नई दिल्ली,25 नवंबर (युआईटीवी)- जोहान्सबर्ग में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान एक ऐतिहासिक और रणनीतिक कदम उठाते हुए ऑस्ट्रेलिया,कनाडा और भारत ने ऑस्ट्रेलिया-कनाडा-इंडिया टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन पार्टनरशिप (एसीआईटीआई) पर हस्ताक्षर किए। यह त्रिपक्षीय साझेदारी न सिर्फ तीनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी संबंधों को मजबूत करती है,बल्कि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन,तकनीकी स्वायत्तता और सप्लाई चेन में लचीलापन जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए एक भविष्य-दृष्टि वाली रणनीति के रूप में देखी जा रही है।
वन वर्ल्ड आउटलुक में प्रकाशित एक विश्लेषणात्मक लेख के अनुसार,दुनिया आज सप्लाई चेन में बाधाओं,पर्यावरणीय दबावों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तीव्र प्रगति से उत्पन्न परिवर्तनों के दौर से गुजर रही है। ऐसे समय में यह साझेदारी न सिर्फ समयानुकूल है,बल्कि आने वाले दशकों के लिए एक रणनीतिक खाका प्रस्तुत करती है। एसीआईटीआई को तीनों देशों की क्षमताओं और संसाधनों को एक-दूसरे के पूरक रूप में जोड़ते हुए एक मजबूत और स्थायी वैश्विक इकोसिस्टम बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
इस समझौते के तहत तीनों देशों की ताकतें एक-दूसरे को सहारा देती हुई दिखती हैं। ऑस्ट्रेलिया और कनाडा प्राकृतिक संसाधनों और महत्वपूर्ण खनिजों में बेहद समृद्ध हैं। ये देश बैटरी मैन्युफैक्चरिंग,इलेक्ट्रिक वाहनों और ग्रीन इकॉनमी को आगे बढ़ाने वाले डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर हेतु आवश्यक मिनरल्स के मुख्य संरक्षक माने जाते हैं। इनकी तुलना में भारत को एक उभरती हुई मैन्युफैक्चरिंग शक्ति के रूप में देखा जाता है, जहाँ विशाल घरेलू बाजार,बढ़ती एआई क्षमता और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) में तेजी से बढ़ती विशेषज्ञता उसे विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाती है।
लेख में बताया गया है कि यह त्रिपक्षीय साझेदारी क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी को गति देने,सप्लाई चेन को विविध बनाने और विश्वभर में भरोसेमंद मानकों की स्थापना के लिए एक प्रभावी और परस्पर लाभकारी इकोसिस्टम तैयार कर रही है। साझेदारी का केंद्रीय बिंदु सप्लाई चेन में बदलाव लाना है। एक ऐसा मुद्दा जो कोविड-19 महामारी के बाद और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के कारण वैश्विक चिंता का विषय बन गया है। महामारी के दौरान सप्लाई चेन में आई बाधाओं ने यह स्पष्ट किया कि किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम पैदा करती है,खासकर तब जब वह स्रोत किसी एक देश या सीमित क्षेत्र में केंद्रित हो।
एसीआईटीआई इस समस्या का समाधान प्रदान करने का प्रयास करता है। इस साझेदारी के माध्यम से तीनों देश लिथियम,कोबाल्ट,रेयर अर्थ एलिमेंट्स और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के लिए मजबूत और लचीली वैल्यू चेन बनाने की दिशा में काम करेंगे। यह न केवल जिम्मेदार और सतत सोर्सिंग को बढ़ावा देगा,बल्कि सर्कुलर इकॉनमी के सिद्धांतों को भी मजबूत करेगा,जो पर्यावरण संरक्षण और संसाधन स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
इस साझेदारी का एक और महत्वपूर्ण स्तंभ ग्रीन एनर्जी इनोवेशन है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और भारत नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के अनुसंधान,विकास और कार्यान्वयन पर मिलकर काम करने जा रहे हैं। इसमें ग्रीन हाइड्रोजन,उन्नत ऊर्जा भंडारण तकनीकें और एडवांस्ड क्लीन-टेक सिस्टम जैसे क्षेत्र शामिल हैं। दुनिया के कई हिस्सों में जलवायु परिवर्तन की गंभीरता पहले ही सामने आ चुकी है,जिसके चलते क्लीन एनर्जी टेक्नोलॉजी की माँग में तेज़ी आई है। ऐसे में तीनों देशों का साझा प्रयास वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन के लिए एक मजबूत मॉडल बन सकता है।
ऑस्ट्रेलिया और कनाडा पहले से ही बड़े नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करने की दिशा में योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहे हैं,जबकि भारत अपनी विशाल ऊर्जा जरूरतों और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के साथ इस प्रयास में अहम भूमिका निभा सकता है। भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग और नवीकरणीय इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी से हो रहा विस्तार इस सहयोग को और अधिक प्रभावी बनाता है। यह साझेदारी न केवल भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगी,बल्कि उसे वैश्विक ऊर्जा तकनीक के अग्रणी हितधारकों में भी शामिल कर सकती है।
एसीआईटीआई को आने वाले समय में एक बहुआयामी मॉडल के रूप में देखा जा रहा है,जो सिर्फ तकनीकी नवाचार या खनिज आपूर्ति तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में लचीलापन,विविधता और स्थिरता को बढ़ावा देगा। यह समझौता अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का एक नया उदाहरण है,जहाँ तीन लोकतांत्रिक देश मिलकर एक बदलती दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लिए एकीकृत दृष्टिकोण विकसित कर रहे हैं।
जोहान्सबर्ग में हुए इस हस्ताक्षर ने साफ संकेत दिया है कि वैश्विक राजनीति के बदलते परिदृश्य में भारत,ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों के बीच सहयोग सिर्फ विकल्प नहीं,बल्कि आवश्यकता बन गया है। एसीआईटीआई साझेदारी के माध्यम से तीनों देश न केवल अपनी-अपनी ज़रूरतों को मज़बूत करेंगे,बल्कि वैश्विक विकास की दिशा भी नए सिरे से तय करेंगे। यह सहयोग,विशेषकर क्लीन एनर्जी और तकनीकी स्वायत्तता के क्षेत्रों में,दुनिया के लिए एक स्थायी और सुरक्षित भविष्य की ओर कदम बढ़ाने का एक उल्लेखनीय प्रयास है।
