मुंबई,7 जनवरी (युआईटीवी)- बॉलीवुड में जब भी उस अभिनेत्री की चर्चा होती है,जिसने अपने आत्मविश्वास,बेबाकी और अदाकारी के दम पर अलग पहचान बनाई, तो बिपाशा बसु का नाम सबसे आगे आता है। अक्सर उन्हें मीडिया में “डस्की ब्यूटी” कहा गया,लेकिन इस शब्द के पीछे छिपे पूर्वाग्रहों को उन्होंने कभी अपने सफर पर हावी नहीं होने दिया। 7 जनवरी को जन्मी बिपाशा आज सिर्फ एक सफल अभिनेत्री ही नहीं,बल्कि आत्मसम्मान और आत्मविश्वास का प्रतीक मानी जाती हैं। उनका सफर इस बात की मिसाल है कि रंग,रूप या बाहरी परत किसी इंसान की असली पहचान तय नहीं करते,बल्कि पहचान तो मेहनत,लगन और खुद पर भरोसा तय करती है।
नई दिल्ली में जन्मीं और कोलकाता में पली-बढ़ी बिपाशा एक बंगाली परिवार से ताल्लुक रखती हैं। बचपन कैसा शांत और सामान्य रहा होगा,इसका अंदाजा शायद इसी बात से लगाया जा सकता है कि शुरुआती दिनों में उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन फिल्मों की दुनिया उनका इंतज़ार कर रही है,लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही लिख रखा था। 16 साल की उम्र में उन्होंने एक सुपरमॉडल कॉन्टेस्ट जीता और यहीं से उनका जीवन नई दिशा में मुड़ गया। मॉडलिंग की दुनिया ने उनके सामने बड़े सपनों के दरवाज़े खोल दिए और जल्द ही वे प्रोफेशनल मॉडल बन गईं।
विदेशों में काम करने का मौका उन्हें कम उम्र में ही मिल गया। न्यूयॉर्क और पेरिस जैसे फैशन हब्स ने उन्हें अलग तरह का अनुभव दिया। वहाँ उनकी सांवली त्वचा को “एग्ज़ॉटिक” कहा गया,लोग उनकी पर्सनैलिटी और लुक से प्रभावित हुए और काम के अवसर मिलने लगे। यह अनुभव उनके लिए सुकून देने वाला था,क्योंकि पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि उनका रंग कमज़ोरी नहीं,बल्कि उनकी खूबी है,लेकिन जैसे ही वह भारत वापस लौटीं,पुरानी सोच और पुराने ताने फिर सामने खड़े हो गए। रिश्तेदारों से लेकर मीडिया तक — हर जगह उनके रंग को लेकर बातें होतीं,तुलना की जाती और अक्सर उनकी खूबसूरती से पहले केवल “सांवलेपन” का जिक्र छा जाता।
बिपाशा ने कई इंटरव्यू में बताया है कि बचपन से ही उन्हें यह सुनना पड़ता था कि वह अपनी बहन से ज्यादा सांवली हैं। मॉडलिंग जीतने के बाद अखबारों की हेडलाइन बनी — “कोलकाता की सांवली लड़की बनी विनर।” यह बात उन्हें अंदर तक झकझोरती थी। वे सोचती थीं कि आखिर क्यों किसी इंसान के रंग को उसकी पहचान बना दिया जाता है,लेकिन उन्होंने शिकायत करने के बजाय इस चुनौती को अपनी ताकत में बदलने का फैसला किया। धीरे-धीरे उन्होंने यह समझा कि खूबसूरती का मतलब सिर्फ गोरा रंग नहीं,बल्कि पर्सनैलिटी,आत्मविश्वास और व्यवहार होता है।
फिल्मों में कदम रखते समय भी उन्हें इस लेबल से गुजरना पड़ा। 2001 में अक्षय कुमार,करीना कपूर और बॉबी देओल के साथ फ़िल्म अजनबी से उन्होंने डेब्यू किया। इस फिल्म में उनका किरदार नेगेटिव था,लेकिन उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस इतनी प्रभावी रही कि दर्शक और समीक्षक दोनों ने उन्हें नोटिस किया। उन्हें फ़िल्मफेयर बेस्ट डेब्यू अवॉर्ड मिला और यही उनकी फिल्मी यात्रा की मजबूत नींव साबित हुई। अगले ही साल आई राज ने मानो उनके करियर को नई उड़ान दे दी। इस फिल्म में उनके रहस्यमयी किरदार और दमदार अदाकारी ने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया।
इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जिस्म,नो एंट्री,धूम 2,आत्मा,क्रीचर 3D जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह के रोल निभाए। उन्होंने ग्लैमरस किरदार भी किए और गंभीर भूमिकाएँ भी, लेकिन हर बार वह स्क्रीन पर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करवाने में कामयाब रहीं। हॉरर,थ्रिलर,रोमांस,कॉमेडी — लगभग हर जॉनर में उन्होंने हाथ आजमाया और यह साबित किया कि वह सिर्फ सुंदर चेहरा नहीं,बल्कि एक सक्षम कलाकार हैं।
फिल्मों के साथ-साथ बिपाशा ने सामाजिक मुद्दों पर भी मुखर होकर अपनी राय रखी। रंगभेद और ब्यूटी स्टैंडर्ड्स को लेकर उन्होंने हमेशा खुलकर आवाज उठाई। कई बड़े फेयरनेस ब्रांड्स ने उन्हें आकर्षक ऑफर दिए,लेकिन उन्होंने हर बार ठुकरा दिया। उनका तर्क साफ रहा — जब देश की बड़ी आबादी सांवली है,तो फिर गोरेपन का सपना क्यों बेचा जाए? उन्होंने कहा कि ब्रांड्स को यह समझना चाहिए कि सुंदरता का मतलब त्वचा का रंग नहीं,बल्कि आत्मविश्वास और स्वास्थ्य है। उनकी यह सोच कई युवाओं के लिए प्रेरणा बनी,खासकर उन लड़कियों के लिए जिन्हें अपने रंग को लेकर असहज महसूस कराया जाता है।
बिपाशा की निजी ज़िंदगी भी उतनी ही चर्चा में रही। 2016 में उन्होंने अभिनेता करण सिंह ग्रोवर से शादी की। दोनों की जोड़ी को प्रशंसकों ने काफी पसंद किया। नवंबर 2022 में उनकी बेटी देवी का जन्म हुआ और तब से बिपाशा अक्सर सोशल मीडिया पर अपनी फैमिली लाइफ की झलकियाँ शेयर करती रहती हैं। मातृत्व (मदरहुड) ने उनके जीवन में नई संवेदनाएँ जोड़ी हैं। वे कहती हैं कि अब काम के साथ-साथ परिवार भी उनकी प्राथमिकता है और वह दोनों के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना चाहती हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इतनी सफलता के बावजूद बिपाशा ने हमेशा अपने संघर्ष के दौर को याद रखा। वे मानती हैं कि अगर जिंदगी में मुश्किलें न आतीं,यदि रंग को लेकर ताने न मिलते,तो शायद उनमें वह जिद और दृढ़ता पैदा नहीं होती,जिसने उन्हें मजबूत बनाया। उनकी कहानी उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा है,जो समाज के बनाए खांचे में फिट नहीं बैठते और इसलिए खुद को कमतर समझने लगते हैं।
आज जब फिल्म इंडस्ट्री में विविधता और समावेशिता की बातें हो रही हैं,तब बिपाशा बसु का सफर और भी अहम लगने लगता है। उन्होंने साबित किया कि सफलता सिर्फ उनके हिस्से नहीं आती जो “आदर्श मानकों” में फिट बैठते हैं,बल्कि उन लोगों के पास भी जाती है,जो अपने वास्तविक रूप के साथ खड़े रहना जानते हैं। उन्होंने अपने रंग को बदलने के बजाय सोच बदलने की कोशिश की और यही उन्हें खास बनाता है।
बॉलीवुड के इस चमकते संसार में जहाँ ट्रेंड्स रोज बदलते हैं,बिपाशा बसु अपने आत्मविश्वास,प्रोफेशनलिज्म और स्पष्ट विचारों की वजह से हमेशा अलग नजर आती हैं। उनकी यात्रा इस बात का संदेश देती है कि इंसान का असली सौंदर्य उसकी सोच और कर्मों में होता है। जो लोग खुद पर विश्वास रखना सीख लेते हैं,दुनिया एक न एक दिन उनके सामने झुकती ही है।
बिपाशा बसु का जीवन इसलिए भी यादगार है क्योंकि उन्होंने दिखा दिया कि सपने देखने का हक हर किसी को है,चाहे वह सांवला हो या गोरा,साधारण हो या ग्लैमरस। उनका आज का मुकाम मेहनत,जज़्बे और आत्मसम्मान का नतीजा है। और शायद इसी वजह से, जब भी “डस्की ब्यूटी” का नाम लिया जाता है,बिपाशा बसु किसी टैग के रूप में नहीं,बल्कि एक प्रेरणादायक कहानी के रूप में याद की जाती हैं।
