अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका का सख्त रुख,उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने यूरोप से कहा– राष्ट्रपति ट्रंप के बयान हल्के में न लें

वाशिंगटन,9 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ग्रीनलैंड के मुद्दे पर यूरोपीय देशों को स्पष्ट और सख्त संदेश देते हुए कहा है कि इस रणनीतिक द्वीप को लेकर अमेरिका की चिंताओं को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। व्हाइट हाउस में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वेंस ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयान किसी राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा नहीं हैं,बल्कि इसके पीछे वैश्विक सुरक्षा से जुड़ी गंभीर रणनीतिक चिंताएँ हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि ग्रीनलैंड न केवल अमेरिका,बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था में अहम भूमिका निभाता है।

उपराष्ट्रपति वेंस ने ग्रीनलैंड को वैश्विक मिसाइल रक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उनके अनुसार,आर्कटिक क्षेत्र में स्थित यह द्वीप उत्तर अटलांटिक क्षेत्र में प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और सैन्य निगरानी के लिहाज से बेहद अहम है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर अमेरिका के सहयोगी देश,विशेष रूप से यूरोपीय देश,गंभीर कदम नहीं उठाते हैं,तो अमेरिका को अपने स्तर पर कार्रवाई करनी पड़ सकती है। हालाँकि,उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि ऐसी संभावित कार्रवाई किस रूप में हो सकती है।

जेडी वेंस ने यह भी कहा कि यूरोप में इस विचार को लेकर जो विरोध देखने को मिल रहा है कि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका कोई बड़ा कदम उठा सकता है,वह जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया है। उन्होंने मीडिया और यूरोप के कुछ राजनीतिक वर्गों पर निशाना साधते हुए कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप के बयानों को गलत संदर्भ में पेश किया जा रहा है। वेंस के मुताबिक,अमेरिकी प्रशासन इस मुद्दे को भावनात्मक या उत्तेजक तरीके से नहीं,बल्कि रणनीतिक और कूटनीतिक ढंग से आगे बढ़ाना चाहता है।

उन्होंने साफ किया कि अमेरिका इस विषय पर कूटनीति का रास्ता अपनाएगा। वेंस ने कहा, “हम कुछ बातें निजी तौर पर कहेंगे और कुछ सार्वजनिक रूप से। यह सिलसिला जारी रहेगा।” उनके इस बयान से यह संकेत मिलता है कि ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के बीच पर्दे के पीछे भी बातचीत चल रही है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो अगले सप्ताह या उसके बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं से मुलाकात कर सकते हैं। यह मुलाकात इस मुद्दे पर औपचारिक और उच्च-स्तरीय बातचीत की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

उपराष्ट्रपति वेंस ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका अपने यूरोपीय सहयोगियों पर ग्रीनलैंड की सुरक्षा को मजबूत करने का दबाव बना रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की माँग कोई असामान्य या अनुचित नहीं है। उनके शब्दों में, “हम अपने यूरोपीय दोस्तों से सिर्फ इतना कह रहे हैं कि इस भूभाग की सुरक्षा को ज्यादा गंभीरता से लें।” उन्होंने दोहराया कि अगर यूरोपीय देश इस जिम्मेदारी को निभाने में विफल रहते हैं,तो अमेरिका को अपने हितों और वैश्विक सुरक्षा के लिए कुछ करना पड़ेगा।

वेंस ने यह भी बताया कि ग्रीनलैंड में कुछ शत्रुतापूर्ण ताकतों की बढ़ती दिलचस्पी अमेरिका के लिए चिंता का विषय है। हालाँकि,उन्होंने किसी देश का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया,लेकिन उनके बयान को चीन और रूस जैसी ताकतों के संदर्भ में देखा जा रहा है,जो हाल के वर्षों में आर्कटिक क्षेत्र में अपनी मौजूदगी और प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका लंबे समय से यह मानता रहा है कि आर्कटिक क्षेत्र भविष्य की भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का अहम केंद्र बनने जा रहा है।

हालाँकि,उपराष्ट्रपति वेंस ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका की ओर से किसी भी तरह की अंतिम कार्रवाई का फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही करेंगे। उन्होंने कहा कि इस मामले में सभी विकल्प राष्ट्रपति के पास खुले हैं और परिस्थितियों के हिसाब से निर्णय लिया जाएगा। इससे यह संकेत मिलता है कि फिलहाल अमेरिका दबाव और कूटनीति के जरिए अपने सहयोगियों को सक्रिय करना चाहता है,लेकिन भविष्य में रुख और कड़ा भी हो सकता है।

गौरतलब है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है और वहाँ की स्थानीय सरकार को आंतरिक मामलों में काफी हद तक स्वायत्तता प्राप्त है। आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होने के कारण ग्रीनलैंड लंबे समय से सैन्य,रणनीतिक और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। शीत युद्ध के दौर से ही अमेरिका वहाँ अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए हुए है और आज के बदले हुए वैश्विक हालात में इसकी अहमियत और बढ़ गई है।

उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का यह बयान साफ तौर पर यह दर्शाता है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं में ऊपर बना हुआ है। अमेरिका चाहता है कि यूरोप इस मुद्दे को केवल राजनीतिक विवाद के तौर पर न देखे,बल्कि वैश्विक सुरक्षा के एक अहम पहलू के रूप में समझे। आने वाले दिनों में डेनमार्क,ग्रीनलैंड और अमेरिका के बीच होने वाली बातचीत यह तय करेगी कि इस संवेदनशील मुद्दे पर आगे का रास्ता किस दिशा में जाता है।