नई दिल्ली,1 जनवरी (युआईटीवी)- दुनिया के महानतम निवेशकों में शुमार वॉरेन बफे के लिए बुधवार का दिन एक युग का अंतिम अध्याय था। 95 वर्ष की उम्र में बर्कशायर हैथवे के सीईओ के रूप में उनका आखिरी दिन न केवल एक पद से विदाई थी,बल्कि उस विचारधारा का भी समापन था,जिसने आधुनिक निवेश की दिशा ही बदल दी। जिस कंपनी के शेयर कभी 19 डॉलर पर ठहरे रहते थे,उसी बर्कशायर हैथवे का क्लास ए शेयर आज 7,55,400 डॉलर के करीब पहुँच चुका है। यह कहानी सिर्फ किसी कंपनी की नहीं,बल्कि धैर्य,अनुशासन और दीर्घकालिक सोच के उस अनोखे मिश्रण की दास्तां है,जिसने वॉरेन बफे को “ओमाहा के ओरेकल” की उपाधि दिलाई।
जब 1965 में बफे ने बर्कशायर की कमान सँभाली,तब यह एक संघर्षरत कपड़ा कंपनी थी। व्यवसाय घट रहा था,मुनाफा लगभग नहीं के बराबर था और भविष्य धुँधला दिखाई देता था। शुरुआती वर्षों में बफे ने जल्दबाजी नहीं की। उन्होंने कंपनी की बैलेंस शीट सुधारी,नकदी के प्रबंधन को मजबूत किया और पूँजी का उपयोग वहाँ किया,जहाँ उसका अधिकतम प्रतिफल मिल सकता था,लेकिन जिस फैसले ने वास्तव में बर्कशायर की किस्मत बदल दी,वह 1970 और 1980 के दशक में आया — जब बफे ने धीरे-धीरे कपड़ा कारोबार से बाहर निकलकर बीमा क्षेत्र में बड़ा दांव लगाया। नेशनल इंडेम्निटी और बाद में जीइको जैसी कंपनियों में निवेश ने बर्कशायर को एक मजबूत और स्थिर नकदी प्रवाह दिया,जिसने आगे चलकर अनगिनत अधिग्रहणों और निवेशों का रास्ता खोला।
बीमा से मिले इस “फ्लोट” ने बफे को वे अवसर दिए,जो सामान्य कंपनियों के पास नहीं होते। 1990 के दशक में बर्कशायर के निवेशों ने रफ्तार पकड़ी। कोका-कोला,अमेरिकन एक्सप्रेस और कई अन्य मजबूत ब्रांड उनकी पोर्टफोलियो की पहचान बन गए। बफे का सिद्धांत बेहद सरल था—ऐसी कंपनियाँ खरीदो,जिन्हें आप समझते हो,जिनके पास टिकाऊ प्रतिस्पर्धी बढ़त हो और जिन्हें लंबे समय तक बिना घबराए रखा जा सके। इस रणनीति ने बाजार के उतार-चढ़ाव के बीच भी उन्हें स्थायित्व प्रदान किया।
2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी ने बफे की समझ और साहस की सबसे बड़ी परीक्षा ली। जब निवेशक बाजार से भाग रहे थे,बफे ने गोल्डमैन सैक्स और जनरल इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियों में निवेश किया। आलोचकों को यह जोखिम भरा कदम लगा,लेकिन समय ने साबित किया कि उनका भरोसा सही था। संकट के बाद बर्कशायर और भी मजबूत होकर उभरी और बीमा,रेलवे,ऊर्जा,निर्माण और शेयर बाजार में फैली एक विशाल होल्डिंग कंपनी बन गई। 2020 के बाद एप्पल में उनका निवेश बर्कशायर की सबसे बड़ी सफलता में से एक बन गया। टेक्नोलॉजी कंपनी पर उनका भरोसा न केवल लाभदायक साबित हुआ,बल्कि यह दिखाता है कि उम्र के साथ भी बफे सीखने और बदलने से नहीं डरते थे।
आज बर्कशायर का क्लास ए शेयर 7.5 लाख डॉलर से ऊपर है—लगभग 39 लाख प्रतिशत की ऐतिहासिक बढ़त। यह आँकड़ा किसी जादू से नहीं,बल्कि दशकों तक धैर्य बनाए रखने,अवसरों का इंतजार करने और लालच से दूर रहने का नतीजा है। बफे अक्सर कहते रहे, “बाजार अधीर लोगों से धैर्यवान लोगों को पैसा ट्रांसफर करने की मशीन है।” उनके लिए निवेश सिर्फ धन कमाने का जरिया नहीं,बल्कि अनुशासन और विवेक का परीक्षण था।
लेकिन वॉरेन बफे की कहानी केवल आर्थिक सफलता तक सीमित नहीं रहती। उन्होंने यह भी दिखाया कि विशाल संपत्ति के साथ जिम्मेदारी कैसे निभाई जाती है। 2006 में उन्होंने घोषणा की कि वे अपनी ज्यादातर संपत्ति जिंदा रहते हुए दान करेंगे। यह फैसला उस दौर में चौंकाने वाला था,जब अधिकतर अरबपति अपनी वसीयत के इंतजार में दान की योजना बनाते थे। बफे का मानना था कि जब तक पैसा बढ़ता है,तब तक वह समाज की सेवा के लिए और भी उपयोगी हो सकता है। इसलिए उन्होंने हर साल अपने बर्कशायर के शेयर विभिन्न फाउंडेशनों को दान करने शुरू किए।
2021 तक वे करीब 44 अरब डॉलर दान कर चुके थे। 2024 तक यह आँकड़ा 57 अरब डॉलर और 2025 के अंत तक 61 अरब डॉलर से ऊपर चला गया। सिर्फ 2025 में ही उन्होंने लगभग 6 अरब डॉलर के शेयर दान किए जिनमें से अधिकांश बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन को गए,जबकि बाकी उनके परिवार द्वारा चलाए जा रहे फाउंडेशनों को मिले। स्वास्थ्य,शिक्षा,गरीबी उन्मूलन,महिलाओं के अधिकार और समुदाय विकास—इन सभी क्षेत्रों में उनके दान का प्रभाव आज दुनिया भर में दिखता है। बफे ने कोई विशाल व्यक्तिगत संस्था नहीं बनाई,बल्कि मौजूदा,अनुभवी संस्थानों को संसाधन देकर प्रभाव को ज्यादा व्यापक किया।
दिलचस्प बात यह है कि इतना दान करने के बाद भी वे अभी दुनिया के सबसे अमीर लोगों में शामिल हैं। फोर्ब्स के अनुसार,उनकी कुल संपत्ति लगभग 148 अरब डॉलर है और बर्कशायर में अब भी उनके पास करीब 13.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है। उन्होंने कभी अपने शेयर नहीं बेचे। उनका कहना था कि दान करना पूँजीवाद के खिलाफ नहीं,बल्कि उसका नैतिक और सार्थक निष्कर्ष है। उनकी वसीयत के अनुसार,मौत के बाद भी उनकी कुल संपत्ति का 99.5 प्रतिशत हिस्सा ट्रस्ट के माध्यम से समाज को सौंप दिया जाएगा। अपने बच्चों के बारे में उनका प्रसिद्ध कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है—“मैं उन्हें इतना देना चाहता हूँ कि वे जो चाहें कर सकें,लेकिन इतना नहीं कि वे कुछ भी न करें।”
31 दिसंबर 2025 को जब बफे सीईओ के रूप में रिटायर हुए,तब उन्होंने केवल एक असाधारण रिटर्न का रिकॉर्ड नहीं छोड़ा,बल्कि निवेश की समझ और मानवीय मूल्यों का एक ऐसा मानक स्थापित किया जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा। बफे ने साबित किया कि असली सफलता तेजी से अमीर बनने में नहीं,बल्कि समय के साथ स्थिर,टिकाऊ और जिम्मेदार तरीके से संपत्ति बनाने में है। उन्होंने यह भी दिखाया कि अरबों डॉलर कमाने के बाद भी सादगी,विनम्रता और सामाजिक दायित्व जैसे मूल्य किसी भी सीईओ या निवेशक की सबसे बड़ी पूँजी हो सकते हैं।
बर्कशायर हैथवे आज एक ऐसी विरासत बन चुकी है,जिसे समझे बिना शायद आधुनिक निवेश को पूरी तरह समझना संभव नहीं,लेकिन इसके पीछे खड़े व्यक्ति—वॉरेन बफे ने दुनिया को एक बड़ा सबक दिया। बाजार में सफलता का रहस्य केवल सही कंपनी चुनने में नहीं,बल्कि खुद को सही बनाए रखने में है। उनका विदा लेना एक युग का अंत है,लेकिन उनकी सोच,उनके पत्र,उनके फैसले और उनका दान आने वाले दशकों तक दुनिया के निवेशकों और नेताओं को दिशा देते रहेंगे।
