डोनाल्ड ट्रंप के बयानों पर भड़का ईरान (तस्वीर क्रेडिट@OpIndia_in)

ईरान पर दबाव और संवाद की दोहरी रणनीति: ट्रंप की ‘आर्माडा’ चेतावनी से पश्चिम एशिया में बढ़ी बेचैनी

वाशिंगटन,29 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान को लेकर अपना सख्त रुख दोहराते हुए पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल तेज कर दी है। सैन्य ताकत के प्रदर्शन और कूटनीति के खुले संकेतों के बीच ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान की ओर एक और अमेरिकी “आर्माडा” बढ़ रही है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है,जब अमेरिका और ईरान के बीच पहले से ही तनाव चरम पर है और क्षेत्रीय सुरक्षा,प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई तथा ईरान के प्रभाव को लेकर कई मोर्चों पर टकराव की स्थिति बनी हुई है।

आयोवा के क्वाइव में आयोजित एक चुनावी कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य तैनाती में वृद्धि का जिक्र करते हुए कहा कि ईरान की दिशा में “एक और खूबसूरत आर्माडा” आगे बढ़ रही है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन्हें उम्मीद है कि तेहरान समझौते का रास्ता चुनेगा। ट्रंप के शब्दों में, “मुझे उम्मीद है कि वे एक समझौता करेंगे। उन्हें पहली बार ही समझौता कर लेना चाहिए था। तब उनके पास एक देश होता।” इस बयान को अमेरिकी शक्ति प्रदर्शन के साथ-साथ ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है,जिसमें सैन्य विकल्प को सामने रखते हुए बातचीत का दरवाजा भी खुला छोड़ा गया है।

यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने इस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया हो। इससे पहले भी वह कह चुके हैं कि अमेरिका के पास एक आर्माडा है,जो ईरान की ओर बढ़ रही है और संभव है कि उसे इस्तेमाल करने की जरूरत ही न पड़े। आर्माडा शब्द का प्रयोग आमतौर पर कई युद्धपोतों के एक साथ किसी मिशन या संभावित युद्ध के लिए रवाना होने की स्थिति को दर्शाने के लिए किया जाता है। ऐसे में ट्रंप का यह बयान प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ ईरान के लिए एक स्पष्ट चेतावनी भी माना जा रहा है।

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में ईरान के भीतर चल रहे विरोध प्रदर्शनों का मुद्दा भी अहम है। ट्रंप पहले ही कई बार ईरानी नेतृत्व को चेतावनी दे चुके हैं कि अगर प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गई तो अमेरिका हस्तक्षेप कर सकता है। उन्होंने यह तक कहा था कि ऐसी स्थिति में अमेरिका “मदद के लिए आएगा।” इन बयानों ने ईरान को और अधिक आक्रामक प्रतिक्रिया देने के लिए उकसाया है,जिससे दोनों देशों के बीच बयानबाजी और धमकियों का सिलसिला तेज होता जा रहा है।

ईरान ने भी ट्रंप की टिप्पणियों का जवाब देते हुए अमेरिका को चेतावनी दी है कि किसी भी तरह के सैन्य दबाव या हस्तक्षेप का कड़ा जवाब दिया जाएगा। तेहरान का कहना है कि वह अपने आंतरिक मामलों में बाहरी दखल बर्दाश्त नहीं करेगा। इस तनातनी के बीच अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ गई है,क्योंकि पश्चिम एशिया पहले ही कई संघर्षों और अस्थिरताओं से जूझ रहा है।

इसी बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने एक संतुलित और कूटनीतिक रुख अपनाने की कोशिश की है। उन्होंने कहा है कि ईरान अपने नागरिकों के अधिकारों की पूरी तरह रक्षा करेगा और साथ ही अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत शांति स्थापित करने तथा युद्ध रोकने की किसी भी प्रक्रिया का स्वागत करता है। यह बयान उन्होंने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ फोन पर हुई बातचीत के दौरान दिया। इस वार्ता को क्षेत्रीय स्तर पर तनाव कम करने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है,खासकर ऐसे समय में जब ईरान और सऊदी अरब के रिश्ते हाल के वर्षों में काफी उतार-चढ़ाव से गुजरे हैं।

दूसरी ओर,ट्रंप प्रशासन ने पश्चिम एशिया के एक अन्य अहम देश इराक को लेकर भी सख्त संदेश दिया है। एपी के अनुसार,राष्ट्रपति ट्रंप ने इराक को चेतावनी दी है कि अगर पूर्व प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी की सत्ता में वापसी होती है तो अमेरिका इराक का समर्थन नहीं करेगा। यह चेतावनी ऐसे समय आई है,जब इराक की शिया पार्टियों के एक बड़े राजनीतिक गठबंधन ने नूरी अल-मलिकी के नामांकन का समर्थन करने की घोषणा की है। ट्रंप प्रशासन नूरी को ईरान का करीबी मानता है और उसे इराक में ईरानी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखता है।

इराक में संभावित राजनीतिक बदलाव और ईरान के साथ उसके रिश्ते अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं। ट्रंप की चेतावनी को इराकी राजनीति पर दबाव बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है,ताकि वहाँ ऐसा नेतृत्व न उभरे जो तेहरान के ज्यादा करीब हो। इससे यह भी साफ होता है कि अमेरिका केवल ईरान ही नहीं,बल्कि पूरे क्षेत्र में अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए सख्त रुख अपनाए हुए है।

ट्रंप की ‘आर्माडा’ वाली चेतावनी और साथ ही बातचीत की पेशकश पश्चिम एशिया में अमेरिका की दोहरी रणनीति को दर्शाती है। एक ओर वह सैन्य ताकत के जरिए दबाव बनाना चाहते हैं,तो दूसरी ओर कूटनीतिक समाधान का विकल्प भी खुले रखना चाहते हैं। हालाँकि,इस तरह की बयानबाजी से क्षेत्र में अनिश्चितता और तनाव और बढ़ने की आशंका है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ईरान इस दबाव का जवाब किस तरह देता है और क्या दोनों देश किसी समझौते की दिशा में आगे बढ़ते हैं या फिर टकराव की राह और तेज होती है।