यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन,यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (तस्वीर क्रेडिट@manji_ahir)

भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता: वैश्विक व्यापार की धुरी में बदलाव और वाशिंगटन की बढ़ती चिंता

वाशिंगटन,29 जनवरी (युआईटीवी)- भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच घोषित मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) न सिर्फ दोनों पक्षों के आर्थिक रिश्तों के लिहाज से ऐतिहासिक माना जा रहा है,बल्कि इसने वैश्विक राजनीति और व्यापार कूटनीति में भी हलचल पैदा कर दी है। दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत जीडीपी और 33 प्रतिशत वैश्विक व्यापार को कवर करने वाले भारत-ईयू संबंध अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुके हैं। इस समझौते की घोषणा इस सप्ताह नई दिल्ली में की गई,जहाँ दोनों पक्षों के शीर्ष नेताओं ने इसे भारत के इतिहास का सबसे बड़ा व्यापार समझौता करार दिया। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे “सभी समझौतों की जननी” बताते हुए कहा कि इससे करीब दो अरब लोगों का एक विशाल मुक्त व्यापार क्षेत्र बनेगा,जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को नई दिशा देगा।

भारत और यूरोपीय संघ के बीच मौजूदा व्यापार लगभग 25 अरब डॉलर का है। तुलना करें तो अमेरिका के साथ भारत का व्यापार करीब 45 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है। इसके बावजूद भारत-ईयू एफटीए ने वाशिंगटन में चिंता की लकीरें खींच दी हैं। अमेरिका के प्रभावशाली सीनेटरों,वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और नीति विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते से अमेरिका के हाशिए पर चले जाने का खतरा है। उनकी आशंका है कि भारत और यूरोपीय संघ मिलकर वैश्विक व्यापार नियमों और रणनीतिक गठबंधनों को नए सिरे से परिभाषित कर सकते हैं,जिसमें अमेरिका की भूमिका कमजोर पड़ सकती है।

अमेरिकी सीनेट में एरिजोना से डेमोक्रेट सांसद मार्क केली ने इस समझौते को लेकर खुलकर चिंता जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि यूरोपीय संघ ने भारत के साथ व्यापार और सुरक्षा समझौता किया है,जबकि कनाडा और ब्रिटेन चीन के साथ बातचीत कर रहे हैं। केली ने इसका कारण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को बताया,जिनके चलते अमेरिका के कई सहयोगी नाराज हुए। उन्होंने चेतावनी दी कि सहयोगी देशों द्वारा किए जा रहे ऐसे समझौतों का अमेरिका पर भी असर पड़ रहा है और यह संकेत वाशिंगटन के लिए अच्छा नहीं है। केली के अनुसार,यह स्थिति अमेरिका के व्यापारिक दृष्टिकोण को लेकर उसके साझेदारों के बीच बढ़ती निराशा को दर्शाती है।

ट्रंप प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने भी यूरोप के इस कदम पर असंतोष जताया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने यूरोपीय संघ की आलोचना करते हुए कहा कि वह टैरिफ के मुद्दे पर वाशिंगटन के साथ सहमति बनाने में विफल रहा। एक टीवी साक्षात्कार में बेसेंट ने कहा कि यूरोपीय देशों को वही करना चाहिए जो उनके लिए सबसे अच्छा हो,लेकिन उन्हें यह देखकर निराशा हुई कि यूरोप उच्च टैरिफ नीति पर अमेरिका के साथ खड़ा नहीं हुआ और इसके बजाय भारत के साथ बड़े व्यापार समझौते की ओर बढ़ गया। उनके बयान से यह स्पष्ट संकेत मिला कि अमेरिका इस पूरे घटनाक्रम को अपने व्यापार हितों के लिए चुनौती के रूप में देख रहा है।

वॉशिंगटन स्थित नीति विशेषज्ञों ने भी भारत-ईयू एफटीए को अमेरिकी व्यापार रणनीति के लिए एक चेतावनी बताया है। सूचना प्रौद्योगिकी और नवाचार फाउंडेशन (आईटीआईएफ) ने कहा कि यह समझौता दिखाता है कि कैसे अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ आगे बढ़ रही हैं,जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका पीछे छूटता जा रहा है। आईटीआईएफ में व्यापार,बौद्धिक संपदा और डिजिटल प्रौद्योगिकी शासन के एसोसिएट डायरेक्टर रोड्रिगो बालबोटिन ने कहा कि यूरोपीय संघ और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते से वाशिंगटन को सबक लेने की जरूरत है। उनके मुताबिक,जब अन्य देश टैरिफ में कटौती और नए व्यापार नियमों को अपनाकर आगे बढ़ रहे हैं,तब अमेरिका किनारे खड़ा नजर आ रहा है।

हालाँकि,बालबोटिन ने यह भी माना कि इस समझौते में कुछ कमियाँ हैं। उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ के कई डिजिटल नियम,खासकर डिजिटल मार्केट्स एक्ट,बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ भेदभाव करते हैं। इसके अलावा,बौद्धिक संपदा संरक्षण और उसके प्रवर्तन के मामले में भारत अभी भी दुनिया की सबसे चुनौतीपूर्ण प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसके बावजूद उन्होंने यह संभावना जताई कि यदि यह समझौता सीमा के भीतर मौजूद बाधाओं को कम करने में सफल रहता है,तो इससे अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका को भी लाभ हो सकता है। आईटीआईएफ ने बढ़ते संरक्षणवाद के दौर में दो बड़े लोकतंत्रों के बीच इस तरह के मुक्त व्यापार समझौते का स्वागत किया है और चीन के व्यापारवाद को इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती बताया है।

दूसरी ओर,कुछ विशेषज्ञ इस समझौते के प्रभाव को लेकर अधिक संतुलित और सतर्क दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दे रहे हैं। अमेरिका के पूर्व व्यापार अधिकारी मार्क लिन्स्कॉट ने भारत-ईयू एफटीए को एक बड़ी राजनयिक उपलब्धि माना,लेकिन इसके प्रभाव को लेकर अतिशयोक्ति से बचने की बात कही। अटलांटिक काउंसिल के लिए लिखते हुए लिन्स्कॉट ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस समझौते पर ध्यान दिया जाना चाहिए,लेकिन इससे वैश्विक व्यापार या आर्थिक विकास में अचानक कोई बड़ा बदलाव आने की संभावना नहीं है। उनके अनुसार,चरणबद्ध शुल्क कटौती और नियामकीय स्पष्टता के माध्यम से इसके लाभ धीरे-धीरे सामने आएँगे।

लिन्स्कॉट ने यह भी रेखांकित किया कि कृषि, बौद्धिक संपदा अधिकार और यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र जैसे संवेदनशील मुद्दों को फिलहाल बाद की वार्ताओं के लिए टाल दिया गया है। इसके अलावा,इस समझौते को लागू करने से पहले यूरोपीय संघ के सदस्य देशों और यूरोपीय संसद की मंजूरी सहित घरेलू अनुमोदन की प्रक्रिया से गुजरना होगा। उनके अनुसार,वाशिंगटन के दृष्टिकोण से यह समझौता अमेरिका-भारत या अमेरिका-ईयू व्यापार संबंधों को कमजोर नहीं करता,बल्कि इससे अमेरिका-भारत व्यापार समझौते की दिशा में भी नई गति मिल सकती है।

भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत का इतिहास लंबा और जटिल रहा है। पहली बार 2007 में दोनों पक्षों ने एफटीए पर बातचीत शुरू की थी, लेकिन शुल्क,बाजार पहुँच और नियामकीय ढाँचे जैसे मुद्दों पर मतभेदों के चलते यह प्रक्रिया कई वर्षों तक ठप रही। 2021 में बातचीत को फिर से शुरू किया गया और लंबे दौर की वार्ताओं के बाद अब जाकर यह समझौता आकार ले पाया है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि यह सिर्फ एक आर्थिक करार नहीं,बल्कि धैर्य,रणनीति और बदलती वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम है।

वैश्विक स्तर पर यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब व्यापार तनाव,भू-राजनीतिक अनिश्चितता और संरक्षणवादी नीतियाँ लगातार बढ़ रही हैं। चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध,रूस-यूक्रेन संघर्ष और आपूर्ति श्रृंखलाओं में बदलाव ने दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को नए साझेदार तलाशने के लिए मजबूर किया है। भारत और यूरोपीय संघ का यह कदम इसी बदलते परिदृश्य की झलक देता है,जहाँ देश बहुपक्षीय सहयोग और विविधीकृत व्यापार संबंधों पर जोर दे रहे हैं।

वाशिंगटन से आ रही प्रतिक्रियाएँ यह संकेत देती हैं कि अमेरिका को आने वाले समय में अपनी व्यापार रणनीति पर गंभीरता से पुनर्विचार करना पड़ सकता है। यदि उसके सहयोगी देश और साझेदार अमेरिका को दरकिनार कर नए समझौते करते रहे,तो वैश्विक व्यापार में उसकी प्रभावशाली भूमिका कमजोर पड़ सकती है। भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेतक बनकर उभरा है। इसका पूरा प्रभाव भले ही आने वाले वर्षों में सामने आए,लेकिन इतना तय है कि इस समझौते ने वैश्विक व्यापार की बहस को नए सिरे से तेज कर दिया है और अमेरिका सहित दुनिया की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को अपनी प्राथमिकताओं पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।