नई दिल्ली,9 फरवरी (युआईटीवी)- पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन—एसआईआर) को लेकर जारी सियासी और कानूनी खींचतान अब अपने निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ती दिख रही है। इसी क्रम में उच्चतम न्यायालय बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करेगा। यह मामला इसलिए भी असाधारण माना जा रहा है क्योंकि सूत्रों के अनुसार,कानून की डिग्री रखने वाली ममता बनर्जी अदालत की अनुमति मिलने पर स्वयं सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रख सकती हैं। यदि ऐसा होता है,तो वह सर्वोच्च न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से बहस करने वाली देश की पहली मौजूदा मुख्यमंत्री बन सकती हैं।
यह याचिका 28 जनवरी को दाखिल की गई थी,जिसमें ममता बनर्जी ने भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) द्वारा पश्चिम बंगाल में कराए जा रहे एसआईआर को चुनौती दी है। मुख्यमंत्री का आरोप है कि यह प्रक्रिया मनमानी,खामियों से भरी और राजनीतिक रूप से प्रेरित है,जिसका असर आगामी चुनावों की निष्पक्षता पर पड़ सकता है। ममता बनर्जी पहले ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पत्र लिखकर चुनाव से ठीक पहले राज्य में इस तरह के पुनरीक्षण पर रोक लगाने की माँग कर चुकी हैं।
कानूनी पृष्ठभूमि की बात करें तो ममता बनर्जी ने कोलकाता के जोगेश चंद्र चौधरी विधि महाविद्यालय से कानून की पढ़ाई पूरी की है। ‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के मुताबिक,वह एलएलबी डिग्रीधारी हैं और आखिरी बार 2003 में वकील के तौर पर काम करने की जानकारी सामने आई थी। ऐसे में उनका स्वयं अदालत में खड़े होकर दलीलें देना न केवल कानूनी दृष्टि से दिलचस्प है,बल्कि राजनीतिक संदेश के लिहाज से भी काफी अहम माना जा रहा है।
बुधवार को होने वाली सुनवाई को पश्चिम बंगाल की भावी राजनीति और आगामी चुनावों की निष्पक्षता के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत,न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। इस पीठ के समक्ष मोस्तरी बानू और तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन तथा डोला सेन द्वारा दायर तीन अन्य याचिकाएँ भी सूचीबद्ध हैं,जिनमें एसआईआर की प्रक्रिया और उसके संभावित प्रभावों पर सवाल उठाए गए हैं।
ममता बनर्जी की याचिका में भारतीय चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पक्षकार बनाया गया है। उनका तर्क है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की मौजूदा प्रक्रिया से बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जाने का खतरा है,जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो सकता है। मुख्यमंत्री का यह भी कहना है कि राज्य में पहले से ही मतदाता सूची का नियमित पुनरीक्षण होता रहा है,ऐसे में चुनाव से ठीक पहले विशेष अभियान चलाना संदेह पैदा करता है।
इससे पहले 19 जनवरी को उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में चल रही एसआईआर प्रक्रिया को लेकर कुछ अहम निर्देश जारी किए थे। अदालत ने स्पष्ट कहा था कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए और किसी भी मतदाता को अनावश्यक असुविधा नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया था कि यदि किसी व्यक्ति का नाम सूची से हटाया जाता है तो उसे पर्याप्त अवसर और जानकारी दी जानी चाहिए,ताकि वह अपने अधिकारों की रक्षा कर सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी का स्वयं सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित होना और संभवतः बहस करना,तृणमूल कांग्रेस के लिए एक मजबूत राजनीतिक संदेश होगा। इससे वह यह दिखाना चाहती हैं कि उनकी सरकार मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। साथ ही,यह कदम केंद्र और चुनाव आयोग के खिलाफ उनकी लड़ाई को और मुखर बना सकता है।
दूसरी ओर,चुनाव आयोग का पक्ष है कि विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन रखना है,ताकि फर्जी या दोहरे नाम हटाए जा सकें। आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया कानून के दायरे में और निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुसार ही की जा रही है।
अब सभी की निगाहें बुधवार की सुनवाई पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या रुख अपनाता है और क्या ममता बनर्जी को स्वयं बहस करने की अनुमति मिलती है। जो भी फैसला आए,उसका असर न केवल पश्चिम बंगाल की राजनीति पर पड़ेगा,बल्कि देशभर में चुनावी प्रक्रियाओं और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर एक अहम मिसाल भी कायम कर सकता है।
