नई दिल्ली,5 फरवरी (युआईटीवी)- वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत अहम बन चुके क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन को सुरक्षित और स्थिर बनाने को लेकर भारत ने एक बार फिर अपना स्पष्ट रुख सामने रखा है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने बुधवार को कहा कि भारत क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति श्रृंखला में मौजूद जोखिमों को कम करने के लिए संरचित और समन्वित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का समर्थन करता है। उन्होंने यह बयान वॉशिंगटन में आयोजित ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ को संबोधित करते हुए दिया। उनका यह वक्तव्य ऐसे समय आया है,जब अमेरिका अपने सहयोगी और साझेदार देशों से वैश्विक क्रिटिकल मिनरल्स बाजार के लिए एक समन्वित ट्रेडिंग फ्रेमवर्क विकसित करने का आग्रह कर रहा है।
डॉ. जयशंकर ने अपने संबोधन में वैश्विक सप्लाई चेन में अत्यधिक एकाग्रता से उत्पन्न होने वाले खतरों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज की दुनिया में कई महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति कुछ गिने-चुने देशों या क्षेत्रों तक सीमित है,जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिरता और भू-राजनीतिक दबावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन जोखिमों को कम करने के लिए देशों के बीच केवल अस्थायी या अनौपचारिक समझौते पर्याप्त नहीं हैं,बल्कि एक दीर्घकालिक,संरचित और संस्थागत सहयोग की आवश्यकता है।
विदेश मंत्री ने इस दौरान भारत की उन पहलों का भी उल्लेख किया,जिनके जरिए देश अपनी सप्लाई चेन को मजबूत और विविधतापूर्ण बनाने की दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन का जिक्र करते हुए कहा कि भारत इस मिशन के माध्यम से घरेलू स्तर पर खनन,प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन की क्षमता बढ़ाने पर फोकस कर रहा है। इसके साथ ही उन्होंने रेयर अर्थ कॉरिडोर्स और जिम्मेदार वाणिज्य (रेस्पॉन्सिबल कमर्शियल प्रैक्टिसेज) को भी भारत की रणनीति का अहम हिस्सा बताया। जयशंकर ने क्रिटिकल मिनरल्स से जुड़ी ‘फोर्ज’ पहल के लिए भारत के समर्थन की भी पुष्टि की,जिसका उद्देश्य भरोसेमंद साझेदारियों के जरिए सप्लाई चेन को लचीला बनाना है।
जयशंकर का यह बयान अमेरिका की ओर से हाल के दिनों में तेज हुई कूटनीतिक कोशिशों के संदर्भ में काफी अहम माना जा रहा है। इसी कार्यक्रम में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने भी क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर सहयोगी देशों को एकजुट होने का आह्वान किया। वेंस ने अपने संबोधन में कहा कि आधुनिक अर्थव्यवस्थाएँ आज भी “वास्तविक चीजों” पर निर्भर हैं और क्रिटिकल मिनरल्स तेल और गैस जितने ही जरूरी हैं। उन्होंने इस धारणा को खारिज किया कि डिजिटल और सेवा आधारित अर्थव्यवस्थाओं के दौर में कच्चे संसाधनों का महत्व कम हो गया है।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने चेतावनी दी कि मौजूदा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ न केवल कमजोर हो चुकी हैं,बल्कि कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित भी हैं। उनके मुताबिक,यही एकाग्रता कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव और आपूर्ति में व्यवधान की बड़ी वजह है। उन्होंने कहा, “क्रिटिकल मिनरल्स से ज्यादा वास्तविक कुछ नहीं है” और यह भी जोड़ा कि अगर इन संसाधनों की सप्लाई सुरक्षित नहीं की गई,तो ऊर्जा संक्रमण,इलेक्ट्रिक वाहन,सेमीकंडक्टर और रक्षा जैसे क्षेत्रों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
वेंस ने कीमतों में अस्थिरता और बाजार में मौजूद विकृतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि क्रिटिकल मिनरल्स के बाजार में अचानक सप्लाई बढ़ने या घटने से कीमतें तेजी से बदल जाती हैं,जिससे दीर्घकालिक निवेश करना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने ऐसे कई उदाहरणों का जिक्र किया,जहाँ अचानक बाजार में सप्लाई बढ़ने से कीमतें गिर गईं और खनन व प्रोसेसिंग से जुड़ी परियोजनाएँ आर्थिक रूप से अव्यवहारिक हो गईं। इसका नतीजा यह हुआ कि निवेशक पीछे हट गए और भविष्य की आपूर्ति और भी अनिश्चित हो गई।
अपने संबोधन में वेंस ने इस बात पर भी जोर दिया कि बैठक में शामिल देश मिलकर वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के करीब दो-तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके अनुसार,इतनी बड़ी आर्थिक शक्ति रखने वाले देश अगर सामूहिक रूप से कदम उठाएँ,तो वे वैश्विक क्रिटिकल मिनरल्स बाजार की कार्यप्रणाली को बदलने की क्षमता रखते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा, “हम सभी एक ही टीम में हैं” और सहयोगी देशों से प्रतिस्पर्धा के बजाय साझेदारी का रास्ता अपनाने की अपील की।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने एक महत्वाकांक्षी प्रस्ताव रखते हुए सहयोगी और साझेदार देशों के बीच क्रिटिकल मिनरल्स के लिए एक प्राथमिक व्यापार क्षेत्र यानी प्रेफरेंशियल ट्रेड जोन बनाने की बात कही। उनके मुताबिक,यह जोन बाहरी व्यवधानों से सुरक्षित रहेगा और उत्पादन के हर चरण पर तय संदर्भ कीमतों पर आधारित होगा। उन्होंने बताया कि ये संदर्भ कीमतें न्यूनतम स्तर के रूप में काम करेंगी,जिन्हें समायोज्य शुल्क या टैरिफ के जरिए लागू किया जाएगा। इसका उद्देश्य घरेलू उत्पादकों को नुकसान पहुँचाने वाली डंपिंग जैसी प्रथाओं को रोकना है।
वेंस ने कहा कि अमेरिका चाहता है कि सहयोगी और साझेदार देश मिलकर एक ऐसा ट्रेडिंग ब्लॉक बनाएँ,जो पारदर्शी,भरोसेमंद और दीर्घकालिक निवेश के लिए अनुकूल हो। उनके अनुसार,इस पहल से न केवल कीमतों में स्थिरता आएगी,बल्कि निजी निवेश को भी प्रोत्साहन मिलेगा और कंपनियाँ लंबी अवधि की योजना बना सकेंगी। इसके अलावा,आपात स्थितियों में क्रिटिकल मिनरल्स की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी इस प्रस्तावित व्यवस्था का एक अहम लक्ष्य है।
वॉशिंगटन में हुई इस बैठक ने यह साफ कर दिया है कि क्रिटिकल मिनरल्स अब केवल आर्थिक या औद्योगिक मुद्दा नहीं रह गए हैं,बल्कि वे रणनीतिक और भू-राजनीतिक महत्व भी हासिल कर चुके हैं। भारत की ओर से संरचित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर दिया गया जोर और अमेरिका की ओर से प्रस्तावित ट्रेडिंग ब्लॉक,आने वाले समय में वैश्विक सप्लाई चेन की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
