मॉस्को,21 जनवरी (युआईटीवी)- रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने ग्रीनलैंड को लेकर पश्चिमी देशों की राजनीति और दावों पर तीखा हमला बोला है। रूसी डिप्लोमेसी के 2025 के परिणामों पर आयोजित एक अहम कॉन्फ्रेंस के दौरान लावरोव ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का “प्राकृतिक हिस्सा” नहीं है। उन्होंने इसे औपनिवेशिक इतिहास की देन बताया और कहा कि रूस किसी के कानूनी अधिकारों को चुनौती नहीं देता,लेकिन अपने अधिकारों की अनदेखी भी स्वीकार नहीं करेगा। लावरोव के इस बयान ने ग्रीनलैंड को लेकर पहले से मौजूद अंतर्राष्ट्रीय बहस को और तेज कर दिया है,खासकर ऐसे समय में जब यह मुद्दा नाटो और पश्चिमी देशों के भीतर भी तनाव का कारण बन रहा है।
लावरोव ने अपने संबोधन में पश्चिमी देशों के भीतर बढ़ती “संकट की प्रवृत्तियों” का उल्लेख करते हुए कहा कि ग्रीनलैंड इसका ताजा उदाहरण है। उनके मुताबिक,यह मामला न सिर्फ डेनमार्क और अमेरिका के बीच संवेदनशील बनता जा रहा है,बल्कि नाटो के अंदर भी मतभेदों को उजागर कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले एक दशक से पश्चिमी देश अंतर्राष्ट्रीय कानून के मूल स्वरूप का सक्रिय रूप से विरोध कर रहे हैं और अपने हितों के अनुसार नियमों की व्याख्या कर रहे हैं। लावरोव ने कहा कि रूस ग्रीनलैंड के आसपास बन रही “गंभीर भू-राजनीतिक स्थिति” पर करीबी नजर रखे हुए है,क्योंकि आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक राजनीति और सुरक्षा के लिहाज से तेजी से अहम होता जा रहा है।
हालाँकि,रूसी विदेश मंत्री ने यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की कि रूस का ग्रीनलैंड के आंतरिक मामलों में दखल देने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने कहा कि वाशिंगटन अच्छी तरह जानता है कि रूस की ग्रीनलैंड पर कब्जा करने या वहाँ किसी तरह की सैन्य या राजनीतिक कार्रवाई की कोई योजना नहीं है। इसके बावजूद,लावरोव ने ग्रीनलैंड के ऐतिहासिक और कानूनी दर्जे पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसे डेनमार्क का प्राकृतिक हिस्सा कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। उनके शब्दों में, “यह न तो नॉर्वे का प्राकृतिक हिस्सा था और न ही डेनमार्क का है। यह एक औपनिवेशिक जीत का हिस्सा है। यह दूसरी बात है कि अब वहाँ के लोग इसके आदी हो गए हैं और सहज महसूस करते हैं।”
लावरोव के इस बयान को ग्रीनलैंड के औपनिवेशिक अतीत की याद दिलाने वाला माना जा रहा है। ग्रीनलैंड लंबे समय तक डेनमार्क के नियंत्रण में रहा है और आज भी वह डेनमार्क के किंगडम का हिस्सा है,हालाँकि उसे व्यापक स्वायत्तता प्राप्त है। रूस की ओर से इसे “औपनिवेशिक जीत” कहे जाने से यह बहस और गहरी हो गई है कि क्या ग्रीनलैंड का मौजूदा राजनीतिक दर्जा वास्तव में ऐतिहासिक न्याय और अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुरूप है या नहीं।
अपने भाषण में लावरोव ने रूस की ताकत और आत्मविश्वास को भी रेखांकित किया। उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा कि रूस किसी को भी अपने कानूनी अधिकारों की अनदेखी नहीं करने देगा। उनके अनुसार,रूस हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेगा,किसी के भी कानूनी अधिकारों को चुनौती नहीं देगा,लेकिन यह भी सुनिश्चित करेगा कि उसके अपने अधिकारों को हल्के में न लिया जाए। यह बयान ऐसे समय आया है,जब रूस और पश्चिम के बीच रिश्ते पहले से ही यूक्रेन युद्ध, प्रतिबंधों और सुरक्षा मुद्दों को लेकर तनावपूर्ण बने हुए हैं।
ग्रीनलैंड का मुद्दा हाल के महीनों में इसलिए भी ज्यादा संवेदनशील हो गया है,क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच व्यापार और टैरिफ से जुड़ी राजनीति इसमें जुड़ती नजर आ रही है। यूरोपीय देशों का कहना है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘ग्रीनलैंड टैरिफ’ से जुड़ी घोषणा पिछले साल उनके प्रशासन के साथ हुए ट्रेड डील का उल्लंघन होगी। इस संदर्भ में यूरोपीय संघ के नेता गुरुवार को ब्रसेल्स में एक आपातकालीन सम्मेलन में संभावित जवाबी कार्रवाई पर चर्चा करने वाले हैं। इससे साफ है कि ग्रीनलैंड अब सिर्फ एक भूभाग का सवाल नहीं रहा,बल्कि यह व्यापार,सुरक्षा और भू-राजनीति के कई मोर्चों पर टकराव का केंद्र बन चुका है।
विशेषज्ञों के अनुसार,रूस की ओर से ग्रीनलैंड पर इस तरह की टिप्पणी आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा का संकेत है। आर्कटिक में प्राकृतिक संसाधनों,नई समुद्री मार्गों और सैन्य मौजूदगी को लेकर अमेरिका,रूस और यूरोपीय देशों के बीच पहले से ही खींचतान चल रही है। ग्रीनलैंड की रणनीतिक स्थिति इसे इस प्रतिस्पर्धा का अहम हिस्सा बनाती है।
सर्गेई लावरोव का बयान सिर्फ डेनमार्क या ग्रीनलैंड तक सीमित नहीं है,बल्कि यह पश्चिमी देशों के खिलाफ रूस की व्यापक कूटनीतिक सोच को दर्शाता है। ग्रीनलैंड को औपनिवेशिक विरासत का हिस्सा बताकर और पश्चिमी देशों पर अंतर्राष्ट्रीय कानून की अनदेखी का आरोप लगाकर रूस ने साफ संकेत दिया है कि वह आर्कटिक और वैश्विक राजनीति में अपनी भूमिका को नजरअंदाज किए जाने के खिलाफ मुखर रहेगा। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि ग्रीनलैंड को लेकर यह बयानबाजी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर किस दिशा में जाती है और क्या यह पहले से जटिल वैश्विक समीकरणों को और उलझाती है।
