अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट (तस्वीर क्रेडिट@AIRNewsHindi)

अमेरिका में भारतीय प्रवासियों को राहत: कैलिफोर्निया की फेडरल कोर्ट ने बिना सुनवाई हिरासत को बताया असंवैधानिक,दो भारतीय नागरिकों की रिहाई का दिया आदेश

वाशिंगटन,19 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य से भारतीय प्रवासियों के लिए एक अहम और राहत भरी खबर सामने आई है। यहाँ एक फेडरल अदालत ने इमिग्रेशन अधिकारियों को दो भारतीय नागरिकों को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बिना किसी नोटिस,सुनवाई या ठोस कानूनी आधार के किसी व्यक्ति को हिरासत में रखना संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन हो सकता है। यह फैसला ऐसे समय आया है,जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश के बाद अमेरिका की प्रवासी नीतियों को और अधिक सख्त कर दिया गया है और इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट यानी आईसीई द्वारा देशभर में प्रवासियों के खिलाफ जाँच और हिरासत की कार्रवाइयों में तेजी देखी जा रही है।

इससे पहले भी इसी मामले से जुड़े एक आदेश में अदालत ने तीन अन्य भारतीय नागरिकों को रिहा करने के निर्देश दिए थे। ये सभी आदेश इस सप्ताह पूर्वी कैलिफोर्निया की अमेरिकी जिला अदालत की ओर से जारी किए गए। दोनों मामलों में अदालत ने यह स्पष्ट रूप से पाया कि आईसीई ने संबंधित भारतीय नागरिकों को हिरासत में लेने से पहले न तो उन्हें कोई औपचारिक नोटिस दिया,न ही सुनवाई का अवसर प्रदान किया और न ही यह बताया कि उन्हें हिरासत में रखने की वैधानिक वजह क्या है। अदालत ने इस प्रक्रिया को अमेरिकी संविधान के तहत दी गई “ड्यू प्रोसेस” यानी उचित कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ माना।

एक प्रमुख मामले में चीफ यूएस जिला जज ट्रॉय एल ननली ने भारतीय नागरिक किरणदीप को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार,किरणदीप दिसंबर 2021 में अमेरिका आई थीं और उसी दौरान उन्होंने अमेरिका में शरण के लिए आवेदन भी किया था। जब वह अमेरिका पहुँचीं थीं,तब इमिग्रेशन अधिकारियों ने उनकी प्रारंभिक जाँच की थी और कुछ समय के लिए हिरासत में रखने के बाद यह तय किया था कि वह न तो समुदाय के लिए कोई खतरा हैं और न ही उनके फरार होने की आशंका है। इसके बाद उन्हें रिहा कर दिया गया था।

कोर्ट के दस्तावेजों में बताया गया है कि किरणदीप पिछले चार साल से अधिक समय से कैलिफोर्निया में रह रही थीं। इस दौरान उन्होंने आईसीई और अमेरिकी नागरिकता एवं इमिग्रेशन सेवा के साथ सभी निर्धारित चेक-इन और जाँच प्रक्रियाओं का समय पर पालन किया। वह कैलिफोर्निया में अपने साझेदार के साथ रहती थीं और उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं था। अदालत ने यह भी नोट किया कि इतने लंबे समय तक नियमों का पालन करने के बावजूद उन्हें अचानक हिरासत में लेना गंभीर सवाल खड़े करता है।

सितंबर 2025 में किरणदीप को एक रूटीन आईसीई चेक-इन के दौरान हिरासत में ले लिया गया था। इमिग्रेशन अधिकारियों का कहना था कि वह पहले एक निर्धारित तारीख पर आईसीई के सामने पेश नहीं हुई थीं। हालाँकि,किरणदीप ने अपनी अनुपस्थिति की एक वैध वजह बताई थी और अगले ही दिन उन्होंने चेक-इन पूरा कर लिया था। उस समय आईसीई ने उनके कारणों को स्वीकार भी कर लिया था। इसके बावजूद बाद में उन्हें हिरासत में लेना अदालत की नजर में अनुचित और गैर-जरूरी था।

जज ट्रॉय एल ननली ने अपने फैसले में कहा कि बिना किसी सुनवाई के लगातार हिरासत में रखना संभवतः संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन है। उन्होंने आदेश दिया कि किरणदीप को तुरंत रिहा किया जाए और यह भी स्पष्ट किया कि अधिकारियों को बिना किसी नए नोटिस या कानूनी आधार के उन्हें दोबारा गिरफ्तार करने से रोका जाए। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जब एक व्यक्ति को जाँच के बाद यह कहकर रिहा किया गया हो कि वह खतरा नहीं है,तो बाद में बिना प्रक्रिया के उसकी स्वतंत्रता छीनना गंभीर संवैधानिक चिंता पैदा करता है।

इसी तरह के एक अन्य मामले में जज ननली ने एक और भारतीय नागरिक रोहित को भी रिहा करने का आदेश दिया। रोहित का अमेरिका में शरण लेने का दावा अभी लंबित है। कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार,रोहित नवंबर 2021 में बिना औपचारिक निरीक्षण के अमेरिका में दाखिल हुए थे और उन्होंने भारत में राजनीतिक उत्पीड़न का डर जताते हुए शरण माँगी थी। उन्हें जून 2025 में हिरासत में लिया गया था और वह सात महीने से अधिक समय तक बिना किसी बॉन्ड सुनवाई के हिरासत में रहे।

अदालत ने पाया कि रोहित के समुदाय के साथ मजबूत संबंध थे और वह लंबे समय से एक स्थिर जीवन जी रहे थे। इसके बावजूद सरकार यह साबित करने में नाकाम रही कि उन्हें लगातार हिरासत में रखना क्यों जरूरी है। न तो उन्हें बॉन्ड सुनवाई दी गई और न ही यह बताया गया कि उनकी रिहाई से कोई वास्तविक खतरा पैदा होगा। जज ननली ने अपने आदेश में कहा कि बिना किसी उचित प्रक्रिया के किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखना उसकी आजादी को गलत तरीके से छीनने का गंभीर खतरा पैदा करता है।

अपने फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि जब इमिग्रेशन अधिकारी किसी व्यक्ति को कस्टडी से रिहा करते हैं,तो उस व्यक्ति को “सुरक्षित आजादी” का अधिकार मिल जाता है। इसका मतलब यह है कि जब तक कोई नई और वैध कानूनी वजह न हो,तब तक उस व्यक्ति को फिर से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। अदालत ने इस सिद्धांत को दोनों मामलों में लागू किया और अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया कि प्रवासी कानूनों के सख्त होने के बावजूद संविधान के मूल अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

ये फैसले ऐसे समय पर आए हैं,जब ट्रंप प्रशासन के आदेशों के बाद अमेरिका में प्रवासी नीतियों को और कड़ा कर दिया गया है। इसके तहत आईसीई अधिकारियों ने देशभर में प्रवासियों के लिए जाँच,चेक-इन और हिरासत की कार्रवाइयों को तेज कर दिया है। मानवाधिकार संगठनों और प्रवासी अधिकार समूहों का आरोप है कि इस सख्ती के कारण कई ऐसे लोग भी हिरासत में लिए जा रहे हैं,जो वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं,कानून का पालन कर रहे हैं और जिनसे किसी तरह का खतरा नहीं है।

कैलिफोर्निया की फेडरल कोर्ट के ये आदेश न केवल इन दो भारतीय नागरिकों के लिए राहत लेकर आए हैं,बल्कि अमेरिका में रह रहे हजारों अन्य प्रवासियों के लिए भी एक अहम कानूनी मिसाल बन सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि इमिग्रेशन कानून चाहे जितने सख्त क्यों न हों,उन्हें लागू करते समय संवैधानिक अधिकारों और उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।

भारतीय समुदाय के लिए यह फैसला खास मायने रखता है,क्योंकि हाल के महीनों में कई भारतीय नागरिकों को रूटीन चेक-इन के दौरान हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आई हैं। अदालत के इस रुख से यह उम्मीद जगी है कि बिना सुनवाई और नोटिस के हिरासत जैसी कार्रवाइयों पर न्यायपालिका सख्ती से नजर रखेगी। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ट्रंप प्रशासन की सख्त प्रवासी नीतियों के बीच अदालतें किस तरह संतुलन बनाती हैं और प्रवासियों के अधिकारों की रक्षा करती हैं।