वाशिंगटन,9 जनवरी (युआईटीवी)- वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक अहम मोड़ आता दिख रहा है,जहाँ अमेरिका वेनेजुएला के कच्चे तेल को दोबारा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। इसी कड़ी में व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने संकेत दिया है कि अमेरिका एक नए “कंट्रोल्ड फ्रेमवर्क” के तहत भारत को वेनेजुएला से कच्चा तेल खरीदने की अनुमति देने के लिए तैयार है। यह फ्रेमवर्क पूरी तरह अमेरिकी नियंत्रण में होगा और इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तेल से होने वाली आय का इस्तेमाल गलत गतिविधियों या भ्रष्टाचार में न होकर वेनेजुएला के आम नागरिकों के हित में किया जाए। इस बयान को भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है,क्योंकि प्रतिबंधों से पहले भारत वेनेजुएला के तेल का एक प्रमुख खरीदार था।
जब इस वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी से पूछा गया कि भारत की तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए क्या अमेरिका उसे वेनेजुएला का तेल खरीदने की इजाजत देगा,तो उन्होंने संक्षिप्त लेकिन स्पष्ट जवाब देते हुए “हाँ ” कहा। हालाँकि,उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस नई व्यवस्था के सभी पहलुओं को अभी अंतिम रूप दिया जा रहा है,इसलिए फिलहाल ज्यादा तकनीकी विवरण साझा करना संभव नहीं है। फिर भी,उनके इस बयान से यह साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका अब वेनेजुएला के तेल को पूरी तरह अलग-थलग रखने की नीति से आगे बढ़कर नियंत्रित तरीके से उसे वैश्विक बाजार में लाने पर विचार कर रहा है।
इस संदर्भ में अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस्टोफर राइट के हालिया बयान को भी अहम माना जा रहा है। फॉक्स बिजनेस को दिए गए एक इंटरव्यू में राइट ने कहा था कि अमेरिका वेनेजुएला के तेल को लगभग सभी देशों को बेचने के लिए तैयार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह एक विशेष व्यवस्था के तहत होगी,जिसमें तेल की बिक्री अमेरिकी सरकार के माध्यम से की जाएगी। इससे होने वाली आय सीधे अमेरिका के नियंत्रण वाले खातों में जमा होगी और बाद में इसे इस तरह इस्तेमाल किया जाएगा कि उसका वास्तविक लाभ वेनेजुएला की जनता तक पहुँचें,न कि वहाँ की सरकार की कथित गलत नीतियों या भ्रष्ट तंत्र को।
क्रिस्टोफर राइट ने यह भी बताया कि वेनेजुएला के कच्चे तेल में न केवल अमेरिका, बल्कि यूरोप,एशिया और दुनिया के कई अन्य हिस्सों के खरीदारों की गहरी रुचि बनी हुई है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की कई रिफाइनरियाँ पहले से ही वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने के हिसाब से डिजाइन की गई हैं। यही कारण है कि वर्षों के प्रतिबंधों के बावजूद इस तेल की माँग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। राइट के अनुसार,अगर इस तेल को नियंत्रित और कानूनी तरीके से बाजार में लाया जाता है,तो यह वैश्विक आपूर्ति को स्थिर करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
ऊर्जा मंत्री ने इस नीति को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति से जोड़ते हुए कहा कि अमेरिका का मकसद वेनेजुएला के तेल क्षेत्र की दिशा को बदलना है,लेकिन प्रतिबंधों की सख्ती बनाए रखते हुए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि या तो वेनेजुएला अमेरिका के साथ मिलकर अपने तेल का निर्यात करेगा या फिर उसे तेल बेचने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनके मुताबिक,तेल और उससे होने वाली आय पर अमेरिकी नियंत्रण का मुख्य उद्देश्य अवैध गतिविधियों,भ्रष्टाचार और क्षेत्रीय अस्थिरता को खत्म करना है। राइट ने जोर देकर कहा कि अमेरिका केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है,बल्कि अपने नियमों को सख्ती से लागू भी कर रहा है।
उन्होंने हाल ही में प्रतिबंधों का उल्लंघन करने वाले कुछ तेल टैंकरों को जब्त किए जाने का उदाहरण देते हुए कहा कि यह दिखाता है कि अमेरिका अपने फैसलों को जमीन पर उतारने के लिए तैयार है। जब उनसे पूछा गया कि नए फ्रेमवर्क के बाहर वेनेजुएला का तेल ले जाने वाले जहाजों के खिलाफ क्या अमेरिकी सैन्य कार्रवाई हो सकती है,तो उन्होंने जवाब दिया कि केवल उसी ऊर्जा व्यापार को अनुमति दी जाएगी,जिसे अमेरिका सही और कानूनी मानेगा। इस बयान से यह स्पष्ट है कि अमेरिका इस मुद्दे पर किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है।
न्यूयॉर्क में आयोजित एक ऊर्जा सम्मेलन में क्रिस्टोफर राइट ने इस योजना को और विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि अमेरिका फिलहाल वेनेजुएला में स्टोरेज में रखे गए 30 मिलियन से 50 मिलियन बैरल कच्चे तेल को बेचने की योजना बना रहा है। इसके बाद भविष्य में वहाँ होने वाले उत्पादन को भी चरणबद्ध तरीके से वैश्विक बाजार में लाया जाएगा। राइट ने कहा कि अमेरिका इस प्रक्रिया में वेनेजुएला को डाइल्यूएंट की सप्लाई करेगा,ताकि भारी कच्चे तेल को परिवहन और रिफाइनिंग के लिए उपयुक्त बनाया जा सके। इसके साथ ही उत्पादन को स्थिर करने और धीरे-धीरे बढ़ाने के लिए जरूरी पार्ट्स और उपकरणों के आयात को भी संभव बनाया जाएगा।
उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिकी अधिकारी उन तेल कंपनियों के साथ बातचीत कर रहे हैं,जो कभी वेनेजुएला में सक्रिय थीं और साथ ही उन कंपनियों से भी संपर्क में हैं,जो दोबारा वहाँ निवेश करने में दिलचस्पी रखती हैं। इन चर्चाओं का उद्देश्य निवेश के लिए जरूरी शर्तों और सुरक्षा उपायों पर सहमति बनाना है,ताकि किसी भी तरह की कानूनी या राजनीतिक अनिश्चितता से बचा जा सके। यह पूरी प्रक्रिया इस बात की ओर इशारा करती है कि अमेरिका वेनेजुएला के ऊर्जा क्षेत्र को पूरी तरह अलग-थलग रखने के बजाय उसे नियंत्रित ढाँचे में वापस लाने की रणनीति अपना रहा है।
भारत के लिए यह संभावित बदलाव खास मायने रखता है। अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले भारत वेनेजुएला के कच्चे तेल का एक बड़ा खरीदार था। भारत की कई रिफाइनरियाँ खास तौर पर वेनेजुएला के भारी और खट्टे कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन की गई थीं। प्रतिबंधों के बाद भारत को अपनी आपूर्ति रणनीति में बदलाव करना पड़ा और मध्य पूर्व,रूस तथा अन्य देशों से तेल आयात बढ़ाना पड़ा। अगर भारत को फिर से वेनेजुएला के तेल तक पहुँच मिलती है,तो यह उसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा फायदा हो सकता है।
भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते ऊर्जा उपभोक्ताओं में से एक है और अपनी कुल तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में आयात के स्रोतों में विविधता लाना भारत की ऊर्जा नीति का एक अहम हिस्सा रहा है। वेनेजुएला के तेल तक दोबारा पहुँच मिलने से न केवल आपूर्ति के विकल्प बढ़ेंगे,बल्कि कीमतों और लॉजिस्टिक्स के लिहाज से भी भारत को फायदा हो सकता है। खासकर ऐसे समय में,जब वैश्विक ऊर्जा बाजार भू-राजनीतिक तनावों,उत्पादन कटौती और माँग में उतार-चढ़ाव के कारण लगातार अस्थिर बना हुआ है।
दूसरी ओर,वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है,लेकिन वर्षों से चले आ रहे प्रतिबंधों,निवेश की कमी और बुनियादी ढाँचे की समस्याओं के कारण वह अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। अमेरिका का यह नया कंट्रोल्ड फ्रेमवर्क वेनेजुएला के लिए भी एक मौका बन सकता है,बशर्ते कि यह व्यवस्था वास्तव में वहाँ की जनता के हित में काम करे। हालाँकि,इस बात पर नजर बनी रहेगी कि अमेरिकी नियंत्रण में होने वाली इस प्रक्रिया से वेनेजुएला की संप्रभुता और आंतरिक राजनीति पर क्या असर पड़ता है।
अमेरिका द्वारा भारत को वेनेजुएला का तेल खरीदने की संभावित अनुमति केवल एक द्विपक्षीय या व्यापारिक फैसला नहीं है,बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा संतुलन,भू-राजनीति और प्रतिबंध नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत देती है। आने वाले महीनों में जब इस नए फ्रेमवर्क का पूरा खाका सामने आएगा,तब यह और स्पष्ट होगा कि भारत,वेनेजुएला और अमेरिका के बीच यह त्रिकोणीय व्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ती है और वैश्विक तेल बाजार पर इसका क्या असर पड़ता है।
