सुप्रीम कोर्ट

डिजिटल अरेस्ट मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की स्टेटस रिपोर्ट,सीबीआई जाँच और समन्वित राष्ट्रीय रणनीति पर काम तेज

नई दिल्ली,13 जनवरी (युआईटीवी)- डिजिटल अरेस्ट से जुड़े बढ़ते मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिए गए स्वतः संज्ञान मामले में केंद्र सरकार ने अपनी स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर दी है। इस मामले की मंगलवार को शीर्ष अदालत में सुनवाई होनी है। केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया है कि डिजिटल अरेस्ट जैसे गंभीर और संगठित साइबर अपराध की प्रकृति को देखते हुए जाँच की प्रक्रिया को तेज कर दिया गया है और इसके लिए एक ठोस,व्यापक और समन्वित योजना पर काम किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इस तरह के अपराध न केवल आम नागरिकों को मानसिक और आर्थिक रूप से नुकसान पहुँचा रहे हैं,बल्कि देश की साइबर सुरक्षा व्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं।

स्टेटस रिपोर्ट में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया कि अदालत के 16 दिसंबर 2025 के आदेश के अनुपालन में दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर को अब केंद्रीय जाँच ब्यूरो यानी सीबीआई को सौंप दिया गया है। इसके बाद सीबीआई ने 9 जनवरी को इस मामले में एक नई एफआईआर दर्ज की है। सरकार के अनुसार,सीबीआई को जाँच सौंपने का उद्देश्य डिजिटल अरेस्ट से जुड़े अपराधों के पीछे काम कर रहे संगठित नेटवर्क,उनकी कार्यप्रणाली और अंतर्राष्ट्रीय कनेक्शनों की गहराई से जाँच करना है,ताकि इस पूरे ढाँचे को जड़ से तोड़ा जा सके।

डिजिटल अरेस्ट के मामलों में अक्सर ठग खुद को पुलिस,सीबीआई,ईडी या अन्य जाँच एजेंसियों का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल या फोन कॉल के जरिए लोगों को डराते हैं और उन्हें “डिजिटल अरेस्ट” में होने का दावा करते हैं। इसके बाद पीड़ितों से मोटी रकम ऐंठी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों की गंभीरता को देखते हुए स्वतः संज्ञान लिया था और केंद्र सरकार से ठोस कदम उठाने को कहा था।

स्टेटस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत गृह मंत्रालय ने डिजिटल अरेस्ट की समस्या से निपटने के लिए एक हाई-लेवल इंटर-डिपार्टमेंटल कमेटी का गठन किया है। इस समिति की अध्यक्षता गृह मंत्रालय में आंतरिक सुरक्षा के विशेष सचिव कर रहे हैं। इस समिति में केंद्र सरकार के कई अहम विभागों और एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया है,ताकि इस समस्या से बहुआयामी तरीके से निपटा जा सके।

इस उच्चस्तरीय समिति में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय,दूरसंचार विभाग,विदेश मंत्रालय,वित्तीय सेवा विभाग,कानून मंत्रालय,उपभोक्ता मामले मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक,सीबीआई,राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए),दिल्ली पुलिस और इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (आई4सी) के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। आई4सी के सीईओ को इस समिति का मेंबर सेक्रेटरी बनाया गया है। इसके अलावा,अटॉर्नी जनरल भी नियमित रूप से इस समिति की बैठकों में भाग ले रहे हैं,ताकि कानूनी और संवैधानिक पहलुओं पर भी सही मार्गदर्शन मिल सके।

केंद्र सरकार की रिपोर्ट के अनुसार,इस समिति की पहली बैठक 29 दिसंबर को हुई थी। इस बैठक में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और अदालत द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी के सुझावों पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक का मुख्य उद्देश्य डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराधों की मौजूदा स्थिति का आकलन करना और उनसे निपटने के लिए एक प्रभावी ढाँचा तैयार करना था। इसके बाद 2 जनवरी को एमिकस क्यूरी के साथ एक विशेष बैठक आयोजित की गई,जिसमें दूरसंचार विभाग,इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय,आरबीआई और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस बैठक में तकनीकी,वित्तीय और नियामकीय पहलुओं पर गहन चर्चा हुई।

स्टेटस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 6 जनवरी को आईटी इंटरमीडियरीज के साथ एक अहम बैठक की गई। इस बैठक में गूगल,व्हाट्सऐप,टेलीग्राम और माइक्रोसॉफ्ट जैसी प्रमुख टेक कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक का मकसद यह समझना था कि डिजिटल अरेस्ट से जुड़े अपराधों में इन प्लेटफॉर्म्स का किस तरह दुरुपयोग किया जा रहा है और किस तरह के तकनीकी उपाय अपनाकर ऐसे अपराधों को रोका जा सकता है। सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स की भूमिका इस तरह के अपराधों को रोकने में बेहद अहम है।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी आग्रह किया है कि सभी संबंधित विभागों और एजेंसियों से सुझाव लेकर एक ठोस और व्यापक राष्ट्रीय योजना तैयार करने के लिए उसे कम-से-कम एक महीने का समय दिया जाए। सरकार का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट जैसी गंभीर समस्या से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए जल्दबाजी में नहीं,बल्कि सोच-समझकर और समन्वित रणनीति के तहत कदम उठाना जरूरी है।

सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में डिजिटल अरेस्ट के मामलों को रोकने के लिए जन-जागरूकता अभियान,सख्त कानूनी कार्रवाई,तकनीकी निगरानी और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग जैसे कदमों को एक साथ लागू किया जा सकता है। अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में यह देखना अहम होगा कि अदालत केंद्र सरकार की अब तक की कार्रवाई और भविष्य की योजना को लेकर क्या रुख अपनाती है और क्या अतिरिक्त निर्देश जारी करती है।