ईरान पर दबाव बढ़ाने की तैयारी में अमेरिका (तस्वीर क्रेडिट@garrywalia_)

ईरान पर दबाव बढ़ाने की तैयारी में अमेरिका,ट्रंप ने बड़े नौसैनिक बेड़े की तैनाती का किया ऐलान

वाशिंगटन,31 जनवरी (युआईटीवी)- अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा और सख्त संकेत दिया है। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका ईरान की ओर पहले से कहीं ज्यादा बड़ा नौसैनिक बेड़ा भेज रहा है। उनके मुताबिक यह तैनाती अमेरिका की उस नौसैनिक मौजूदगी से भी बड़ी होगी,जो पहले वेनेजुएला के पास देखी गई थी। ट्रंप ने साफ किया कि वॉशिंगटन की प्राथमिकता अब भी बातचीत के जरिए समझौता करना है,लेकिन अगर बातचीत से कोई नतीजा नहीं निकला तो अमेरिका अन्य विकल्पों के लिए भी पूरी तरह तैयार है।

व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान के मामले में अमेरिका दबाव और संवाद—दोनों रास्तों पर एक साथ चल रहा है। उन्होंने कहा, “हम अब ईरान की ओर ज्यादा संख्या में जहाज भेज रहे हैं। यह एक बड़ा जहाज़ी बेड़ा है। उम्मीद है कि समझौता हो जाएगा।” ट्रंप ने इस कदम को रणनीतिक दबाव बढ़ाने का हिस्सा बताया और कहा कि इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बातचीत गंभीरता से आगे बढ़े।

जब राष्ट्रपति से पूछा गया कि क्या ईरान को किसी तरह की समय-सीमा दी गई है,तो उन्होंने सीधे तौर पर इसका जवाब देने से बचते हुए कहा कि इस बारे में ईरान ही सबसे बेहतर जानता है। ट्रंप का यह बयान कई तरह की अटकलों को जन्म देता है,क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका ने ईरान को परोक्ष रूप से किसी समयबद्ध फैसले का संदेश दिया हो सकता है,भले ही इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार न किया गया हो।

ट्रंप ने यह भी पुष्टि की कि अमेरिका और ईरान के बीच सीधे संपर्क हुए हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिका का संदेश ईरान के शीर्ष नेतृत्व तक पहुँचा है,तो उन्होंने संक्षिप्त जवाब में कहा, “हाँ, पहुँचा है।” हालाँकि,उन्होंने यह नहीं बताया कि यह संदेश किस माध्यम से भेजा गया और उसमें क्या कहा गया। इस चुप्पी ने भी कूटनीतिक हलकों में चर्चाओं को और तेज कर दिया है।

अपने बयान में ट्रंप ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि अमेरिका बातचीत के जरिए समाधान चाहता है,लेकिन हालात बिगड़ने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, “अगर समझौता हो गया तो बहुत अच्छा है। अगर नहीं हुआ,तो आगे देखा जाएगा।” इस टिप्पणी को कई विश्लेषक एक सख्त चेतावनी के तौर पर देख रहे हैं,जिसमें कूटनीति के साथ-साथ सैन्य दबाव का स्पष्ट संकेत छिपा हुआ है।

राष्ट्रपति ने अमेरिका की सैन्य ताकत का जिक्र करते हुए कहा कि देश के पास दुनिया के सबसे शक्तिशाली युद्धपोत हैं। उन्होंने यह भी बताया कि मौजूदा नौसैनिक तैनाती रोकथाम की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है,ताकि क्षेत्र में किसी भी तरह के टकराव को रोका जा सके या अगर स्थिति बिगड़े तो अमेरिका पूरी तरह तैयार रहे। हालाँकि,ट्रंप ने किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई का विवरण देने से साफ इनकार कर दिया।

सैन्य योजनाओं के समय और नियमों से जुड़े सवालों पर ट्रंप ने कहा कि वह इन मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से बात नहीं करना चाहते। उनका कहना था कि सैन्य मामलों में पारदर्शिता की भी एक सीमा होती है और अमेरिका अपनी रणनीति को खुले मंच पर साझा नहीं कर सकता। यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि अमेरिका जानबूझकर अनिश्चितता बनाए रखना चाहता है,ताकि दबाव की रणनीति प्रभावी बनी रहे।

ये सभी बयान उस वक्त आए,जब ट्रंप व्हाइट हाउस में घरेलू आयोजनों के बीच विदेश नीति,रक्षा और अर्थव्यवस्था से जुड़े सवालों के जवाब दे रहे थे। हालाँकि,कार्यक्रम का मकसद घरेलू मुद्दों पर केंद्रित था,लेकिन ईरान पर दिए गए बयानों ने अंतर्राष्ट्रीय ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

अमेरिका और ईरान के रिश्ते बीते कई वर्षों से तनावपूर्ण रहे हैं। प्रतिबंध,मध्य पूर्व में क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे मुद्दे इस टकराव की मुख्य वजह रहे हैं। इससे पहले भी दोनों देशों के बीच बातचीत के कई दौर हुए,लेकिन वे या तो अधूरे रह गए या सीमित नतीजों तक ही सिमट गए। कई बार हालात ऐसे बने कि दोनों देशों के बीच सीधे टकराव की आशंका तक पैदा हो गई।

इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने के दौरान नौसैनिक तैनाती का इस्तेमाल अक्सर दोहरे उद्देश्य से किया है। एक तरफ यह कदम विरोधी पक्ष के लिए सख्त संदेश और चेतावनी का काम करता है,तो दूसरी तरफ इसे रोकथाम की रणनीति के तौर पर पेश किया जाता है। अमेरिका आमतौर पर यह कहता रहा है कि उसका मकसद युद्ध नहीं,बल्कि स्थिरता और कूटनीतिक समाधान है।

ईरान के नजरिए से देखें तो अमेरिकी नौसैनिक तैनाती को वह दबाव और धमकी के तौर पर देख सकता है। पहले भी ईरान ऐसे कदमों की आलोचना करता रहा है और कहता रहा है कि अमेरिका क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ा रहा है। वहीं,अमेरिका का तर्क है कि ईरान की गतिविधियाँ—चाहे वह परमाणु कार्यक्रम हो या क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की कोशिश—खुद तनाव की जड़ हैं।

मौजूदा हालात में ट्रंप का बयान यह साफ करता है कि अमेरिका दो मोर्चों पर एक साथ काम कर रहा है। एक तरफ बातचीत के जरिए समझौते की उम्मीद जताई जा रही है,तो दूसरी तरफ सैन्य दबाव बढ़ाकर यह संदेश दिया जा रहा है कि विकल्प खुले हैं। यह रणनीति सफल होती है या नहीं,यह आने वाले दिनों में होने वाली कूटनीतिक गतिविधियों और ईरान की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।

फिलहाल,ट्रंप के इस ऐलान ने मध्य पूर्व में पहले से मौजूद तनाव को और गहरा कर दिया है। दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह बढ़ता दबाव किसी नए समझौते की जमीन तैयार करेगा या फिर अमेरिका और ईरान के रिश्ते एक बार फिर टकराव के खतरनाक मोड़ की ओर बढ़ेंगे।