थलापति विजय की ‘जन नायकन’ पर सेंसर विवाद गहराया (तस्वीर क्रेडिट@Troll_Cinema)

थलापति विजय की ‘जन नायकन’ पर सेंसर विवाद गहराया,सीबीएफसी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की कैविएट

नई दिल्ली,31 जनवरी (युआईटीवी)- दक्षिण भारतीय सिनेमा के सुपरस्टार थलापति विजय की मोस्ट अवेटेड फिल्म ‘जन नायकन’ की रिलीज को लेकर चल रहा विवाद अब और गंभीर हो गया है। फिल्म के सर्टिफिकेशन को लेकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) और निर्माताओं के बीच टकराव न्यायिक दहलीज तक पहुँच चुका है। अब इस मामले में सेंसर बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर कर दी है,जिसके जरिए बोर्ड ने अदालत से आग्रह किया है कि जब तक उसका पक्ष नहीं सुना जाता,तब तक इस मामले में कोई एकतरफा या प्रतिकूल आदेश पारित न किया जाए। सीबीएफसी का यह कदम मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के हालिया आदेश के बाद सामने आया है,जिसने सिंगल जज के उस फैसले को रद्द कर दिया था,जिसमें बोर्ड को फिल्म को यूए 16+ सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया गया था।

दरअसल, ‘जन नायकन’ को 9 जनवरी को पोंगल के मौके पर रिलीज किया जाना था,लेकिन तय समय तक फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट नहीं मिल सका। इस वजह से न केवल फिल्म की रिलीज टल गई,बल्कि विजय के प्रशंसकों और फिल्म इंडस्ट्री में भी भारी नाराजगी देखने को मिली। शुरुआत में सीबीएफसी ने कुछ कट्स और संवादों को म्यूट करने की शर्त पर फिल्म को यूए सर्टिफिकेट देने का फैसला किया था। निर्माताओं ने बोर्ड द्वारा सुझाए गए सभी बदलावों को लागू करते हुए संशोधित संस्करण दोबारा सेंसर बोर्ड के समक्ष पेश भी कर दिया था। इसके बावजूद बाद में कुछ शिकायतें मिलने के आधार पर बोर्ड ने फिल्म को रिवाइजिंग कमेटी के पास भेजने का फैसला लिया,जिससे सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया और लंबी हो गई।

देरी से नाराज फिल्म के निर्माताओं ने इसे अनुचित बताते हुए मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया। 9 जनवरी को हाईकोर्ट की सिंगल जज बेंच ने सीबीएफसी को निर्देश दिया था कि फिल्म को यूए सर्टिफिकेट जारी किया जाए,साथ ही निर्माताओं को अपनी याचिका में संशोधन करने की भी छूट दी गई थी। इस आदेश को फिल्म इंडस्ट्री ने राहत के तौर पर देखा,लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। सीबीएफसी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच में अपील की,जहाँ सिंगल जज के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी गई।

इस बीच, ‘जन नायकन’ के निर्माता केवीएन प्रोडक्शंस ने डिवीजन बेंच के अंतरिम स्टे को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालाँकि,15 जनवरी को शीर्ष अदालत ने इस मामले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया और मद्रास हाईकोर्ट को 20 जनवरी तक मामले पर अंतिम फैसला सुनाने को कहा। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद यह साफ हो गया था कि फिलहाल पूरा मामला हाईकोर्ट के दायरे में ही रहेगा।

अब सीबीएफसी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर किया जाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि बोर्ड इस मुद्दे पर किसी भी संभावित कानूनी कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। कैविएट के जरिए सेंसर बोर्ड यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अगर निर्माता या कोई अन्य पक्ष फिर से सुप्रीम कोर्ट का रुख करता है,तो बिना बोर्ड का पक्ष सुने कोई आदेश पारित न किया जाए। बोर्ड का कहना है कि फिल्म सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया नियमों और कानून के तहत होती है और उसे सभी शिकायतों तथा आपत्तियों पर विचार करने का अधिकार है।

वहीं,निर्माताओं का आरोप है कि सेंसर बोर्ड अनावश्यक रूप से प्रक्रिया में देरी कर रहा है,जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। पोंगल जैसे बड़े त्योहार पर फिल्म की रिलीज टलने से न केवल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर असर पड़ा,बल्कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भी फिल्म की रणनीति प्रभावित हुई है। निर्माताओं का यह भी कहना है कि जब बोर्ड ने पहले ही संशोधित संस्करण को देखने के बाद सर्टिफिकेट देने की सहमति जता दी थी,तो बाद में शिकायतों के आधार पर दोबारा प्रक्रिया शुरू करना अनुचित है।

‘जन नायकन’ को लेकर उत्साह इसलिए भी चरम पर है,क्योंकि इसे थलापति विजय की आखिरी फिल्म माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि इस फिल्म के बाद विजय पूरी तरह से राजनीति में सक्रिय हो जाएँगे। फिल्म में पूजा हेगड़े,बॉबी देओल और प्रकाश राज जैसे बड़े सितारे अहम भूमिकाओं में नजर आने वाले हैं। ऐसे में इस फिल्म का सिर्फ सिनेमाई नहीं,बल्कि प्रतीकात्मक महत्व भी काफी बढ़ जाता है।

फिल्म की कहानी और उसके कथित राजनीतिक संदेश को लेकर भी चर्चाएँ तेज हैं। माना जा रहा है कि ‘जन नायकन’ में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया है,जो कुछ वर्गों को असहज कर सकता है। हालाँकि,निर्माताओं का कहना है कि फिल्म पूरी तरह से कानून के दायरे में बनी है और इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है,जो सर्टिफिकेशन में बाधा बने।

फिलहाल, ‘जन नायकन’ का भविष्य मद्रास हाईकोर्ट के अंतिम फैसले पर टिका हुआ है। एक तरफ सीबीएफसी अपने अधिकारों और प्रक्रियाओं का हवाला दे रहा है,तो दूसरी ओर निर्माता इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यावसायिक नुकसान का मामला बता रहे हैं। जैसे-जैसे कानूनी लड़ाई आगे बढ़ रही है,यह विवाद सिर्फ एक फिल्म की रिलीज तक सीमित न रहकर सेंसरशिप और रचनात्मक स्वतंत्रता पर एक बड़ी बहस का रूप लेता जा रहा है।