वाशिंगटन,31 दिसंबर (युआईटीवी)- यमन में बिगड़ती स्थिति और पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा पर बढ़ती चिंताओं के बीच अमेरिका ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता को और तेज कर दिया है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के शीर्ष नेताओं से अलग-अलग फोन पर बातचीत की,ताकि क्षेत्रीय तनाव,समुद्री सुरक्षा और यमन संघर्ष से जुड़े मुद्दों पर सामूहिक रणनीति को मजबूत किया जा सके। अमेरिकी सरकार की ओर से जारी आधिकारिक बयान के अनुसार,यह संवाद ऐसे समय में हो रहा है जब यमन की अस्थिरता न केवल मानवीय संकट को गहराता जा रही है,बल्कि महत्वपूर्ण वैश्विक व्यापार मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति शृंखलाओं के लिए भी जोखिम पैदा कर रही है।
पहली बातचीत संयुक्त अरब अमीरात के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान के साथ हुई। दोनों नेताओं ने यमन की मौजूदा परिस्थिति पर विस्तार से चर्चा की और इस बात पर जोर दिया कि संघर्ष को केवल सैन्य उपायों से नहीं,बल्कि टिकाऊ राजनीतिक समाधान के जरिये ही समाप्त किया जा सकता है। बातचीत के दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा,स्थिरता और समुद्री मार्गों की सुरक्षा से जुड़े व्यापक मुद्दों पर भी विचार-विमर्श हुआ। यमन के दक्षिणी तट से गुजरने वाले समुद्री रास्ते वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं और हाल के महीनों में वहाँ बढ़े हमलों ने शिपिंग कंपनियों को सतर्क कर दिया है। इस पृष्ठभूमि में अमेरिका और यूएई के बीच यह संवाद संभावित जोखिमों को कम करने और सामूहिक सुरक्षा ढाँचे को मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री ने सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद से भी फोन पर बातचीत की। दोनों देशों के बीच यमन मुद्दे पर पहले से ही घनिष्ठ समन्वय रहा है और इस बातचीत में भी क्षेत्रीय स्थिरता,सुरक्षा साझेदारी और मानवीय सहायता के पहलुओं पर जोर दिया गया। सऊदी अरब लंबे समय से यमन संघर्ष में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से शामिल रहा है और उसकी भूमिका इस संकट के किसी भी संभावित समाधान में निर्णायक मानी जाती है। बातचीत से साफ संकेत मिलता है कि वाशिंगटन खाड़ी क्षेत्र के अपने प्रमुख साझेदारों के साथ तालमेल बनाए रखते हुए यमन में तनाव कम करने की दिशा में बहुपक्षीय प्रयासों को गति देना चाहता है।
यमन में पिछले एक दशक से अधिक समय से जारी संघर्ष ने देश की अर्थव्यवस्था,स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक संरचना को लगभग ढहा दिया है। हूती बलों और सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच टकराव के कारण लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं,जबकि स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी,खाद्य संकट और बेरोजगारी ने मानवीय त्रासदी को और गहरा कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र ने इसे दुनिया के सबसे गंभीर मानवीय संकटों में से एक बताया है। हालाँकि,बीते वर्षों में कई बार संघर्ष विराम और संवाद के प्रयास हुए,लेकिन भरोसे की कमी,बाहरी दखलंदाजी और आंतरिक राजनीतिक विभाजन के कारण स्थायी शांति अभी भी दूर नजर आती है।
अमेरिका लगातार यह तर्क देता रहा है कि क्षेत्रीय देशों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को मिलकर काम करना होगा,तभी इस संघर्ष का राजनीतिक समाधान संभव है। वाशिंगटन की चिंताओं में केवल यमन का आंतरिक हालात ही शामिल नहीं,बल्कि इसका असर पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा पर पड़ रहा है। लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों पर खतरे बढ़ने से वैश्विक बाजार भी प्रभावित हुए हैं। ऊर्जा कीमतों पर दबाव,सप्लाई चेन में व्यवधान और बीमा लागत में बढ़ोतरी जैसे परिणाम अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। ऐसे में अमेरिका की कोशिश है कि कूटनीतिक दबाव और संवाद के माध्यम से स्थिति को स्थिर किया जाए और समुद्री सुरक्षा को मजबूत बनाया जाए।
यूएई और सऊदी अरब दोनों ही देशों ने बीते वर्षों में यमन संकट से जुड़े सैन्य अभियानों के साथ मानवीय राहत कार्यों में भी भूमिका निभाई है। हालाँकि,अंतर्राष्ट्रीय मंच पर इन अभियानों को लेकर आलोचनाएँ भी होती रही हैं,खासकर नागरिक हताहतों और बुनियादी ढाँचों को हुए नुकसान को लेकर। विशेषज्ञों का मानना है कि अब क्षेत्रीय शक्तियाँ भी समझ रही हैं कि लंबे समय तक जारी रहने वाला यह संघर्ष न तो सैन्य रूप से जीता जा सकता है और न ही इससे किसी पक्ष को स्थायी लाभ मिल सकता है। इसी कारण कूटनीतिक पहल और बातचीत के रास्ते को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे बढ़ रही है।
रुबियो की इन फोन बातचीतों को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है। उनका उद्देश्य यमन संकट के समाधान के लिए एक साझा दृष्टिकोण तैयार करना,मानवीय सहायता को मजबूत करना और समुद्री मार्गों पर शांति बनाए रखने के प्रयासों को समन्वित करना है। अमेरिकी अधिकारियों ने साफ संकेत दिया है कि वाशिंगटन यमन से जुड़ी राजनीतिक प्रक्रिया में संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रयासों का समर्थन करता रहेगा। साथ ही,अमेरिका यह भी चाहता है कि क्षेत्रीय देश आपसी संवाद और विश्वास-निर्माण के उपायों को बढ़ावा दें,ताकि किसी भी गलत अनुमान या आकस्मिक टकराव की संभावना को कम किया जा सके।
हालाँकि,चुनौतियाँ अभी भी कम नहीं हैं। देश के भीतर मौजूद विभिन्न सशस्त्र गुट, गहरी राजनीतिक खाइयाँ और बाहरी भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा,सभी मिलकर शांति प्रक्रिया को जटिल बनाते हैं। इसके अलावा,आर्थिक पुनर्निर्माण,प्रशासनिक क्षमता बहाली और संस्थागत सुधार जैसे मुद्दे भी यमन के भविष्य के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं,जितना कि युद्धविराम। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय समन्वित तरीके से काम करे और स्थानीय हितधारकों को प्रक्रिया के केंद्र में रखा जाए,तभी स्थायी समाधान की दिशा में वास्तविक प्रगति संभव हो पाएगी।
अमेरिका की हालिया कूटनीतिक सक्रियता यह संकेत देती है कि वाशिंगटन यमन को केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष के रूप में नहीं,बल्कि व्यापक सुरक्षा चुनौती के रूप में देख रहा है। फोन कूटनीति के माध्यम से यूएई और सऊदी अरब जैसे साझेदारों के साथ निरंतर संवाद इस लक्ष्य का हिस्सा है कि तनाव को नियंत्रित किया जाए,मानवीय पीड़ा को कम किया जाए और राजनीतिक समाधान के लिए अनुकूल माहौल बनाया जाए। आने वाले हफ्तों और महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ये प्रयास जमीन पर भरोसे और स्थिरता का नया अध्याय लिख पाते हैं या फिर यमन संकट एक बार फिर क्षेत्रीय अस्थिरता की लंबी कहानी का हिस्सा बनकर रह जाता है।
