और मामले की जाँच में राजनीतिक पक्षपात साफ झलक रहा है।

अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं,जहाँ टीवीके और अन्य याचिकाकर्ताओं की सीबीआई जाँच की माँग पर सुनवाई होने वाली है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट यदि इस मामले में स्वतंत्र जाँच एजेंसी को नियुक्त करता है,तो यह न केवल पीड़ित परिवारों के लिए न्याय की दिशा में बड़ा कदम होगा,बल्कि तमिलनाडु में राजनीतिक रैलियों और सार्वजनिक आयोजनों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गहरा असर डालेगा।

करूर भगदड़ ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है और अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय करेगा कि इस त्रासदी की सच्चाई आखिर कितनी गहराई से उजागर हो पाएगी।