अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप

अमेरिकी सुरक्षा नीति में बड़ा मोड़: ट्रंप का 1.5 ट्रिलियन डॉलर रक्षा बजट प्रस्ताव और ग्रीनलैंड पर बढ़ता सियासी तूफान

वाशिंगटन,8 जनवरी (युआईटीवी)- वेनेजुएला में हालिया सैन्य कार्रवाई और वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। ट्रंप ने वित्त वर्ष 2027 के लिए अमेरिका के रक्षा बजट को अभूतपूर्व स्तर पर ले जाते हुए 1.5 ट्रिलियन डॉलर तक बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। इसके साथ ही ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप प्रशासन की टिप्पणियों और संकेतों ने वॉशिंगटन में राष्ट्रीय सुरक्षा,नाटो सहयोग और कूटनीतिक मर्यादाओं को लेकर तीखी बहस छेड़ दी है। इन दोनों मुद्दों ने अमेरिकी राजनीति के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का भी ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर अपने बयान में साफ शब्दों में कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए अमेरिका के लिए रक्षा बजट को 1 ट्रिलियन डॉलर तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। उनके मुताबिक,अमेरिका को पूरी तरह सुरक्षित और सैन्य रूप से अजेय बनाने के लिए यह बजट 1.5 ट्रिलियन डॉलर होना चाहिए। ट्रंप ने लिखा कि यह फैसला उन्होंने सीनेटरों,कांग्रेस के सदस्यों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के साथ गहन विचार-विमर्श के बाद लिया है। उनका दावा है कि यह अतिरिक्त खर्च अमेरिका को एक “ड्रीम मिलिट्री” बनाने में मदद करेगा,जो किसी भी दुश्मन के खिलाफ देश की रक्षा करने में सक्षम होगी।

ट्रंप ने इस बढ़ोतरी को सीधे तौर पर दूसरे देशों पर लगाए गए टैरिफ से जोड़ते हुए कहा कि इन शुल्कों से होने वाली अतिरिक्त कमाई के कारण ही इतना बड़ा रक्षा बजट संभव हो पाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगर टैरिफ से अपेक्षित राजस्व नहीं आता,तो रक्षा बजट को 1 ट्रिलियन डॉलर के आसपास ही सीमित रखा जाता। अपने बयान में ट्रंप ने यह आरोप भी लगाया कि दशकों तक कई देश अमेरिका का आर्थिक रूप से फायदा उठाते रहे हैं और अब उनका प्रशासन उस स्थिति को बदल रहा है।

पूर्ववर्ती जो बाइडेन प्रशासन पर निशाना साधते हुए ट्रंप ने कहा कि उस दौर में सरकारी राजस्व काफी कम था और अमेरिका अपनी आर्थिक क्षमता का सही इस्तेमाल नहीं कर पा रहा था। हालाँकि,उन्होंने अपने इस दावे के समर्थन में कोई ठोस आँकड़ें पेश नहीं किए। ट्रंप ने यह भरोसा भी दिलाया कि रक्षा बजट में इतनी बड़ी बढ़ोतरी के बावजूद अमेरिका अपने राष्ट्रीय कर्ज को कम करने में सक्षम रहेगा। इसके साथ ही उन्होंने मध्यम आय वर्ग के “देशभक्त नागरिकों” को उचित आर्थिक लाभ देने की बात भी कही,जिससे यह संदेश देने की कोशिश की गई कि सैन्य खर्च और घरेलू कल्याण के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।

हालाँकि,ट्रंप के इस प्रस्ताव ने कई अहम सवाल भी खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रपति ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि 1.5 ट्रिलियन डॉलर की यह राशि किन-किन क्षेत्रों में खर्च की जाएगी। यह भी साफ नहीं है कि इतनी बड़ी बजट बढ़ोतरी को कांग्रेस से मंजूरी कैसे मिलेगी,खासकर तब जब अमेरिका पहले से ही दुनिया का सबसे बड़ा रक्षा बजट रखने वाला देश है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रस्ताव पर कांग्रेस में घाटे,सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों और घरेलू जरूरतों पर पड़ने वाले असर को लेकर तीखी बहस होना तय है।

चीन और रूस के साथ बढ़ते तनाव,यूक्रेन युद्ध की अनिश्चितता और मध्य पूर्व में लगातार बनी हुई अस्थिरता के कारण अमेरिका में रक्षा खर्च को लेकर चर्चा पहले से ही तेज है। ट्रंप का यह प्रस्ताव इन बहसों को और अधिक धार देने वाला माना जा रहा है। समर्थकों का कहना है कि मौजूदा दौर में अमेरिका को अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने की जरूरत है,जबकि आलोचकों का तर्क है कि इतनी बड़ी रकम हथियारों पर खर्च करने से घरेलू शिक्षा,स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे जैसे क्षेत्रों को नुकसान हो सकता है।

इसी बीच ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप प्रशासन की टिप्पणियों ने अमेरिकी राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। व्हाइट हाउस की प्रेस ब्रीफिंग में प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने कहा कि ग्रीनलैंड को अमेरिका द्वारा हासिल करने का मुद्दा राष्ट्रपति और राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के बीच सक्रिय चर्चा का विषय है। उन्होंने इसे आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों से जोड़ते हुए कहा कि यह अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला है। हालाँकि,उन्होंने यह भी दोहराया कि राष्ट्रपति ट्रंप की पहली प्राथमिकता हमेशा कूटनीति रही है।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी इस मुद्दे पर बयान देते हुए कहा कि ट्रंप अपने पहले कार्यकाल से ही ग्रीनलैंड को लेकर विचार करते रहे हैं और यह कोई नया विचार नहीं है। उनके मुताबिक,हर अमेरिकी राष्ट्रपति राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े खतरों से निपटने के लिए सभी विकल्प खुले रखता है। रुबियो ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि अमेरिका सैन्य कार्रवाई की बजाय कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देता है,लेकिन जरूरत पड़ने पर किसी भी विकल्प को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

ग्रीनलैंड पर इन बयानों के बाद कांग्रेस में तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। रिपब्लिकन सीनेटर लिसा मर्कोव्स्की और स्वतंत्र सीनेटर एंगस किंग ने बल प्रयोग या उसके संकेतों के खिलाफ चेतावनी दी। उनका कहना था कि ऐसे बयान अमेरिका के सहयोगियों के साथ रिश्तों को नुकसान पहुँचा सकते हैं। डेमोक्रेट सांसद पीट एगुइलर और टेड लियू ने तो इसे नाटो सहयोगी को धमकाने और अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करार दिया। उनके मुताबिक,किसी संप्रभु या स्वायत्त क्षेत्र को सैन्य दबाव में लेने की बात करना न केवल अवैध है,बल्कि अमेरिका की वैश्विक साख को भी कमजोर करता है।

हाउस स्पीकर माइक जॉनसन ने स्थिति को संभालने की कोशिश करते हुए कहा कि ग्रीनलैंड को लेकर युद्ध का कोई इरादा नहीं है और प्रशासन का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर विचार करना है। कई सांसदों ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के साथ अमेरिका के दशकों पुराने सहयोग को याद दिलाया। गौरतलब है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है और अमेरिका लंबे समय से यहाँ पिटुफिक स्पेस बेस के जरिए अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए हुए है। यह बेस मिसाइल चेतावनी प्रणाली और अंतरिक्ष निगरानी के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है।

इस विवाद को और हवा तब मिली,जब ट्रंप ने वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई के बाद कहा कि सुरक्षा के लिहाज से उन्हें ग्रीनलैंड की जरूरत है। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन में डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ स्टीफन मिलर की पत्नी कैटी मिलर द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गई एक पोस्ट ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाराजगी पैदा कर दी। इस पोस्ट में ग्रीनलैंड की एक तस्वीर को अमेरिकी झंडे में दिखाया गया था और उस पर ‘जल्द’ लिखा हुआ था। डेनमार्क सरकार ने इस पोस्ट पर गहरी आपत्ति जताते हुए इसे भड़काऊ और अस्वीकार्य करार दिया।

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप का रक्षा बजट बढ़ाने का प्रस्ताव और ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख,दोनों ही उनकी “अमेरिका फर्स्ट” नीति का विस्तार हैं। एक ओर वह अमेरिका की सैन्य शक्ति को अभूतपूर्व स्तर तक ले जाना चाहते हैं,वहीं दूसरी ओर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अमेरिकी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हालाँकि,इन कदमों से अमेरिका की वैश्विक भूमिका मजबूत होगी या सहयोगियों के साथ रिश्तों में तनाव बढ़ेगा,यह आने वाला समय ही बताएगा।

फिलहाल इतना तय है कि 1.5 ट्रिलियन डॉलर के रक्षा बजट और ग्रीनलैंड पर चल रही बहस ने अमेरिकी राजनीति को दो ध्रुवों में बाँट दिया है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्य जरूरत बता रहा है,जबकि दूसरा पक्ष इसे अनावश्यक आक्रामकता और संसाधनों की बर्बादी मान रहा है। इन दोनों मुद्दों पर होने वाली बहस न केवल अमेरिका की घरेलू राजनीति,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय शक्ति संतुलन को भी गहराई से प्रभावित कर सकती है।