नई दिल्ली,6 फरवरी (युआईटीवी)- भारतीय क्रिकेट प्रशासन से जुड़ी एक अहम और लंबे समय से चर्चा में रही कानूनी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता,हिमाचल प्रदेश से सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर को बड़ी राहत दी है। शीर्ष अदालत ने बीसीसीआई में किसी भी पद को सँभालने पर अनुराग ठाकुर पर लगाए गए प्रतिबंध को समाप्त कर दिया है। इसके साथ ही वर्ष 2017 में पारित अपने आदेश में संशोधन करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि यह प्रतिबंध आजीवन अयोग्यता के रूप में नहीं था और न ही अदालत का ऐसा कोई इरादा रहा है।
इस फैसले के बाद अनुराग ठाकुर एक बार फिर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई से जुड़े कार्यों और बैठकों में हिस्सा ले सकेंगे। माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न सिर्फ अनुराग ठाकुर के लिए बल्कि भारतीय क्रिकेट के प्रशासनिक ढांचे के लिए भी एक अहम मोड़ साबित हो सकता है,क्योंकि इससे लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों और उनके क्रियान्वयन को लेकर चली आ रही सख्ती के स्वरूप पर भी नए सिरे से बहस शुरू हो सकती है।
गौरतलब है कि वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस आर.एम. लोढ़ा की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों को लागू न करने के आरोप में अनुराग ठाकुर को बीसीसीआई अध्यक्ष पद से हटा दिया था। उस समय अनुराग ठाकुर बीसीसीआई के अध्यक्ष थे और उन पर यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने अदालत को यह आश्वासन दिया था कि लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लागू किया जाएगा,लेकिन बाद में ऐसा नहीं हुआ। इसी आधार पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर की अगुआई वाली पीठ ने उन्हें बीसीसीआई की सभी गतिविधियों से अलग रहने का आदेश दिया था।
लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों में क्रिकेट प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए कई सख्त प्रावधान शामिल थे। इनमें आयु सीमा तय करना,एक व्यक्ति को एक से अधिक पद न देने का नियम,सरकारी पद पर रहते हुए बीसीसीआई में पद न सँभालने जैसे नियम शामिल थे। इन सिफारिशों को लेकर बीसीसीआई और सुप्रीम कोर्ट के बीच लंबे समय तक खींचतान चली,जिसका असर कई बड़े क्रिकेट प्रशासकों के करियर पर पड़ा। अनुराग ठाकुर का नाम भी उन्हीं में प्रमुख रूप से शामिल रहा।
हालिया सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनवरी 2017 में जो आदेश पारित किया गया था,उसका उद्देश्य अनुराग ठाकुर को आजीवन प्रतिबंधित करना नहीं था। अदालत ने कहा कि उस समय परिस्थितियों को देखते हुए यह आदेश दिया गया था और इसे स्थायी अयोग्यता के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि अनुराग ठाकुर पहले ही बिना शर्त माफी माँग चुके थे,जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया था। ऐसे में सात-आठ साल बाद भी प्रतिबंध को जारी रखना न तो न्यायसंगत है और न ही आवश्यक।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को अनुराग ठाकुर के लिए एक बड़ी नैतिक और राजनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में वह सक्रिय राजनीति में बने रहे और केंद्र सरकार में मंत्री पद भी संभाल चुके हैं। हालांकि बीसीसीआई से जुड़े किसी भी आधिकारिक पद से वह दूर रहे। अब प्रतिबंध हटने के बाद उनके लिए क्रिकेट प्रशासन में वापसी का रास्ता साफ हो गया है।
इस फैसले के बाद यह अटकलें भी तेज हो गई हैं कि भविष्य में अनुराग ठाकुर बीसीसीआई या किसी राज्य क्रिकेट संघ में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हालाँकि,अभी इस बारे में उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई बयान नहीं दिया है। दूसरी ओर,क्रिकेट जगत और प्रशासनिक हलकों में इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे न्यायिक संतुलन का उदाहरण बता रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि इससे लोढ़ा कमेटी की सख्ती की भावना कमजोर हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय क्रिकेट प्रशासन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज किया जाएगा। यह न केवल अनुराग ठाकुर के लिए एक नई शुरुआत का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि अदालतें समय और परिस्थितियों के अनुसार अपने पुराने आदेशों की समीक्षा करने से पीछे नहीं हटतीं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले का भारतीय क्रिकेट की राजनीति और प्रशासनिक संरचना पर क्या प्रभाव पड़ता है।
