पेरिस,29 जनवरी (युआईटीवी)- फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ते तनाव को पूरे महाद्वीप के लिए एक गंभीर रणनीतिक “वेक-अप कॉल” करार दिया है। बुधवार को पेरिस में डेनमार्क और ग्रीनलैंड के शीर्ष नेताओं के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए मैक्रों ने साफ कहा कि हालिया घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि ग्रीनलैंड का मुद्दा केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं है,बल्कि यह यूरोपीय संप्रभुता,सुरक्षा और भविष्य की रणनीति से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। उन्होंने इस अवसर पर डेनमार्क और ग्रीनलैंड के प्रति फ्रांस की एकजुटता दोहराते हुए कहा कि पेरिस संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा।
मैक्रों ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि ग्रीनलैंड की स्थिति पूरे यूरोप के लिए एक रणनीतिक चेतावनी है। उनके अनुसार यह मुद्दा यूरोपीय संप्रभुता को मजबूत करने, आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा में सक्रिय योगदान देने,विदेशी हस्तक्षेप और दुष्प्रचार का मुकाबला करने,जलवायु परिवर्तन के खिलाफ संयुक्त प्रयास करने और सतत विकास को बढ़ावा देने से जुड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि रणनीतिक निर्भरता को कम करने के लिए यूरोपीय देशों के बीच विशेष साझेदारी की जरूरत है,ताकि भविष्य में किसी भी बाहरी दबाव का मजबूती से सामना किया जा सके।
फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि फ्रांस यूरोपीय संघ के सभी साझेदारों के साथ मिलकर संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांतों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि पेरिस संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुरूप इन मूल सिद्धांतों की रक्षा करता रहेगा और किसी भी देश की सीमाओं या अधिकारों को चुनौती देने वाले प्रयासों को स्वीकार नहीं करेगा। मैक्रों के इस बयान को यूरोप की सामूहिक सुरक्षा नीति के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है,खासकर ऐसे समय में जब आर्कटिक क्षेत्र में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तेजी से बढ़ रही है।
इस संयुक्त प्रेस वार्ता में डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने भी ग्रीनलैंड के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि नाटो को इस क्षेत्र में,विशेष रूप से ग्रीनलैंड और हाई नॉर्थ में,कहीं अधिक सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभानी चाहिए। फ्रेडरिक्सन के अनुसार,बदलते वैश्विक हालात और बढ़ती सैन्य व रणनीतिक गतिविधियों को देखते हुए आर्कटिक की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यूरोपीय और ट्रांस-अटलांटिक सहयोग को इस दिशा में और मजबूत करने की जरूरत है।
ग्रीनलैंड के नेतृत्व ने भी बार-बार अपनी स्थिति स्पष्ट की है। 22 जनवरी को ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन ने साफ कहा था कि संप्रभुता उनकी सरकार के लिए एक “रेड लाइन” है,चाहे अमेरिका की ओर से कितना भी दबाव क्यों न हो। नूक में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नीलसन ने कहा था कि ग्रीनलैंड की क्षेत्रीय अखंडता और सीमाएँ ऐसी लाल रेखाएँ हैं,जिन्हें किसी भी कीमत पर पार नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी दोहराया कि ग्रीनलैंड वही भविष्य चुनेगा जिसे वह आज जानता है,यानी डेनमार्क साम्राज्य के तहत एक स्वशासी क्षेत्र के रूप में अपनी पहचान बनाए रखना।
ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप है और यह डेनमार्क साम्राज्य के अंतर्गत एक स्वशासी क्षेत्र है। हालाँकि,इसे आंतरिक मामलों में व्यापक स्वायत्तता प्राप्त है,लेकिन रक्षा और विदेश नीति जैसे अहम विषयों का नियंत्रण अब भी कोपेनहेगन के पास है। अपने भौगोलिक स्थान और प्राकृतिक संसाधनों के कारण ग्रीनलैंड लंबे समय से वैश्विक शक्तियों के लिए रणनीतिक महत्व रखता है,खासकर आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में।
अमेरिका की ओर से ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों ने हाल के वर्षों में इस मुद्दे को और संवेदनशील बना दिया है। वर्ष 2025 में दोबारा राष्ट्रपति पद सँभालने के बाद डोनाल्ड ट्रंप कई बार सार्वजनिक रूप से ग्रीनलैंड को “हासिल करने” की इच्छा जता चुके हैं। उनके इन बयानों को यूरोप ने लगातार खारिज किया है और इसे अंतर्राष्ट्रीय नियमों तथा संप्रभुता के सिद्धांतों के खिलाफ बताया है। ट्रंप के बयानों ने न सिर्फ डेनमार्क और ग्रीनलैंड में चिंता बढ़ाई है,बल्कि पूरे यूरोप में इस बात पर बहस छेड़ दी है कि आर्कटिक क्षेत्र में भविष्य की रणनीति क्या होनी चाहिए।
मैक्रों के ताजा बयान को इसी पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है,जहाँ यूरोप अपनी सामूहिक सुरक्षा और संप्रभुता को लेकर अधिक सतर्क होता दिख रहा है। फ्रांस का यह स्पष्ट संदेश है कि ग्रीनलैंड केवल एक द्वीप नहीं,बल्कि यूरोप की रणनीतिक सुरक्षा,राजनीतिक एकता और वैश्विक भूमिका से जुड़ा अहम मुद्दा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यूरोपीय संघ और नाटो इस दिशा में कितनी ठोस और एकजुट रणनीति अपनाते हैं,ताकि आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ते तनाव और बाहरी दबावों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।
