सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज की (तस्वीर क्रेडिट@PMishra_Journo)

यूएपीए मामले में सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत से इनकार,पाँच आरोपियों को राहत

नई दिल्ली,5 जनवरी (युआईटीवी)- सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ी कथित “बड़ी साजिश” के मामले में एक अहम फैसला सुनाते हुए छात्र कार्यकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए रिकॉर्ड और सबूतों से दोनों के खिलाफ यूएपीए के प्रावधानों के तहत प्रथम दृष्टया गंभीर मामला बनता है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने स्पष्ट टिप्पणी की कि दोनों की कथित भूमिका केवल उपस्थिति या भागीदारी तक सीमित नहीं थी,बल्कि योजना बनाने,लोगों को जुटाने और रणनीतिक दिशा देने से जुड़ी बताई गई है और यही बात उन्हें अन्य सह-आरोपियों से “गुणात्मक रूप से अलग” बनाती है। अदालत के अनुसार,उपलब्ध सामग्री उन्हें जमानत देने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान नहीं करती।

दिल्ली दंगों के बड़े साजिश केस,जिसमें यूएपीए लगाया गया है,में यह निर्णय एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। कोर्ट ने इस मामले में पाँच अन्य आरोपियों—गुलफिशा फातिमा,मीरान हैदर,शिफा-उर-रहमान,मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी। ये सभी पाँच वर्ष से अधिक समय से जेल में बंद थे। अदालत ने कहा कि हर आरोपी की भूमिका,परिस्थितियाँ और उनके खिलाफ मौजूद सामग्री अलग-अलग है,इसलिए सभी याचिकाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन जरूरी था। बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि रिकॉर्ड से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सभी अपीलकर्ता समान स्थिति में थे,इसलिए एक जैसे आदेश नहीं दिए जा सकते।

यह फैसला उस स्पेशल लीव पिटिशन पर आया,जो सितंबर 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर को सभी पक्षों की दलीलें सुनकर निर्णय सुरक्षित रख लिया था। अब,विस्तृत आदेश के साथ अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि यूएपीए के मामलों में जमानत पर विचार करते समय केवल लंबी हिरासत या सुनवाई में देरी पर्याप्त आधार नहीं बनते,जब तक कि अभियोजन की कहानी प्रथम दृष्टया कमजोर न प्रतीत हो।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जोरदार तरीके से जमानत याचिकाओं का विरोध किया। उनका तर्क था कि फरवरी 2020 की हिंसा किसी अचानक हुए सांप्रदायिक टकराव का नतीजा नहीं थी,बल्कि “अच्छी तरह डिजाइन की गई,सुनियोजित और पहले से प्लान की गई” साजिश का हिस्सा थी। उन्होंने अदालत के समक्ष विभिन्न व्हाट्सएप चैट्स,भाषणों और कथित बैठकों के हवाले देते हुए कहा कि इन प्रयासों का उद्देश्य समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करना और कानून-व्यवस्था को चुनौती देना था,जो अंततः देश की संप्रभुता और सुरक्षा पर सीधा हमला माना जाना चाहिए।

मेहता ने जमानत का विरोध करते हुए यह भी आरोप लगाया कि ट्रायल में देरी के लिए खुद आरोपी जिम्मेदार हैं। उनके अनुसार,बार-बार की गई याचिकाओं और प्रक्रियात्मक आपत्तियों के कारण आरोप तय करने की प्रक्रिया लंबी खिंचती गई। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में एक “पैटर्न” विकसित हो गया है,जिसमें पहले मुकदमे को टालने की कोशिश की जाती है और फिर लंबी अवधि की हिरासत के आधार पर जमानत माँगी जाती है। अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार तो नहीं किया,लेकिन यह अवश्य कहा कि ट्रायल की गति का आकलन करते समय सभी पक्षों के आचरण को देखना जरूरी है।

दूसरी ओर,बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि आरोपियों के खिलाफ प्रत्यक्ष हिंसा के सबूत नहीं हैं और उनकी भूमिका मुख्यतः भाषणों या विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी बताई गई है। उन्होंने कहा कि इतने लंबे समय से बंद रहने के बावजूद ट्रायल में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है,इसलिए संवैधानिक अधिकारों के मद्देनज़र जमानत दी जानी चाहिए,लेकिन अदालत इस तर्क से सहमत नहीं हुई और माना कि यूएपीए के तहत लगाए गए आरोपों की प्रकृति ऐसी है,जिसमें प्रारंभिक स्तर पर उपलब्ध सामग्री भी पर्याप्त गंभीर प्रतीत हो रही है।

पाँच अन्य सह-आरोपियों को जमानत देते समय अदालत ने यह जरूर कहा कि लंबी कैद और उनकी भूमिकाओं की तुलनात्मक समीक्षा उन्हें राहत देने का आधार बन सकती है। बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत आदेश किसी तरह से दोषसिद्धि या बरी होने पर राय नहीं है,बल्कि केवल इस स्तर पर उपलब्ध सामग्री और परिस्थितियों का आकलन है। अदालत ने निचली अदालतों को निर्देश दिया कि ट्रायल को अनावश्यक रूप से लंबा न खींचा जाए और नियमित सुनवाई सुनिश्चित की जाए,ताकि न्याय समयबद्ध ढंग से हो सके।

फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों में कई लोगों की जान गई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। बड़ी संख्या में घर,दुकानें और सामुदायिक संपत्तियाँ नष्ट हुईं। इस हिंसा के बाद दिल्ली पुलिस ने “बड़ी साजिश” का मामला दर्ज कर यूएपीए के प्रावधान लागू किए,जिसमें कई सामाजिक कार्यकर्ताओं,छात्रों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को आरोपी बनाया गया। तभी से इस केस को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहस जारी है—क्या यह वास्तव में एक संगठित साजिश थी या फिर असंतोष और विरोध प्रदर्शनों का आपराधिकरण? सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा आदेश ने भले अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया,लेकिन जमानत के सवाल पर अदालत का झुकाव यूएपीए की सख्ती को बरकरार रखने की ओर दिखा।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य के मामलों के लिए भी एक संदर्भ बिंदु बनेगा। अदालत ने जिस तरह “गुणात्मक भिन्नता” की अवधारणा पर बल दिया,वह बताता है कि प्रत्येक आरोपी की कथित भूमिका,प्रभाव और कथित योगदान को अलग-अलग परखा जाएगा। साथ ही,यह संदेश भी गया कि केवल लंबी हिरासत अपने आप में जमानत का स्वतः अधिकार नहीं बनाती,खासकर तब जब राष्ट्रीय सुरक्षा या गंभीर साजिश जैसे आरोप दर्ज हों।

जमानत पाने वाले पाँच आरोपियों के लिए यह निर्णय राहत लेकर आया है,लेकिन बाकी आरोपियों के लिए लड़ाई जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब ट्रायल कोर्ट पर यह जिम्मेदारी और बढ़ गई है कि वह साक्ष्यों की सुनवाई तेज़ी से करे और जहाँ भी संभव हो,प्रक्रियात्मक देरी से बचे। मामले की अगली कार्यवाही यह तय करेगी कि आरोप कितने टिकाऊ साबित होते हैं और अभियोजन अपने दावों को अदालत में किस मजबूती से साबित कर पाता है।

फिलहाल, इस फैसले ने एक बार फिर यूएपीए के प्रयोग,जमानत के अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन को लेकर बहस को जीवित कर दिया है। यह स्पष्ट है कि अदालत इस संतुलन को अत्यंत सावधानी से साधना चाहती है,जहाँ एक ओर नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा हो,वहीं दूसरी ओर राज्य को गंभीर अपराधों और कथित साजिशों से निपटने का आवश्यक कानूनी साधन भी उपलब्ध रहे।