आयोवा,28 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान के खिलाफ अपने सख्त और आक्रामक रुख को दोहराते हुए यह साफ कर दिया है कि अमेरिका मध्य पूर्व में न तो दबाव कम करने के मूड में है और न ही बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद करना चाहता है। आयोवा में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने ईरान को लेकर सैन्य शक्ति के इस्तेमाल की संभावना और कूटनीतिक समझौते,दोनों का एक साथ उल्लेख किया। उनके बयान ऐसे समय पर आए हैं, जब ईरान के भीतर प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई,क्षेत्रीय सुरक्षा और परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव लगातार बना हुआ है।
अपने भाषण में ट्रंप ने मध्य पूर्व की ओर अमेरिका की बड़ी सैन्य मौजूदगी की ओर इशारा करते हुए कहा कि ईरान की दिशा में एक और “खूबसूरत आर्मडा” बढ़ रही है। उन्होंने इस सैन्य जमावड़े को शक्ति प्रदर्शन के रूप में पेश किया और साथ ही यह उम्मीद भी जताई कि तेहरान अंततः बातचीत के जरिए किसी समझौते पर पहुँच सकता है। ट्रंप के शब्दों में,ईरान को पहले ही एक डील कर लेनी चाहिए थी और अब भी उसके पास यही बेहतर विकल्प है। इस बयान से साफ झलकता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति दबाव और बातचीत,दोनों को समानांतर रणनीति के रूप में देख रहे हैं।
ट्रंप का यह संदेश केवल एक मंच तक सीमित नहीं रहा। एक अलग बातचीत में भी उन्होंने यही रुख दोहराया और कहा कि ईरान को लेकर हालात “बदल रहे हैं”। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपने बड़े सैन्य संसाधन तैनात कर दिए हैं और इससे तेहरान पर दबाव बढ़ा है। ट्रंप के अनुसार,ईरान अब यह समझने लगा है कि कूटनीतिक रास्ता ही उसके लिए बेहतर हो सकता है। उन्होंने संकेत दिए कि ईरानी नेतृत्व बातचीत के लिए पहले से ज्यादा इच्छुक नजर आ रहा है।
सैन्य ताकत और बातचीत के बीच संतुलन को और स्पष्ट करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान के पास अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का विकल्प नजरअंदाज करने का कोई कारण नहीं है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि क्षेत्र में तैनात अमेरिकी आर्मडा किसी भी अन्य देश की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ी और प्रभावशाली है। ट्रंप का दावा रहा कि ईरान के अधिकारी कई बार बातचीत की इच्छा जता चुके हैं और वे किसी समझौते तक पहुँचना चाहते हैं। उनके मुताबिक,तेहरान की ओर से संपर्क की कोशिशें हुई हैं और यह दर्शाता है कि दबाव का असर दिखने लगा है।
हालाँकि,अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि बातचीत तभी संभव है,जब ईरान स्पष्ट और ठोस शर्तों पर बात करने को तैयार हो। एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने संकेत दिया कि अमेरिका दरवाजा बंद नहीं कर रहा है,लेकिन शर्तें पहले से तय हैं और उनमें कोई ढील नहीं दी जाएगी। प्रशासन के अनुसार,अगर ईरान इन शर्तों को समझते हुए संपर्क करता है,तो अमेरिका बातचीत के लिए तैयार है।
इन शर्तों में सबसे अहम माँग ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी है। अमेरिका का रुख है कि ईरान को यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह रोकना होगा और पहले से संवर्धित यूरेनियम को हटाना होगा। इसके अलावा ईरान के लंबी दूरी की मिसाइलों के भंडार पर सीमा लगाने और क्षेत्र में सक्रिय अपने प्रॉक्सी गुटों को समर्थन देना बंद करने की मांग भी शामिल है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि जब तक इन बुनियादी मुद्दों पर प्रगति नहीं होती,तब तक किसी भी समझौते की गुंजाइश नहीं बन सकती।
दूसरी ओर,ईरान ने बातचीत की इच्छा तो जताई है,लेकिन इन शर्तों को पूरी तरह स्वीकार करने से इनकार किया है। तेहरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह अपनी संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर समझौता नहीं कर सकता। इसी टकराव के कारण अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बना हुआ है और किसी ठोस समाधान तक पहुँचना मुश्किल दिखाई देता है।
अपने बयानों में ट्रंप ने ईरान के परमाणु ढाँचे के खिलाफ पहले की गई अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जून में हुए हमलों के दौरान अमेरिका ने ईरान के तीन प्रमुख ठिकानों को निशाना बनाया और उसकी परमाणु क्षमता को “खत्म” कर दिया। हालाँकि,इन हमलों से ईरान के यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पर कितना असर पड़ा,इसे लेकर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। फिर भी ट्रंप का दावा है कि यह कार्रवाई लंबे समय से लंबित थी और इससे अमेरिका ने अपनी ताकत और इरादों का स्पष्ट संदेश दे दिया।
जून में हुए बमबारी अभियान को लेकर ट्रंप ने कहा कि लोग वर्षों से ऐसी कार्रवाई का इंतजार कर रहे थे। उनके अनुसार,यह कदम यह दिखाने के लिए जरूरी था कि अमेरिका केवल चेतावनी नहीं देता,बल्कि जरूरत पड़ने पर कार्रवाई भी करता है। यह बयान उनके पहले कार्यकाल की नीति से भी जुड़ा हुआ है,जब उन्होंने 2015 के परमाणु समझौते से अमेरिका को बाहर निकाल लिया था और ईरान के खिलाफ “मैक्सिमम प्रेशर” अभियान शुरू किया था। उस नीति का मकसद आर्थिक प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव के जरिए ईरान को कमजोर करना और उसे नए समझौते के लिए मजबूर करना था।
इसके बावजूद,ट्रंप ने अब तक यह अंतिम फैसला नहीं लिया है कि ईरान के खिलाफ आगे किसी बड़े सैन्य अभियान को हरी झंडी दी जाए या नहीं। पहले उन्होंने संकेत दिया था कि अगर ईरानी सरकार प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा करती है तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई कर सकता है। इन प्रदर्शनों और कार्रवाई में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की खबरें सामने आई थीं,लेकिन इसके बाद भी ट्रंप प्रशासन ने अब तक कोई निर्णायक कदम नहीं उठाया है। यह दर्शाता है कि अमेरिका फिलहाल हर विकल्प को खुला रखना चाहता है।
आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गंभीर रूप ले सकता है। ट्रंप अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम के साथ इस विषय पर और चर्चा करने वाले हैं। इसी बीच,मध्य पूर्व के जल क्षेत्र में एक प्रमुख अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर के पहुँचने से सैन्य विकल्पों की संभावना और बढ़ गई है। इस तैनाती को ईरान के लिए एक सख्त चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है,जिससे यह साफ हो जाता है कि अमेरिका किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहता है।
ट्रंप ने यह भी दावा किया कि पिछले वर्ष जून में हुई 12 दिन की लड़ाई के दौरान उन्होंने यरुशलम को पहले हमला करने की अनुमति दी थी,जिससे ईरान के मिसाइल हमले को रोका जा सका। उनके अनुसार,यह कदम क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी था और इससे बड़े टकराव को टालने में मदद मिली। इस बयान से यह संकेत मिलता है कि उनकी सरकार सैन्य दबाव को कूटनीतिक उपायों के साथ जोड़कर देखती है और जरूरत पड़ने पर अपने सहयोगियों को भी खुली छूट देने से नहीं हिचकती।
कुल मिलाकर,डोनाल्ड ट्रंप का ईरान को लेकर रुख एक स्पष्ट दोहरे संदेश के रूप में सामने आता है। एक ओर अमेरिका अपनी सैन्य ताकत का खुलकर प्रदर्शन कर रहा है और यह जताना चाहता है कि किसी भी चुनौती का जवाब देने में वह सक्षम है। दूसरी ओर,बातचीत और समझौते का रास्ता भी पूरी तरह बंद नहीं किया गया है। यह रणनीति दबाव और संवाद के बीच संतुलन साधने की कोशिश है,जिसमें अमेरिका यह उम्मीद कर रहा है कि ईरान अंततः उसकी शर्तों पर बातचीत के लिए मजबूर होगा।
मध्य पूर्व की बदलती परिस्थितियों और वैश्विक राजनीति के संदर्भ में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले हफ्तों में अमेरिका और ईरान के संबंध किस दिशा में जाते हैं। क्या सैन्य दबाव कूटनीतिक समाधान की ओर ले जाएगा या फिर यह तनाव किसी बड़े टकराव में बदल सकता है—इस सवाल का जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में है,लेकिन इतना तय है कि ट्रंप प्रशासन इस मुद्दे को अपनी विदेश नीति के केंद्र में बनाए हुए है।
