नई दिल्ली,9 फरवरी (युआईटीवी)- ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने वॉशिंगटन को कड़ा संदेश देते हुए साफ कहा है कि ईरान ताकत की भाषा को कभी स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ईरान का सम्मान करने की अपील करते हुए कहा कि उनका देश संवाद के लिए तैयार है, लेकिन दबाव, धमकी और सैन्य शक्ति के जरिए झुकाया नहीं जा सकता। पेजेश्कियन का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे पर बातचीत का दूसरा दौर अगले सप्ताह ओमान में होने वाला है।
राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने बयान में कहा कि ईरान की परमाणु नीति नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी यानी एनपीटी के तहत तय अधिकारों पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम संवर्धन जारी रखने का पूरा अधिकार है और इस अधिकार पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने लिखा कि ईरानी राष्ट्र ने हमेशा सम्मान का जवाब सम्मान से दिया है,लेकिन वह कभी भी दबाव और ताकत की भाषा को बर्दाश्त नहीं कर सकता।
ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ओमान में हुए पहले चरण की बातचीत के बाद आया है,जिसे उन्होंने एक सकारात्मक कदम बताया। पेजेश्कियन ने कहा कि उनका प्रशासन कूटनीति और बातचीत के रास्ते को खुला रखना चाहता है,बशर्ते बातचीत बराबरी और आपसी सम्मान के आधार पर हो। उन्होंने संकेत दिया कि ईरान टकराव नहीं चाहता,लेकिन अपने अधिकारों और संप्रभुता से पीछे हटने का सवाल ही पैदा नहीं होता।
इस बीच,खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की सैन्य गतिविधियों में तेज़ी ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है। ट्रंप प्रशासन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दबाव बढ़ा रहा है,वहीं जनवरी में ईरान में हुए विरोध प्रदर्शनों पर सरकार की कार्रवाई को लेकर भी वॉशिंगटन लगातार आलोचना कर रहा है। इन घटनाक्रमों के बीच अमेरिकी सेना ने क्षेत्र में अपनी मौजूदगी को मजबूत किया है,जिसे ईरान ने एक दबाव रणनीति के तौर पर देखा है।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी सैन्य तैनाती पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका भले ही क्षेत्र में अपना सैन्य बेड़ा बढ़ा रहा हो,लेकिन इससे ईरान डरने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि ईरान ने दशकों से दबाव और प्रतिबंधों का सामना किया है और वह किसी भी धमकी से अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। अराघची ने यह भी दोहराया कि यूरेनियम संवर्धन ईरान का वैध अधिकार है और इसे छोड़े जाने का सवाल ही नहीं उठता।
अमेरिका ने जनवरी के अंत में यूएसएस अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर को अरब सागर में तैनात किया था,जिसे क्षेत्र में शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा,बीबीसी की एक रिपोर्ट में सैटेलाइट इमेज के हवाले से बताया गया है कि दर्जनभर एफ-15 फाइटर जेट,एमक्यू-9 रीपर ड्रोन और ए-10सी थंडरबोल्ट II लड़ाकू विमान जॉर्डन के मुवफ्फाक साल्टी एयर बेस पर पहुँच चुके हैं। इन तैनातियों को ईरान के आसपास निगरानी और संभावित सैन्य कार्रवाई की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
इतना ही नहीं,अमेरिकी नौसेना का यूएसएस डेल्बर्ट डी ब्लैक डिस्ट्रॉयर स्वेज नहर से लाल सागर की ओर बढ़ रहा है,जबकि एमक्यू-4सी ट्राइटन ड्रोन खाड़ी क्षेत्र में निगरानी अभियान चला रहा है। इससे पहले ई-11ए, पी-8 पोसाइडन और ई-3जी सेंट्री जैसे निगरानी विमानों की मौजूदगी की भी रिपोर्ट सामने आ चुकी है। इन सभी गतिविधियों ने ईरान-अमेरिका संबंधों में तनाव को और गहरा कर दिया है।
इन हालात के बावजूद ईरान ने साफ कर दिया है कि वह परमाणु संवर्धन कार्यक्रम पर कोई समझौता नहीं करेगा। विदेश मंत्री अराघची ने तेहरान फोरम में कहा कि ईरान इस मुद्दे पर इतना जोर इसलिए देता है क्योंकि यह उसके वैज्ञानिक,तकनीकी और संप्रभु अधिकारों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि भले ही युद्ध की धमकी दी जाए,ईरान अपने संवर्धन कार्यक्रम को छोड़ने वाला नहीं है। उनके इस बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि ईरान किसी भी कीमत पर दबाव में आकर फैसला नहीं करेगा।
दूसरी ओर,अमेरिका ने ईरान के आंतरिक हालात को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया है। वॉशिंगटन ने हाल ही में ईरान में हुए विरोध प्रदर्शनों पर सरकार की कार्रवाई की निंदा की है। रिपोर्ट के मुताबिक,इन प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में तीन सुधारवादी नेताओं को गिरफ्तार किया गया है,जबकि नोबेल शांति पुरस्कार विजेता नरगिस मोहम्मदी को सजा सुनाई गई है। अमेरिका ने इन कदमों को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताते हुए ईरानी सरकार की आलोचना की है।
ईरान की ओर से इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा गया है कि यह उसके आंतरिक मामलों में दखल है और अमेरिका ऐसे मुद्दों का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए कर रहा है। तेहरान का कहना है कि मानवाधिकारों पर उपदेश देने से पहले अमेरिका को अपने रिकॉर्ड पर भी नजर डालनी चाहिए।
ओमान में होने वाली परमाणु वार्ता से पहले दोनों देशों के बीच बयानबाजी और सैन्य गतिविधियों ने माहौल को बेहद तनावपूर्ण बना दिया है। जहाँ ईरान सम्मान और बराबरी के आधार पर बातचीत की बात कर रहा है,वहीं अमेरिका दबाव और प्रतिबंधों की नीति को जारी रखे हुए है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ओमान में होने वाली बातचीत तनाव कम करने की दिशा में कोई ठोस रास्ता निकाल पाती है या फिर दोनों देशों के रिश्ते और अधिक टकराव की ओर बढ़ते हैं।
