वॉशिंगटन,5 फरवरी (युआईटीवी)- वैश्विक भू-राजनीति और आर्थिक सुरक्षा के बदलते परिदृश्य में भारत और अमेरिका के रिश्तों को एक नई मजबूती मिलती दिख रही है। अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी के हालिया बयान ने साफ कर दिया है कि आने वाले समय में भारत,अमेरिका की महत्वाकांक्षी ‘पैक्स सिलिका’ पहल और उसकी व्यापक क्रिटिकल मिनरल्स रणनीति का एक केंद्रीय स्तंभ बनने जा रहा है। यह केवल द्विपक्षीय सहयोग की बात नहीं है,बल्कि वैश्विक खनिज सप्लाई चेन को सुरक्षित,भरोसेमंद और विविधतापूर्ण बनाने की दिशा में एक बड़ा भू-रणनीतिक कदम माना जा रहा है।
अमेरिकी आर्थिक मामलों के अवर सचिव जैकब हेलबर्ग ने बताया कि भारत इस महीने के आखिर तक औपचारिक रूप से पैक्स सिलिका फ्रेमवर्क में शामिल हो जाएगा। उनके मुताबिक,वॉशिंगटन लंबे समय से भारत की इस पहल में एंट्री का इंतजार कर रहा था। हेलबर्ग ने यह भी संकेत दिया कि भारत की भागीदारी से न केवल अमेरिका-भारत सहयोग को नया मोमेंटम मिलेगा,बल्कि दोनों देश मिलकर ऐसे संयुक्त प्लान्स पर काम कर सकेंगे जो आर्थिक रूप से फायदेमंद होने के साथ-साथ रणनीतिक रूप से भी एक-दूसरे को मजबूत करेंगे।
दरअसल,यह बयान ऐसे समय आया है,जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर एक ऐतिहासिक मंत्रिस्तरीय बैठक की मेजबानी की। इस बैठक में भारत समेत करीब 50 देशों के नेता और प्रतिनिधि शामिल हुए। भारत की ओर से विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने इस महत्वपूर्ण बैठक में हिस्सा लिया। इसे अमेरिकी विदेश विभाग के इतिहास की सबसे बड़ी मंत्रिस्तरीय बैठक बताया जा रहा है,जो इस बात का संकेत है कि अब आर्थिक सुरक्षा को सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है।
हेलबर्ग ने अपने बयान में भारत की तकनीकी क्षमता और मानव संसाधन की खास तौर पर सराहना की। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रतिभा की चौड़ाई और गहराई के मामले में भारत शायद चीन के अलावा अकेला ऐसा देश है,जो चीन को वास्तविक चुनौती दे सकता है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है,जब अमेरिका और उसके सहयोगी देश वैश्विक सप्लाई चेन में चीन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। इस संदर्भ में भारत को एक भरोसेमंद और सक्षम साझेदार के रूप में देखा जा रहा है।
पैक्स सिलिका में भारत की संभावित एंट्री को केवल एक औपचारिक कदम नहीं माना जा रहा,बल्कि इसे सेमीकंडक्टर,एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग और हाई-टेक फैब्रिकेशन इकोसिस्टम में भारत की बढ़ती भूमिका के रूप में देखा जा रहा है। पैक्स सिलिका एक अमेरिकी पहल है,जिसका मुख्य फोकस अत्याधुनिक तकनीकों,खासकर सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग और उससे जुड़े पूरे इकोसिस्टम को मजबूत करना है। भारत पहले ही सेमीकंडक्टर मिशन के जरिए इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर रहा है,ऐसे में पैक्स सिलिका में शामिल होना भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से अहम माना जा रहा है।
हेलबर्ग ने स्पष्ट किया कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को केवल एक भू-राजनीतिक इलाके के रूप में नहीं देखता,बल्कि इसे आम अमेरिकी नागरिकों की खुशहाली से भी जोड़कर देखता है। उनके शब्दों में, “आम अमेरिकियों की खुशहाली इंडो-पैसिफिक से जुड़ी है।” उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के सहयोगियों और साझेदारों के साथ मिलकर काम करने से अमेरिका न केवल भरोसेमंद और विविध सप्लाई चेन बना पा रहा है,बल्कि पारदर्शी और निष्पक्ष बाजारों के जरिए जरूरी खनिजों तक स्थायी पहुँच भी सुनिश्चित कर रहा है।
वैश्विक सप्लाई चेन में हाल के वर्षों में आई रुकावटों ने दुनिया को यह एहसास कराया है कि मौजूदा मॉडल अब अपने मकसद के लिए पर्याप्त नहीं रह गया है। कोविड-19 महामारी,यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने यह दिखा दिया कि किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कितनी जोखिम भरी हो सकती है। हेलबर्ग ने कहा कि अमेरिका और उसके साझेदार देश ऐसी सप्लाई चेन तैयार करने की दिशा में काम कर रहे हैं,जो भरोसेमंद विफलताओं,कीमतों पर अनावश्यक दबाव और अचानक आने वाली रुकावटों से मुक्त हों। इसका उद्देश्य औद्योगिक शटडाउन और बढ़ती लागत को रोकना है,जो क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि के लिए खतरा बन सकते हैं।
इस पूरे परिदृश्य में भारत की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हेलबर्ग के मुताबिक,भारत के पास पहले से ही खनिज प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग की काफी मजबूत क्षमता मौजूद है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर अमेरिका और भारत के बीच गहरे सहयोग के लिए एक मजबूत आधार बन सकता है। उन्होंने भारत की मौजूदा क्षमताओं की तुलना अमेरिका में घरेलू प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग क्षमता विकसित करने के लिए किए जा रहे तेज प्रयासों से की। अमेरिका इस दिशा में कई एजेंसियों के समन्वित प्रयास से काम कर रहा है,जिनमें वाणिज्य और व्यापार से जुड़े विभाग भी शामिल हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका न केवल पैक्स सिलिका जैसे फ्रेमवर्क पर ध्यान दे रहा है,बल्कि मिनरल सिक्योरिटी पार्टनरशिप के जरिए भी उन देशों को एक मंच पर ला रहा है,जिन्होंने अमेरिका के साथ द्विपक्षीय रेयर मिनरल्स मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पहल का मकसद अपस्ट्रीम मिनरल सिक्योरिटी से लेकर ग्लोबल सप्लाई चेन तक,हर स्तर पर सहयोग को मजबूत करना है।
हेलबर्ग ने यह भी कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई क्रांति के चलते वैश्विक स्तर पर खनिजों की माँग तेजी से बढ़ रही है। कोबाल्ट,कॉपर और निकल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की जरूरत रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच रही है। स्मार्टफोन,इलेक्ट्रिक वाहन,रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम और डेटा सेंटर जैसी आधुनिक तकनीकों के विस्तार ने इस माँग को और तेज कर दिया है। उनके मुताबिक,यह बढ़ती माँग साझेदार देशों के लिए आर्थिक विकास का एक बड़ा अवसर भी लेकर आती है,बशर्ते वे मिलकर भरोसेमंद और पारदर्शी सप्लाई चेन तैयार करें।
भारत और अमेरिका के बीच जरूरी और रणनीतिक खनिजों पर सहयोग कोई नई बात नहीं है,लेकिन हाल के वर्षों में इसमें काफी तेजी आई है। दोनों देश सप्लाई चेन को मजबूत करने,क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन को समर्थन देने और वैश्विक उत्पादन के अत्यधिक केंद्रीकरण से जुड़ी कमजोरियों को कम करने की दिशा में मिलकर काम कर रहे हैं। भारत के लिए यह सहयोग इसलिए भी अहम है क्योंकि वह एक ओर अपने औद्योगिक आधार को मजबूत करना चाहता है,वहीं दूसरी ओर वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पैक्स सिलिका में भारत की भागीदारी से सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश को बढ़ावा मिलेगा। इससे न केवल तकनीकी ट्रांसफर के नए रास्ते खुलेंगे,बल्कि रोजगार सृजन और कौशल विकास को भी गति मिलेगी। साथ ही,यह कदम भारत को वैश्विक टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन में एक भरोसेमंद और अपरिहार्य भागीदार के रूप में स्थापित करने में मदद कर सकता है।
अमेरिका की पैक्स सिलिका पहल और क्रिटिकल मिनरल्स रणनीति में भारत की भूमिका केवल द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं है। यह कदम वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में हो रहे बड़े बदलावों का संकेत देता है,जहाँ सुरक्षा,तकनीक और अर्थव्यवस्था आपस में गहराई से जुड़ते जा रहे हैं। भारत के लिए यह एक अवसर है कि वह अपनी मौजूदा क्षमताओं का लाभ उठाते हुए वैश्विक मंच पर अपनी रणनीतिक और आर्थिक हैसियत को और मजबूत करे,जबकि अमेरिका के लिए भारत एक ऐसा साझेदार है जो भरोसे,क्षमता और दीर्घकालिक दृष्टि के आधार पर वैश्विक सप्लाई चेन को नया आकार देने में अहम भूमिका निभा सकता है।
