धर्मेंद्र की अंतिम फिल्म ‘इक्कीस’ पर उठा भावनाओं का सैलाब (तस्वीर क्रेडिट@Anilsharma_dir)

धर्मेंद्र की अंतिम फिल्म ‘इक्कीस’ पर उठा भावनाओं का सैलाब,सितारों ने कहा—इससे बेहतर विदाई संभव नहीं

नई दिल्ली,31 दिसंबर (युआईटीवी)- नया साल करीब है और फिल्म इंडस्ट्री जश्न की तैयारियों में मशगूल दिख रही है,लेकिन इसी बीच निर्देशक श्रीराम राघवन की फिल्म ‘इक्कीस’ चर्चा के केंद्र में आ गई है। यह चर्चा सिर्फ इसलिए नहीं कि यह एक बड़े बजट की वॉर ड्रामा है,बल्कि इसलिए भी कि इसे दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म माना जा रहा है। 29 दिसंबर को मुंबई में आयोजित इसकी खास स्क्रीनिंग में बॉलीवुड के कई नामचीन चेहरे सलमान खान,सनी देओल,बॉबी देओल और रेखा जैसी हस्तियाँ मौजूद रहीं। स्क्रीनिंग के बाद जो प्रतिक्रियाएँ सामने आईं,उन्होंने इस फिल्म को लेकर दर्शकों की उत्सुकता को कई गुना बढ़ा दिया।

फिल्म देखने के बाद जिन लोगों की प्रतिक्रियाएँ सबसे अधिक सुर्खियों में रहीं,उनमें प्रमुख नाम है अनिल शर्मा का। अपने निर्देशन और संवेदनशील कहानियों के लिए पहचाने जाने वाले अनिल शर्मा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर भावुक हो उठे। उन्होंने लिखा कि जैसे ही उन्होंने पर्दे पर धर्मेंद्र को देखा,उनका दिल भर आया। नम आँखों के साथ इस महान अभिनेता को देखना उनके लिए एक अलग अनुभव रहा। अनिल शर्मा के शब्दों में,धर्मेंद्र का अभिनय हमेशा की तरह गरिमापूर्ण है—बिना ज्यादा बोले वह अपने चेहरे के भाव और सधी हुई प्रस्तुति से बहुत कुछ कह जाते हैं। उन्होंने माना कि कुछ कलाकारों में यह दुर्लभ क्षमता होती है कि वे अपने किरदार के जरिये सीधे दिल को छू लेते हैं और धर्मेंद्र उन्हीं कलाकारों में से एक हैं।

अनिल शर्मा ने फिल्म की पूरी टीम—लेखक,निर्देशक,टेक्नीशियन और कलाकारों को दिल से बधाई दी। उनके मुताबिक ‘इक्कीस’ सिर्फ एक फिल्म नहीं,बल्कि एक भावपूर्ण अनुभव है,जो दर्शकों के दिल में देर तक बना रहता है। उन्होंने यह भी कहा कि धर्मेंद्र हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगे। उनकी मौजूदगी ही परदे पर एक अपनापन पैदा करती है। शर्मा ने फिल्म के लीड एक्टर अगस्त्य नंदा के काम को “सच्चा और असरदार” बताते हुए कहा कि उन्होंने एक कठिन किरदार को बेहद ईमानदारी से निभाया है।

केवल अनिल शर्मा ही नहीं,बल्कि कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा ने भी फिल्म को लेकर अपनी भावनाएँ साझा कीं। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि ‘इक्कीस’ दिल से बनायी गई फिल्म है। इसकी कहानी भले ही सादी लगे,लेकिन उसका प्रभाव गहरा और लंबे समय तक याद रहने वाला है। छाबड़ा के अनुसार,फिल्म खत्म होने के बाद भी उसके दृश्य और संवाद मन में घूमते रहते हैं। उन्होंने धर्मेंद्र के अभिनय की प्रशंसा करते हुए कहा कि यदि वाकई यह उनकी आखिरी फिल्म है,तो इसे एक सुंदर और सम्मानजनक विदाई माना जा सकता है।

मुकेश छाबड़ा ने अभिनेता जयदीप अहलावत के प्रदर्शन को भी विशेष तौर पर सराहा। उन्होंने कहा कि जयदीप ने अपने किरदार में जिस तरह का तीखापन और संवेदनशीलता जोड़ी है,वह फिल्म की आत्मा को और मजबूत बनाती है। साथ ही, उन्होंने युवा कलाकारों—अगस्त्य नंदा और सिमर भाटिया के सहज और स्वाभाविक अभिनय की तारीफ की। दोनों के बीच की केमिस्ट्री फिल्म के भावनात्मक हिस्सों को विश्वसनीय बनाती है। अगस्त्य की मासूमियत और ईमानदारी उनके हर दृश्य में झलकती है,जबकि सिमर ने अपने किरदार को गरिमा और संवेदनशीलता के साथ निभाया है। इसी तरह,विवान शाह और सिकंदर खेर के काम को भी उन्होंने प्रभावी बताया,जो कहानी को गति और गहराई दोनों देते हैं।

निर्देशक श्रीराम राघवन के बारे में छाबड़ा ने लिखा कि उन्होंने एक सच्ची घटना को अत्यधिक सजावट के बिना,सरल लेकिन प्रभावी ढंग से पेश किया है। राघवन,जो थ्रिलर शैली में अपनी अलग पहचान रखते हैं,इस बार युद्ध और बलिदान की कहानी के साथ सामने आए हैं और उनका दृष्टिकोण फिल्म को विशिष्ट बनाता है।

दरअसल, ‘इक्कीस’ की कहानी 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यह फिल्म सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वीरता को श्रद्धांजलि देती है। वे परमवीर चक्र से सम्मानित नायक थे,जिन्होंने मात्र 21 वर्ष की आयु में देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इसी के प्रतीक के रूप में फिल्म का नाम ‘इक्कीस’ रखा गया है। फिल्म में अरुण खेत्रपाल का किरदार अगस्त्य नंदा निभा रहे हैं,जबकि धर्मेंद्र उनके पिता की भूमिका में नजर आते हैं। पिता-पुत्र के रिश्ते के भावनात्मक पहलू फिल्म को एक मानवीय स्पर्श देते हैं और यही स्पर्श दर्शकों को सबसे अधिक जोड़ता है।

स्क्रीनिंग के बाद कई दर्शकों और फिल्म समीक्षकों ने माना कि ‘इक्कीस’ सिर्फ युद्ध का रोमांच नहीं दिखाती,बल्कि युद्ध के पीछे छिपी संवेदनाएँ—परिवार का दर्द, सैनिकों की जिम्मेदारी और देश के लिए त्याग को गहराई से छूती है। धर्मेंद्र का किरदार इस भावनात्मक धुरी पर खड़ा है। उनकी शांत लेकिन प्रभावशाली उपस्थिति हर दृश्य में एक गरिमा लेकर आती है। वे एक ऐसे पिता के रूप में नज़र आते हैं,जो बेटे पर गर्व करता है,पर साथ ही दिल के किसी कोने में डर और चिंता भी पलती रहती है। यही द्वंद्व फिल्म के कई दृश्यों को बेहद असरदार बनाता है।

बॉलीवुड के लिए भी यह पल भावनात्मक है। दशकों तक अपने करिश्मे और सादगी से दर्शकों का मनोरंजन करने वाले धर्मेंद्र,अगर वास्तव में इस फिल्म के साथ अपने करियर का अध्याय समाप्त कर रहे हैं,तो यह एक ऐसी विदाई है,जिसमें सम्मान,प्यार और यादों का मेल है। उनकी पीढ़ी के साथ बड़े हुए दर्शक हों या नई उम्र के सिनेमाप्रेमी—सबके लिए धर्मेंद्र एक ऐसी स्मृति हैं,जो समय के साथ और भी खुशनुमा होती जाती है।

फिल्म इंडस्ट्री में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि ‘इक्कीस’ आने वाले समय में उन फिल्मों में शामिल हो सकती है,जिन्हें बार-बार देखकर भी भावनाएँ ताजा महसूस होती हैं। युद्ध आधारित फिल्मों में जहाँ कई बार केवल दृश्य प्रभावों पर जोर दिया जाता है,वहीं ‘इक्कीस’ दिल को छू लेने वाले मानवीय पहलुओं को सामने लाती है। यही कारण है कि स्क्रीनिंग से निकलने के बाद कई लोग चुपचाप बैठे रह गए—मानो वे अपने भीतर उमड़ती भावनाओं को शब्द देना भूल गए हों।

नए साल की दहलीज पर खड़ा बॉलीवुड जब नई रिलीज़,नए ट्रेंड और बड़े बजट की फिल्मों की बात कर रहा है,तब ‘इक्कीस’ एक अलग तरह की चर्चा का हिस्सा बनी हुई है—यह चर्चा स्मृतियों, सम्मान और बलिदान की है। धर्मेंद्र को लेकर जो प्रेम और सम्मान दर्शकों के दिलों में है,वह इस फिल्म के जरिए एक बार फिर सामने आता है। शायद इसी वजह से लोग कह रहे हैं कि अगर यह उनकी आखिरी फिल्म है,तो इससे बेहतर और क्या हो सकता था—एक ऐसी कहानी जो नायकत्व,राष्ट्रप्रेम और मानवीय संवेदनाओं को साथ लेकर आगे बढ़ती है।

आने वाले दिनों में ‘इक्कीस’ सिनेमाघरों तक पहुँचेगी और तब यह साफ हो जाएगा कि दर्शक इसे किस तरह स्वीकार करते हैं,लेकिन स्क्रीनिंग के बाद फैली प्रतिक्रियाओं ने एक बात तय कर दी है। यह फिल्म भावनाओं का एक गहरा अध्याय खोलती है और धर्मेंद्र, अपने सधे हुए अभिनय के साथ,इस अध्याय को हमेशा के लिए यादगार बना देते हैं।