नई दिल्ली,7 जनवरी (युआईटीवी)- सुपरस्टार और राजनेता थलपति विजय की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘जन नायकन’ की रिलीज़ पर संकट के बादल और घने हो गए हैं। 9 जनवरी को सिनेमाघरों में दस्तक देने के लिए तैयार इस बड़े बजट की फिल्म को अब तक सेंसर बोर्ड का अंतिम सर्टिफिकेट नहीं मिल पाया है। इसी देरी से चिंतित फिल्म के निर्माताओं — केवीएन प्रोडक्शंस ने मद्रास हाईकोर्ट की शरण लेते हुए रिलीज़ को लेकर पैदा हुए असमंजस को दूर करने की अपील की है।
प्रोडक्शन हाउस का कहना है कि फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट के लिए दिसंबर में ही जमा कर दिया गया था। प्रारंभिक जाँच के बाद सेंसर बोर्ड ने कुछ दृश्यों में कट लगाने और कुछ डायलॉग को ‘म्यूट’ करने का सुझाव दिया था। मेकर्स का दावा है कि उन्होंने सुझाए गए सभी बदलावों को स्वीकार करते हुए फिल्म को दोबारा जमा किया। उनके अनुसार,संशोधित संस्करण देखने के बाद बोर्ड ने इसे ‘यू/ए’ सर्टिफिकेट के योग्य भी मान लिया था। ऐसे में अंतिम सर्टिफिकेट जारी न होना निर्माताओं के लिए चिंता का बड़ा कारण बन गया है।
मामले में नाटकीय मोड़ उस समय आया,जब एक शिकायत के आधार पर यह आरोप लगाया गया कि फिल्म धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा सकती है। इसी शिकायत को आधार बनाकर सेंसर बोर्ड ने अंतिम मंजूरी देने के बजाय फिल्म को ‘रिव्यूइंग कमेटी’ के पास भेज दिया। अदालत में यह सवाल उठा कि क्या बिना फिल्म देखे कोई व्यक्ति ऐसे आरोप लगा सकता है और क्या केवल शिकायत मिलने से सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया अनिश्चितकाल के लिए रोक दी जानी चाहिए।
जस्टिस पी.टी. आशा की बेंच के सामने हुई सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं। रिपोर्ट्स के अनुसार,मेकर्स की ओर से कहा गया कि शिकायतकर्ता ने फिल्म देखी ही नहीं,इसलिए धार्मिक भावनाएँ आहत होने का दावा निराधार है। निर्माताओं का यह भी कहना था कि यह फिल्म लगभग 500 करोड़ रुपये के बजट पर बनी है और सर्टिफिकेट में देरी से न केवल आर्थिक नुकसान बढ़ेगा,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मार्केटिंग और वितरण पर भी असर पड़ेगा।
इसके जवाब में सेंसर बोर्ड ने अपने निर्णय का बचाव करते हुए कहा कि शिकायत पर संज्ञान लेना और फिल्म की दोबारा जाँच करना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। बोर्ड ने तर्क दिया कि केवल इसलिए कि फिल्म की रिलीज़ डेट नजदीक है,नियमों को शिथिल नहीं किया जा सकता। बोर्ड का कहना था कि उसे यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई भी सामग्री संवेदनशील सामाजिक या धार्मिक भावनाओं को अनावश्यक रूप से भड़काने वाली न हो और इसी उद्देश्य से फिल्म को पुनर्विचार समिति के पास भेजा गया है।
सुनवाई के दौरान जज ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए निर्माताओं से पूछा कि क्या वे रिलीज़ डेट को एक दिन आगे बढ़ाकर 10 जनवरी करने पर विचार कर सकते हैं,ताकि बोर्ड को समीक्षा प्रक्रिया पूरी करने के लिए थोड़ा अतिरिक्त समय मिल सके। इस पर मेकर्स के वकील ने स्पष्ट किया कि विदेशी बाजारों में एडवांस बुकिंग शुरू हो चुकी है और कई प्रचार कार्यक्रम तारीख के अनुसार तय किए जा चुके हैं। ऐसे में अचानक रिलीज़ टालने से भारी वित्तीय नुकसान और लॉजिस्टिक दिक्कतें खड़ी हो जाएँगी।
मद्रास हाईकोर्ट ने फिलहाल सेंसर बोर्ड को निर्देश दिया है कि वह उस शिकायत की पूरी फाइल और उससे संबंधित दस्तावेज अदालत के सामने पेश करे,जिसके आधार पर सर्टिफिकेट रोका गया है। अदालत ने कहा कि वह यह जानना चाहती है कि शिकायत की प्रकृति क्या है और क्या वाकई उसमें ऐसे ठोस पहलू हैं,जिनके कारण फिल्म की रिलीज़ को रोका जाना जरूरी हो। अदालत ने यह भी साफ संकेत दिया कि प्रक्रिया में पारदर्शिता होनी चाहिए ताकि न तो शिकायतकर्ता की चिंताएँ अनसुनी हों और न ही फिल्म निर्माताओं के अधिकारों का उल्लंघन हो।
यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है,जब थलपति विजय की राजनीतिक सक्रियता और उनकी फिल्मों के सामाजिक संदेश अक्सर सार्वजनिक चर्चा का विषय रहे हैं। ‘जन नायकन’ को भी एक राजनीतिक-सामाजिक ड्रामा के रूप में देखा जा रहा है और प्रशंसक लंबे समय से इसके रिलीज़ का इंतजार कर रहे हैं। सेंसर सर्टिफिकेट में देरी ने न केवल दर्शकों की उत्सुकता को चिंता में बदल दिया है,बल्कि उद्योग जगत में भी यह सवाल उठ खड़ा किया है कि क्या शिकायत-आधारित समीक्षा प्रक्रिया का मानक ढाँचा और स्पष्ट होना चाहिए।
फिल्म उद्योग से जुड़े जानकारों का मानना है कि सेंसर से जुड़ी प्रक्रियाएँ समयबद्ध हों,तो निर्माताओं,वितरकों और दर्शकों — सभी को राहत मिलती है। वहीं,सेंसर बोर्ड का तर्क है कि सार्वजनिक भावनाओं का ध्यान रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है और संवेदनशील मामलों में अतिरिक्त सावधानी बरतना आवश्यक हो जाता है। यही संतुलन तय करेगा कि ‘जन नायकन’ बिना किसी और अड़चन के निर्धारित तारीख पर रिलीज़ हो पाएगी या नहीं।
अब निगाहें अगले सुनवाई दिन पर टिक गई हैं,जब अदालत सेंसर बोर्ड से आई फाइल का अध्ययन करेगी और यह तय करेगी कि शिकायत पर आगे क्या कदम उठाए जाएँ। यदि अदालत को लगता है कि शिकायत में पर्याप्त आधार नहीं है,तो फिल्म के रिलीज़ का रास्ता साफ हो सकता है,लेकिन यदि उसे अधिक गहन समीक्षा की आवश्यकता महसूस होती है,तो ‘जन नायकन’ की नियोजित रिलीज़ पर अनिश्चितता और भी बढ़ सकती है।
फिलहाल,दर्शक,निर्माता और डिस्ट्रीब्यूटर्स — सभी हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। एक ओर बड़े बजट और व्यापक तैयारियों वाली इस फिल्म के लिए हर दिन की देरी भारी साबित हो सकती है,तो दूसरी ओर शिकायत और सेंसर प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ करना भी आसान नहीं है। आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि क्या ‘जन नायकन’ समय पर बड़े परदे तक पहुँच पाएगी या फिर उसे अपनी राह में आए इस कानूनी पेंच से निकलने के लिए और इंतजार करना पड़ेगा।
