नई दिल्ली,3 फरवरी (युआईटीवी)- प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को एक बार फिर सुनवाई करने जा रहा है, जिसमें पश्चिम बंगाल सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ईडी का दावा है कि हाल ही में राजनीतिक परामर्श देने वाली फर्म इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पैक) के कार्यालय और इसके सह-संस्थापक प्रतीक जैन के कोलकाता स्थित आवास पर की गई तलाशी के दौरान राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन ने केंद्रीय एजेंसी के काम में दखल दिया। यह मामला केंद्र और राज्य के बीच बढ़ते टकराव की एक और कड़ी के रूप में देखा जा रहा है,जिस पर देश की सर्वोच्च अदालत की नजर टिकी हुई है।
सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित कॉज लिस्ट के अनुसार, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। इससे पहले भी इस याचिका पर सुनवाई हो चुकी है और अदालत ने इसे गंभीर प्रकृति का मामला मानते हुए कई अहम अंतरिम आदेश दिए थे। ईडी ने अपनी याचिका में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी,पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और कोलकाता पुलिस कमिश्नर के खिलाफ एक साथ तलाशी अभियान के दौरान कानूनी कर्तव्यों में बाधा डालने के आरोप में एफआईआर दर्ज करने की माँग की है।
ईडी का आरोप है कि जब उसके अधिकारी आई-पैक के दफ्तर और प्रतीक जैन के घर पर तलाशी ले रहे थे,उस दौरान राज्य पुलिस और प्रशासन ने न सिर्फ हस्तक्षेप किया,बल्कि अधिकारियों को डराया-धमकाया गया और उनके वैधानिक कार्यों में रुकावट डाली गई। केंद्रीय एजेंसी का कहना है कि यह सीधा-सीधा कानून के शासन को चुनौती देने जैसा है और यदि इस तरह के मामलों पर समय रहते रोक नहीं लगी,तो जाँच एजेंसियों का स्वतंत्र रूप से काम करना मुश्किल हो जाएगा।
पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीर मानते हुए पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर पर रोक लगा दी थी। अदालत ने कहा था कि याचिकाएँ केंद्रीय जाँच में राज्य एजेंसियों द्वारा कथित हस्तक्षेप से जुड़े बेहद गंभीर सवाल उठाती हैं,जिन पर गहन विचार जरूरी है। इसी के साथ अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि वह इस मामले को केवल एक सामान्य प्रशासनिक विवाद के तौर पर नहीं देख रही है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी करते हुए जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने उन्हें अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया था। साथ ही,मामले को आगे की सुनवाई के लिए 3 फरवरी को सूचीबद्ध किया गया था,जिसे अब मंगलवार को सुना जाएगा। अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में यह भी निर्देश दिया था कि तलाशी वाले परिसरों और उनके आसपास के इलाकों की सीसीटीवी फुटेज तथा अन्य डिजिटल स्टोरेज डिवाइस को सुरक्षित रखा जाए,ताकि भविष्य में किसी भी तरह के साक्ष्य से छेड़छाड़ का आरोप न लगे।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर विशेष जोर दिया था कि प्रथम दृष्टया यह मामला केवल एक तलाशी अभियान तक सीमित नहीं है,बल्कि इसमें केंद्रीय एजेंसियों की जाँच में राज्य सरकार के कथित हस्तक्षेप का बड़ा सवाल शामिल है। अदालत ने चेतावनी दी थी कि यदि इस तरह के मामलों को अनसुलझा छोड़ दिया गया,तो इससे एक या एक से अधिक राज्यों में अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है,जो संघीय ढाँचे के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
ईडी की ओर से अदालत में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पिछली सुनवाई में इस घटना को लोकतंत्र के लिए एक गंभीर खतरा बताया था। उन्होंने कहा था कि यह ऐसा मामला है,जहाँ लोकतंत्र की जगह भीड़तंत्र ने ले ली है। मेहता ने आरोप लगाया कि केंद्रीय एजेंसी के अधिकारियों को खुलेआम घेर लिया गया,उन्हें डराया गया और उनके कानूनी कर्तव्यों का पालन करने से रोका गया। उनके मुताबिक,यदि किसी राज्य में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाएगा,तो पूरे देश में जाँच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो जाएँगे।
दूसरी ओर,पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने ईडी की याचिका की स्वीकार्यता पर ही आपत्ति जताई थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका को फोरम शॉपिंग का मामला बताया और तर्क दिया कि ईडी के पास कलकत्ता हाई कोर्ट में पर्याप्त कानूनी उपाय उपलब्ध थे। सिंघवी ने यह भी कहा कि इसी तरह की याचिकाएँ पहले से ही हाई कोर्ट में लंबित हैं,ऐसे में सीधे सुप्रीम कोर्ट का रुख करना उचित नहीं है।
राज्य सरकार का पक्ष यह रहा है कि ईडी अपनी कार्रवाई को लेकर तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है और यह मामला राजनीतिक रंग ले चुका है। वहीं,ईडी का कहना है कि यह राजनीतिक नहीं बल्कि कानून के शासन से जुड़ा मामला है,जहाँ एक केंद्रीय जाँच एजेंसी को अपना काम करने से रोका गया।
इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को बेहद अहम माना जा रहा है,क्योंकि इसका असर सिर्फ पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा। यह फैसला भविष्य में केंद्र और राज्यों के बीच जाँच एजेंसियों की भूमिका,अधिकार और सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। मंगलवार की सुनवाई में अदालत इस बात पर विचार कर सकती है कि क्या वास्तव में केंद्रीय एजेंसी के काम में दखल दिया गया और यदि हाँ,तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है।
ईडी बनाम पश्चिम बंगाल सरकार का यह मामला संघीय ढाँचे,कानून के शासन और जाँच एजेंसियों की स्वतंत्रता जैसे बुनियादी सवालों को सामने लाता है। अब सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं,जो इस संवेदनशील और राजनीतिक रूप से अहम मामले में आगे की दिशा तय करेगा।
