वाशिंगटन,9 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा एक बार फिर नए मोड़ पर पहुँच गई है। अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने एक अहम फंडिंग बिल को मंजूरी दे दी है,जिसके जरिए चीन से जुड़े मामलों में सख्ती को और बढ़ाया जाएगा। इस कानून का उद्देश्य चीन के साथ व्यापार,तकनीक,ऊर्जा और वैज्ञानिक सहयोग जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में अमेरिकी हितों की रक्षा करना है। बिल के तहत निर्यात नियंत्रण को मजबूत करने, व्यापार नियमों के सख्त पालन,सरकारी एजेंसियों द्वारा तकनीक की खरीद पर अतिरिक्त निगरानी और चीन के साथ सहयोग को सीमित करने जैसे कई अहम प्रावधान शामिल किए गए हैं।
यह कानून ऐसे समय में पारित हुआ है,जब वॉशिंगटन और बीजिंग के रिश्ते पहले से ही तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं। अमेरिका लंबे समय से चीन पर आरोप लगाता रहा है कि वह अमेरिकी तकनीक,पूँजी और खुली नीतियों का इस्तेमाल अपनी सत्तावादी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए करता रहा है। इसी पृष्ठभूमि में यह फंडिंग बिल अमेरिका की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है,जिसके तहत चीन पर निर्भरता घटाने और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को कम करने की कोशिश की जा रही है।
इस विधेयक के तहत निर्यात नियंत्रण नियमों को लागू करने के लिए अतिरिक्त फंडिंग का प्रावधान किया गया है। खास तौर पर ब्यूरो ऑफ इंडस्ट्री एंड सिक्योरिटी को 44 मिलियन डॉलर की अतिरिक्त राशि दी गई है,जिससे इसकी कुल फंडिंग बढ़कर 235 मिलियन डॉलर हो जाएगी। प्रतिनिधि सभा की उस समिति का कहना है,जो अमेरिका और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पर नजर रखती है,कि यह अतिरिक्त धन संवेदनशील अमेरिकी तकनीकों को चीन तक पहुँचने से रोकने में अहम भूमिका निभाएगा। अमेरिका का मानना है कि उन्नत सेमीकंडक्टर,आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रक्षा से जुड़ी तकनीकें अगर चीन के हाथ लगती हैं,तो इससे अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है।
बिल में चीन से जुड़े व्यापार मामलों को आगे बढ़ाने और उन पर कड़ी निगरानी रखने के लिए अलग से फंड आवंटित किया गया है। इसके तहत एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी के नियमों को लागू करने के लिए 16.4 मिलियन डॉलर की राशि तय की गई है। समर्थकों का कहना है कि यह कदम अमेरिकी श्रमिकों और मैन्युफैक्चरर्स को उन गलत व्यापारिक तरीकों से बचाने के लिए जरूरी है,जिनके जरिए चीनी कंपनियाँ कथित तौर पर अनुचित सब्सिडी और कम कीमतों के सहारे अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करती हैं। अमेरिका लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि चीन की व्यापार नीतियाँ निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं।
इस कानून का एक अहम पहलू सरकारी एजेंसियों द्वारा तकनीक की खरीद पर लगाई गई पाबंदियाँ हैं। वाणिज्य विभाग,न्याय विभाग,नासा और राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन जैसी प्रमुख अमेरिकी संस्थाएँ अब तब तक नई सूचना प्रौद्योगिकी प्रणालियाँ नहीं खरीद सकेंगी,जब तक उनकी सप्लाई चेन और साइबर सुरक्षा से जुड़े जोखिमों की पूरी जाँच न हो जाए। इन जाँचों में खास तौर पर चीन जैसे विदेशी विरोधियों की भूमिका पर ध्यान दिया जाएगा। अमेरिकी नीति निर्माताओं का मानना है कि सरकारी प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाली तकनीक अगर विदेशी विरोधी देशों से जुड़ी हो,तो इससे जासूसी,डेटा चोरी और साइबर हमलों का खतरा बढ़ सकता है।
अमेरिका और चीन के बीच वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग को सीमित करना भी इस विधेयक का एक प्रमुख उद्देश्य है। इसके तहत नासा और ऑफिस ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी पॉलिसी को चीन या चीनी स्वामित्व वाली कंपनियों के साथ किसी भी तरह के द्विपक्षीय सहयोग या समझौते में शामिल होने से रोका गया है। अगर किसी विशेष परिस्थिति में ऐसा सहयोग जरूरी माना जाता है,तो उसके लिए पहले कांग्रेस की स्पष्ट अनुमति लेनी होगी। यह प्रावधान इस बात को दर्शाता है कि अमेरिका अब विज्ञान और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में भी चीन के साथ रिश्तों को बेहद सतर्कता के साथ आगे बढ़ाना चाहता है।
इस फंडिंग बिल में सरकारी अधिकारियों की चीन यात्राओं पर भी कड़ी निगरानी का प्रावधान किया गया है। वाणिज्य विभाग,नासा और राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन को हर तीन महीने में कांग्रेस को यह जानकारी देनी होगी कि उनके कर्मचारी चीन क्यों गए और उनकी यात्रा का उद्देश्य क्या था। अमेरिकी सांसदों का मानना है कि इस तरह की पारदर्शिता से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि कोई भी सरकारी यात्रा राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों के खिलाफ न हो और चीन को संवेदनशील जानकारी तक पहुँचने का मौका न मिले।
ऊर्जा और परमाणु सुरक्षा से जुड़े प्रावधान इस कानून को और भी सख्त बनाते हैं। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से कच्चा तेल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को बेचने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। इसके अलावा चीन और रूस के नागरिकों को अमेरिकी परमाणु हथियार उत्पादन केंद्रों तक पहुँचने से भी प्रतिबंधित किया गया है। ऊर्जा विभाग को किसी भी विदेशी संस्था को वित्तीय सहायता देने से रोका गया है,ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अमेरिकी संसाधन और तकनीक विदेशी शक्तियों के हितों को मजबूत करने में इस्तेमाल न हों।
यह पूरा खर्च पैकेज मुख्य रूप से वाणिज्य,न्याय और आंतरिक मामलों के विभागों पर लागू होगा,लेकिन इसके तहत नासा,आर्मी कोर ऑफ इंजीनियर्स और पर्यावरण संरक्षण एजेंसी जैसी अन्य संस्थाओं को भी फंडिंग मिलेगी। हालाँकि,इस बिल में शामिल चीन से जुड़े प्रावधानों ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है। अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पर बनी प्रतिनिधि सभा की सेलेक्ट कमेटी ने इस कानून का खुलकर समर्थन किया है।
कमेटी के चेयरमैन जॉन मूलनार ने इस मौके पर कहा कि चीन ने दशकों तक अमेरिका की खुली नीतियों का फायदा उठाकर अपनी सत्तावादी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाया है। उनके अनुसार,यह कानून निर्यात नियंत्रण को लागू करने,चीनी व्यापार में होने वाली गड़बड़ियों पर रोक लगाने और अमेरिकी करदाताओं के पैसे,तकनीक और ऊर्जा संसाधनों को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा और जरूरी कदम है। मूलनार का कहना है कि यह बिल न सिर्फ मौजूदा खतरों से निपटने में मदद करेगा,बल्कि भविष्य में चीन पर अमेरिकी निर्भरता को कम करने की रणनीति को भी मजबूत करेगा।
अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पर बनी यह सेलेक्ट कमेटी चीन से पैदा हो रही आर्थिक,तकनीकी और सुरक्षा चुनौतियों का अध्ययन करती है। बीते कुछ वर्षों में इस कमेटी का जोर सरकारी योजनाओं में सख्ती लाने,सप्लाई चेन को सुरक्षित करने और चीन पर निर्भरता घटाने पर रहा है। यह नया फंडिंग बिल उसी दिशा में उठाया गया एक और अहम कदम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून के पारित होने से अमेरिका और चीन के रिश्तों में और तल्खी आ सकती है। जहाँ अमेरिका इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के तौर पर देख रहा है,वहीं चीन की ओर से इसे “दमनकारी” और “शीत युद्ध मानसिकता” का उदाहरण बताया जा सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस कानून का दोनों देशों के व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्तों पर क्या असर पड़ता है।
अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स द्वारा पारित यह फंडिंग बिल साफ संकेत देता है कि वॉशिंगटन अब चीन के मामले में किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है। तकनीक,व्यापार,ऊर्जा और सुरक्षा जैसे अहम क्षेत्रों में सख्ती बढ़ाकर अमेरिका यह संदेश देना चाहता है कि वह अपनी राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। यह कानून न सिर्फ मौजूदा चुनौतियों से निपटने का प्रयास है,बल्कि भविष्य की उस रणनीति का भी हिस्सा है,जिसके जरिए अमेरिका वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत बनाए रखना चाहता है।
