बांग्लादेश की पूर्व और प्रथम महिला प्रधानमंत्री खालिदा जिया (तस्वीर क्रेडिट@ACP_SURINDER_K)

खालिदा ज़िया का अंतिम सफर: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री को राष्ट्र ने दी भावभीनी विदाई

ढाका,31 दिसंबर (युआईटीवी)- बांग्लादेश की राजनीति में एक युग का अंत 30 दिसंबर 2025 को उस समय हो गया,जब देश की पूर्व और प्रथम महिला प्रधानमंत्री बेगम खालिदा ज़िया का निधन हो गया। लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रहीं खालिदा ज़िया का उपचार ढाका के एवरकेयर अस्पताल में चल रहा था,जहाँ मंगलवार सुबह करीब छह बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास का वह अध्याय भी शांत हो गया,जिसमें सत्ता, संघर्ष,विपक्ष और लोकतांत्रिक आंदोलन का लंबा सफर शामिल रहा।

खालिदा ज़िया के पार्थिव शरीर को बुधवार सुबह अस्पताल से उनके बेटे और बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान के गुलशन स्थित आवास पर ले जाया गया। उनका शव बांग्लादेश के लाल-हरे राष्ट्रीय ध्वज में लिपटा हुआ था। सुबह करीब 8:55 बजे निकली फ्रीजर-वैन जब 9:16 बजे गुलशन पहुँचीं,तो माहौल गमगीन हो उठा। परिजनों,पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की आँखों में आँसू थे। रातभर अस्पताल की मॉर्चरी में रखे गए शव की सुरक्षा और व्यवस्था के लिए पुलिस की भारी तैनाती भी की गई थी,ताकि भीड़ के बीच शांति बनाए रखी जा सके।

गुलशन आवास पर कुछ समय के लिए अंतिम दर्शन की व्यवस्था की गई,जिसके बाद तय कार्यक्रम के अनुसार खालिदा ज़िया का पार्थिव शरीर राष्ट्रीय संसद भवन के दक्षिण प्लाजा ले जाया गया। दोपहर दो बजे वहाँ उनकी नमाज़-ए-जनाज़ा अदा की जानी थी। बेगम खालिदा के जनाज़े का नेतृत्व बैतुल मुकर्रम नेशनल मस्जिद के खतीब ने किया,जबकि कार्यवाही का संचालन बीएनपी स्टैंडिंग कमेटी के वरिष्ठ नेता नजरुल इस्लाम खान ने सँभाला। बीएनपी महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने सभी उपस्थित लोगों से अनुशासन बनाए रखने की अपील की और कहा कि यह समय केवल शोक,सम्मान और प्रार्थना का है। उन्होंने देशवासियों से दुआ करने को कहा कि अल्लाह जिया परिवार को यह बड़ा दुख सहने की शक्ति दे और विशेष रूप से तारिक रहमान को देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने का साहस प्रदान करे।

अंतिम संस्कार में केवल बांग्लादेश ही नहीं,बल्कि कई पड़ोसी देशों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। नेपाल के विदेश मंत्री बाला नंद शर्मा अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए विशेष रूप से ढाका पहुँचे। नेपाल सरकार की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि यह यात्रा,खालिदा ज़िया के उन योगदानों के प्रति सम्मान का प्रतीक है,जिनसे उनके कार्यकाल के दौरान नेपाल-बांग्लादेश संबंध मजबूत हुए थे। भारत की ओर से विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी जनाज़े में शामिल हुए,जबकि पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के स्पीकर सरदार अयाज सादिक ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह स्पष्ट संदेश गया कि खालिदा ज़िया न केवल घरेलू राजनीति में बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति में भी एक महत्वपूर्ण शख्सियत रही थीं।

जनाज़े के बाद खालिदा ज़िया को ढाका के शेर-ए-बांग्ला नगर स्थित जिया उद्यान में उनके पति और पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान की कब्र के पास सुपुर्द-ए-खाक किया गया। इसी स्थान को पार्टी और परिवार ने उनकी अंतिम विश्रामस्थली के रूप में चुना था,ताकि वह जीवन के बाद के सफर में भी अपने जीवनसाथी के पास रह सकें। दफन के दौरान माहौल अत्यंत भावुक था। बीएनपी कार्यकर्ता “अल्लाह उन्हें जन्नत नसीब करे” जैसी दुआओं के साथ अपने नेता को विदा कर रहे थे।

खालिदा ज़िया को 23 नवंबर को तब अस्पताल में भर्ती कराया गया था,जब उनकी तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ गई। उन्हें फेफड़ों और हृदय में संक्रमण था,साथ ही कई पुरानी बीमारियों के चलते स्थिति जटिल बनी हुई थी। डॉक्टरों ने उनकी हालत को लेकर परिवार को लगातार जानकारी दी और बीच-बीच में विदेश में बेहतर इलाज की संभावना भी टटोलने की कोशिश की गई। हालाँकि,डॉक्टरों ने साफ कर दिया था कि उनकी सेहत यात्रा के लायक स्थिर नहीं है। लगभग एक महीने से अधिक चले इलाज के बाद आखिरकार चिकित्सा जगत भी उन्हें बचा नहीं सका।

खालिदा ज़िया का राजनीतिक जीवन उतार-चढ़ाव से भरा रहा। बीएनपी की नेता के रूप में उन्होंने कई बार सत्ता और विपक्ष दोनों की भूमिका निभाई। वे बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं और उनके नेतृत्व में देश की राजनीतिक दिशा कई बार तय हुई। आलोचनाओं और विवादों के बीच भी वह अपने समर्थकों के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और लोकतांत्रिक संघर्ष का प्रतीक बनी रहीं। भ्रष्टाचार के आरोप,जेल जाना,स्वास्थ्य संकट और राजनीतिक प्रतिबंध—इन सबके बावजूद उन्होंने अपने विचारों और पार्टी के एजेंडे को जीवित रखने की कोशिश जारी रखी।

उनकी बीमारी के दौरान बीएनपी ने कई मौकों पर सरकार से मानवीय आधार पर विदेशी इलाज की अनुमति माँगी,लेकिन कानूनी और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से यह संभव नहीं हो सका। यही वजह रही कि पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच एक भावुकता थी कि अगर बेहतर सुविधा मिल पाती तो शायद हालात कुछ और होते। हालाँकि,डॉक्टरों का कहना था कि उनकी स्थिति लंबे समय से जटिल थी और उनके महत्वपूर्ण अंग कमजोर पड़ चुके थे।

उनके निधन के बाद बांग्लादेश के राजनीतिक परिदृश्य में एक खालीपन महसूस किया जा रहा है। विरोधी दलों के नेताओं ने भी शोक व्यक्त करते हुए कहा कि असहमति के बावजूद खालिदा ज़िया एक मजबूत राजनीतिक व्यक्तित्व थीं,जिनकी भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। कई विश्लेषकों का मानना है कि उनका जाना बीएनपी के लिए चुनौतीपूर्ण वक्त लेकर आएगा,क्योंकि पार्टी पहले ही नेतृत्व और रणनीति के मोड़ पर खड़ी है। अब तारिक रहमान पर पार्टी की नई दिशा तय करने की बड़ी जिम्मेदारी आ गई है।

अंतिम संस्कार के अवसर पर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। संसद परिसर, गुलशन और शेर-ए-बांग्ला नगर के आसपास पुलिस और विशेष बलों की तैनाती की गई,ताकि भीड़ नियंत्रण और यातायात व्यवस्था बनी रहे। सरकार ने भी आधिकारिक रूप से शोक संदेश जारी कर देशवासियों से शांतिपूर्ण तरीके से दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि देने की अपील की।

बांग्लादेश की जनता के लिए खालिदा ज़िया केवल एक राजनीतिक चेहरा नहीं थीं,बल्कि वे उस दौर की प्रतिनिधि थीं,जब देश लोकतांत्रिक संस्थाओं और सत्ता संतुलन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयोग कर रहा था। उनके समर्थक उन्हें एक साहसी नेता के रूप में याद करते हैं,जिसने मुश्किल हालात में भी पीछे हटने से इनकार किया। वहीं उनके आलोचक मानते हैं कि उनके कुछ फैसलों ने राजनीतिक टकराव बढ़ाया,लेकिन दोनों ही पक्ष इस बात से सहमत दिखे कि उन्होंने बांग्लादेश की राजनीति पर गहरी छाप छोड़ी।

आखिरकार,30 दिसंबर का दिन देश के लिए शोक और चिंतन का प्रतीक बन गया। एक नेता चली गई,लेकिन उनके साथ जुड़ी कहानियाँ,उपलब्धियाँ,विवाद और संघर्ष इतिहास के पन्नों में दर्ज रहेंगे। खालिदा ज़िया अब जिया उद्यान की मिट्टी में सदा के लिए समा चुकी हैं,जहाँ उनका नाम बांग्लादेश के राजनीतिक सफर के साथ हमेशा जुड़ा रहेगा।