भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी.आर. गवई (तस्वीर क्रेडिट@anod_zote)

पूर्व सीजेआई बी.आर. गवई का बड़ा बयान: “संविधान की मूल आत्मा अटल,बदलना संभव नहीं”

नई दिल्ली,27 नवंबर (युआईटीवी)- सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने संविधान की ताकत,उसकी स्थिरता और उसकी अटल संरचना पर बेहद स्पष्ट और सशक्त विचार रखते हुए देशभर में चल रही संवैधानिक बहसों को एक नई दिशा दी है। उन्होंने न सिर्फ संविधान की मजबूती पर विश्वास जताया,बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि भारत का लोकतंत्र तीनों प्रमुख संस्थाओं—विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका के साझा प्रयासों से ही सुरक्षित रह सकता है। गवई के ये बयान ऐसे समय में आए हैं,जब देश में संविधान के भविष्य,उसके बदलाव और संस्थाओं की शक्तियों पर व्यापक चर्चाएँ हो रही हैं।

पूर्व सीजेआई ने दो टूक कहा, “संविधान बदला नहीं जा सकता।” यह वक्तव्य उन्होंने 1973 के ऐतिहासिक केस केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के संदर्भ में दिया,जिसमें सुप्रीम कोर्ट की 13 जजों की बेंच ने यह ऐतिहासिक निर्णय दिया था कि संसद संविधान के ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ यानी मूल संरचना में किसी प्रकार का संशोधन नहीं कर सकती। यह फैसला भारतीय संवैधानिक इतिहास की नींव माना जाता है और इसी ने यह सुनिश्चित किया कि संविधान की आत्मा,उसका मूल दर्शन और इसकी आधारभूत संरचना किसी भी राजनीतिक परिस्थिति या बहुमत के दबाव में नहीं बदली जा सकती। गवई ने इस फैसले पर भरोसा जताते हुए कहा कि संविधान की जिन बुनियादी अवधारणाओं—जैसे न्याय,स्वतंत्रता,समानता और भाईचारा पर आधुनिक भारत खड़ा है,वे अडिग हैं और उन्हें कोई खतरा नहीं है।

देश में हाल के वर्षों में संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता,तंत्रों के संतुलन और अधिकारों के समीकरण को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है। कई राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या संविधान अपनी मौजूदा संरचना में आगे भी उतनी ही प्रभावी भूमिका निभा पाएगा। गवई ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए कहा कि भारत का संविधान दुनिया के सबसे मजबूत और संतुलित संविधानों में से एक है। उन्होंने कहा कि इसे खतरे में बताने का कोई आधार नहीं है क्योंकि इसमें देश की विविधता,जटिलता और लोकतांत्रिक संरचना को समझते हुए ही अत्यंत सोच-समझकर प्रावधान किए गए हैं। उनका कहना था कि संविधान के निर्माता इस दूरदृष्टि के साथ काम कर रहे थे कि भविष्य में भारत का सामाजिक और राजनीतिक ढाँचा कैसा होगा और कौन सी चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं।

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के सपनों और विजन पर बोलते हुए गवई भावुक दिखाई दिए। उन्होंने कहा कि अंबेडकर ने केवल राजनीतिक न्याय का उद्देश्य नहीं रखा था,बल्कि उनका सपना सामाजिक और आर्थिक न्याय की स्थापना का था। अंबेडकर को यह विश्वास था कि राजनीतिक लोकतंत्र तभी सार्थक और प्रभावी हो सकता है,जब समाज में समानता,अवसरों की स्वतंत्रता और आर्थिक सशक्तिकरण की स्थिति भी सुनिश्चित हो। गवई ने स्पष्ट कहा, “भारत में लोकतंत्र सिर्फ चुनावों तक सीमित नहीं हो सकता। लोकतंत्र आगे बढ़ता है,जब सामाजिक और आर्थिक रूप से भी समता कायम हो,जब हर व्यक्ति सम्मान के साथ जी सके।”

पूर्व सीजेआई ने देश की तीन प्रमुख संस्थाओं—विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन और सहयोग पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि ये तीनों स्तंभ लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए एक-दूसरे के साथ तालमेल से काम करें। उन्होंने यह भी कहा कि संस्थाओं के बीच टकराव या अविश्वास की भावना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बाधक बन सकती है,इसलिए बेहतर होगा कि हर संस्था अपनी सीमाओं और जिम्मेदारियों को अच्छी तरह समझते हुए दूसरे तंत्र का सम्मान करे। उनका मानना है कि लोकतंत्र तभी फल-फूलेगा जब ये तीनों संस्थाएँ संविधान के मूल्यों और दिशानिर्देशों का पालन करते हुए एक साझा लक्ष्य की ओर बढ़ें और वह लक्ष्य है नागरिकों की भलाई और उनका संरक्षण।

गवई ने यह भी कहा कि न्यायपालिका को लोगों की पहुँच में और ज्यादा सरल और सुलभ बनाने की जरूरत है। कई वर्षों से न्याय प्रणाली में लंबित मामलों,अदालतों की धीमी प्रक्रिया और जनता के बढ़ते बोझ को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। उन्होंने संकेत दिया कि देश की न्याय व्यवस्था में सुधार के लिए तकनीकी सहायता,डिजिटल ढाँचे का विस्तार और न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना जरूरी है। उनका मानना है कि मजबूत और संवेदनशील न्याय व्यवस्था संविधान की आत्मा को जीवित रखती है।

पूर्व सीजेआई के इन बयानों का असर सिर्फ संवैधानिक चर्चाओं तक सीमित नहीं है,बल्कि इससे यह संदेश भी गया है कि भारत का संविधान किसी भी परिस्थिति में डगमगाने वाला नहीं है। यह केवल कानूनी दस्तावेज नहीं,बल्कि सामाजिक न्याय,स्वतंत्रता और समान अधिकारों का ऐसा संकल्प है,जो हर नागरिक की गरिमा की रक्षा करता है। गवई ने स्पष्ट कर दिया है कि संविधान की यह मूल आत्मा न तो बदली जा सकती है और न ही इसे समाप्त किया जा सकता है। यह बयान आज के समय में संविधान को लेकर उठ रही शंकाओं और राजनीतिक वाद-विवादों के बीच एक महत्वपूर्ण और दिशा देने वाला संदेश है।