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ट्रेनों में हलाल भोजन पर एनएचआरसी सख्त,रेलवे की रिपोर्ट को बताया अधूरी और पारदर्शिता से रहित

नई दिल्ली,12 जनवरी (युआईटीवी)- भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने ट्रेनों में हलाल-सर्टिफाइड भोजन परोसने से जुड़े मामले में इंडियन रेलवे की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सोमवार को आयोग ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस मुद्दे पर रेलवे बोर्ड द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट न केवल “अधूरी” है,बल्कि उसमें “पारदर्शिता की भी कमी” नजर आती है। आयोग का कहना है कि यह मामला सीधे तौर पर यात्रियों की पसंद की आजादी और उनके मौलिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है,इसलिए इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

दरअसल,यह पूरा मामला एक शिकायत के बाद सामने आया,जिसमें आरोप लगाया गया था कि इंडियन रेलवे ट्रेनों में परोसे जाने वाले नॉन-वेजिटेरियन भोजन में सिर्फ हलाल-प्रोसेस्ड मीट का इस्तेमाल कर रहा है। शिकायतकर्ता का दावा था कि इससे उन यात्रियों के साथ अनुचित भेदभाव होता है,जो धार्मिक या व्यक्तिगत कारणों से हलाल भोजन नहीं करना चाहते। शिकायत में इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया गया था,जिसके बाद एनएचआरसी ने रेलवे बोर्ड को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।

रेलवे बोर्ड ने अपने जवाब में आयोग को बताया कि इंडियन रेलवे या आईआरसीटीसी के पास ट्रेनों में हलाल-सर्टिफाइड भोजन बेचने या परोसने का कोई आधिकारिक प्रावधान नहीं है। रेलवे बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि रेलवे और आईआरसीटीसी अपने सभी फूड प्रोडक्ट्स के लिए फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) की गाइडलाइन्स का पालन करते हैं। उनके अनुसार,रेलवे की किसी भी नीति में हलाल-सर्टिफिकेशन को लेकर कोई विशेष नियम या अनिवार्यता नहीं है।

रेलवे अधिकारियों ने यह भी बताया कि इससे पहले ऐसा ही एक मामला केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के सामने भी उठ चुका है। उस मामले में एक आवेदक ने सूचना के अधिकार कानून के तहत यह जानकारी माँगी थी कि क्या ट्रेनों में परोसे जाने वाले नॉन-वेज भोजन में हलाल-प्रोसेस्ड मीट का इस्तेमाल किया जाता है। इस पर रेलवे बोर्ड ने सीआईसी के समक्ष भी यही रुख अपनाया था कि इंडियन रेलवे द्वारा कोई भी हलाल-सर्टिफाइड भोजन नहीं परोसा जाता।

सीआईसी ने अपने आदेश में रेलवे की इस बात को रिकॉर्ड किया था। आयोग ने यह भी उल्लेख किया कि चीफ प्रिंसिपल इन्फॉर्मेशन ऑफिसर ने साफ तौर पर कहा था कि आईआरसीटीसी के पास हलाल-सर्टिफाइड भोजन से जुड़ी किसी पॉलिसी,उसकी मंजूरी की प्रक्रिया या यात्रियों से इस संबंध में ली गई किसी स्पष्ट सहमति का कोई रिकॉर्ड या दस्तावेज मौजूद नहीं है। इस आधार पर सीआईसी ने रेलवे के जवाब को दर्ज कर मामला समाप्त कर दिया था।

हालाँकि,एनएचआरसी ने इस पूरे प्रकरण को अलग नजरिए से देखा है। आयोग का कहना है कि भले ही रेलवे आधिकारिक तौर पर हलाल भोजन परोसने से इनकार कर रहा हो,लेकिन उसकी रिपोर्ट में कई अहम पहलुओं पर स्पष्टता का अभाव है। एनएचआरसी ने अपनी टिप्पणी में कहा कि रेलवे की रिपोर्ट “अधूरी” प्रतीत होती है और उसमें पारदर्शिता की कमी है,खासकर इसलिए क्योंकि यह यात्रियों की पसंद की आजादी को प्रभावित करती है। आयोग ने जोर देकर कहा कि यह आजादी एक मौलिक अधिकार है,जिसके तहत हर व्यक्ति को यह जानने का अधिकार है कि वह क्या खा रहा है और उसका भोजन किस प्रक्रिया से तैयार किया गया है।

एनएचआरसी ने इस संदर्भ में हलाल की धार्मिक परिभाषा का भी उल्लेख किया। आयोग ने कहा कि दारुल उलूम देवबंद की व्याख्या के अनुसार,किसी भी मांस को ‘हलाल’ माने जाने के लिए यह आवश्यक है कि उसे एक मुस्लिम द्वारा ज़बह किया गया हो। आयोग का मानना है कि अगर इस तरह का मांस ट्रेनों में या आईआरसीटीसी द्वारा प्रबंधित प्लेटफॉर्म पर परोसा जा रहा है,तो इससे न केवल यात्रियों की पसंद से जुड़ा सवाल उठता है,बल्कि रोजगार और अवसरों में भेदभाव की चिंताएँ भी सामने आती हैं।

आयोग ने संकेत दिया कि यदि हलाल प्रक्रिया को अपनाया जाता है,तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि मांस की प्रोसेसिंग और सप्लाई चेन में केवल एक विशेष समुदाय के लोगों को ही काम के अवसर मिल रहे हों। इससे अन्य धर्मों या समुदायों के लोगों के लिए रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं,जो समानता और गैर-भेदभाव के संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है।

एनएचआरसी का यह रुख इस मामले को केवल भोजन की पसंद तक सीमित नहीं रखता,बल्कि इसे व्यापक मानवाधिकार और समान अवसर के सवाल से जोड़ता है। आयोग ने साफ किया है कि यात्रियों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उन्हें परोसा जाने वाला भोजन किस प्रकार का है और उसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री और प्रक्रिया क्या है। पारदर्शिता की कमी से अविश्वास पैदा होता है और यही मानवाधिकारों के संरक्षण के उद्देश्य के खिलाफ है।

फिलहाल,एनएचआरसी की इस टिप्पणी के बाद गेंद एक बार फिर रेलवे के पाले में है। उम्मीद की जा रही है कि रेलवे बोर्ड इस मुद्दे पर अधिक स्पष्ट,विस्तृत और पारदर्शी जवाब देगा,ताकि यात्रियों की शंकाओं का समाधान हो सके। यह मामला आने वाले समय में रेलवे की खानपान नीतियों और यात्रियों को दी जाने वाली जानकारी के तरीकों में बदलाव की दिशा भी तय कर सकता है।