अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (तस्वीर क्रेडिट@Arya909050)

ईरान पर हमले को लेकर ट्रंप का सस्पेंस,बातचीत का संकेत और हिंद महासागर में अमेरिकी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन

वॉशिंगटन,31 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान को लेकर वैश्विक राजनीति में अनिश्चितता और तनाव बढ़ा दिया है। एक ओर जहाँ उन्होंने ईरान के खिलाफ पहले से भी बड़े अमेरिकी स्ट्राइक की चेतावनी देकर कड़ा रुख दिखाया है,वहीं दूसरी ओर अब उन्होंने यह कहकर चौंकाया है कि वह ईरान के साथ बातचीत करने की योजना भी बना रहे हैं। ट्रंप के इस दोहरे संदेश ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में हलचल मचा दी है,क्योंकि यह बयान ऐसे समय आया है,जब अमेरिका ने हिंद महासागर में अपने सबसे घातक एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन को तैनात कर दिया है।

मीडिया से बातचीत के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को लेकर अपने इरादों के संकेत दिए,लेकिन साथ ही कई सवालों को खुला छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि वह ईरान के साथ बातचीत की योजना बना रहे हैं,हालाँकि यह बातचीत कब होगी,कहाँ होगी और किस स्तर पर होगी,इस बारे में उन्होंने कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी। ट्रंप ने यह भी नहीं बताया कि वॉशिंगटन की ओर से इस संभावित बातचीत का नेतृत्व कौन करेगा। जब उनसे सीधे तौर पर पूछा गया कि क्या वह तेहरान से संवाद शुरू करने जा रहे हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, “हाँ, मैं इसकी योजना बना रहा हूँ। हमारे पास अभी ईरान के लिए बहुत सारे,बहुत बड़े,बहुत पावरफुल जहाज जा रहे हैं और यह बहुत अच्छा होगा,अगर हमें उनका इस्तेमाल न करना पड़े।”

ट्रंप का यह बयान ऐसे वक्त पर आया है,जब अमेरिकी सैन्य गतिविधियाँ मध्य पूर्व और हिंद महासागर क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही हैं। अमेरिकी मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक,यूएसएस अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप हाल ही में हिंद महासागर में दाखिल हुआ है और धीरे-धीरे ईरान के करीब बढ़ रहा है। इस स्ट्राइक ग्रुप में अत्याधुनिक लड़ाकू विमान,युद्धपोत और मिसाइल सिस्टम शामिल हैं,जो किसी भी संभावित सैन्य ऑपरेशन में अहम भूमिका निभा सकते हैं। जानकारों का कहना है कि यह तैनाती न केवल ईरान पर दबाव बनाने के लिए है,बल्कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की रणनीति का भी हिस्सा है।

इस बीच पेंटागन चीफ पीट हेगसेथ ने साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिकी सेना राष्ट्रपति के हर फैसले को लागू करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि चाहे फैसला बातचीत का हो या सैन्य कार्रवाई का,अमेरिकी सशस्त्र बल हर स्थिति से निपटने में सक्षम हैं। हेगसेथ का यह बयान इस बात का संकेत देता है कि अमेरिका किसी भी विकल्प को फिलहाल खारिज नहीं कर रहा है और स्थिति के अनुसार कदम उठाने के लिए तैयार है।

ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच तुर्किए भी सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश करता नजर आ रहा है। तुर्किए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सुझाव दिया है कि ईरान को अमेरिका के साथ तेल को लेकर कोई डील कर लेनी चाहिए,ताकि किसी भी तरह के सैन्य हमले की स्थिति से बचा जा सके। तुर्किए का मानना है कि ऊर्जा और तेल जैसे मुद्दों पर समझौता दोनों देशों के बीच तनाव कम करने में मदद कर सकता है। हालाँकि,तुर्किए ने यह भी माना है कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की कोई गारंटी नहीं है कि हमले का खतरा पूरी तरह टल जाएगा। इसके बावजूद तुर्किए ने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता करने में रुचि दिखाई है,जिसे कूटनीतिक हल की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

अमेरिकी सैन्य तैयारियों को लेकर भी लगातार नई जानकारियाँ सामने आ रही हैं। एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार,अमेरिका इस इलाके में अपने एयर डिफेंस सिस्टम को और मजबूत कर रहा है। इसमें अतिरिक्त पैट्रियट मिसाइल बैटरियाँ भेजी जा रही हैं,ताकि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैनिकों और ठिकानों को ईरान के संभावित जवाबी हमले से बचाया जा सके। इसके अलावा,अमेरिकी मीडिया ने कई सूत्रों के हवाले से बताया है कि अमेरिका ने इस क्षेत्र में एक या उससे ज्यादा थाड मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी तैनात किए हैं। ये सिस्टम बैलिस्टिक मिसाइल हमलों को रोकने में सक्षम माने जाते हैं और इनकी तैनाती से साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका किसी भी अप्रत्याशित स्थिति के लिए तैयारी कर रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक अहम खुलासा यह भी हुआ है कि अमेरिका और ईरान के बीच इस महीने की शुरुआत में संदेशों का आदान-प्रदान हुआ था। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक,यह संवाद ओमानी डिप्लोमैट्स के जरिए हुआ,जिसमें ट्रंप के विदेशी दूत स्टीव विटकॉफ और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची के बीच संदेश भेजे गए। इन संदेशों में कथित तौर पर अमेरिकी हमले को रोकने के लिए एक संभावित बैठक की संभावना पर चर्चा हुई थी। हालाँकि,इस बातचीत का कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है,लेकिन इससे यह जरूर संकेत मिलता है कि पर्दे के पीछे कूटनीतिक प्रयास जारी हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की रणनीति हमेशा से दबाव और बातचीत के संयोजन पर आधारित रही है। एक तरफ सैन्य ताकत का प्रदर्शन कर विरोधी को झुकाने की कोशिश और दूसरी तरफ बातचीत का रास्ता खुला रखना—यह ट्रंप की विदेश नीति की पहचान रही है। ईरान के मामले में भी यही पैटर्न नजर आ रहा है। हिंद महासागर में एयरक्राफ्ट कैरियर की तैनाती,मिसाइल डिफेंस सिस्टम का विस्तार और सख्त बयान,इन सबके साथ-साथ बातचीत का संकेत देना,ईरान पर मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश मानी जा रही है।

फिलहाल यह साफ नहीं है कि ईरान इस स्थिति पर कैसे प्रतिक्रिया देगा। तेहरान पहले भी अमेरिकी दबाव और प्रतिबंधों का कड़ा विरोध करता रहा है और किसी भी तरह की सैन्य धमकी को अपनी संप्रभुता के खिलाफ बताता रहा है। वहीं,अगर बातचीत का रास्ता वास्तव में खुलता है,तो यह दोनों देशों के रिश्तों में एक नए अध्याय की शुरुआत भी हो सकती है।

ट्रंप के ताजा बयान ने ईरान को लेकर सस्पेंस को और गहरा कर दिया है। क्या यह बातचीत वास्तविक रूप लेगी या यह सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति है? क्या अमेरिकी सैन्य तैनाती किसी बड़े ऑपरेशन की भूमिका है या केवल शक्ति प्रदर्शन? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने आएँगे,लेकिन इतना तय है कि अमेरिका-ईरान संबंध एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गए हैं और पूरी दुनिया की नजरें अब इसी पर टिकी हुई हैं।