राहुल गांधी (तस्वीर क्रेडिट@Panther7112)

पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की अप्रकाशित किताब पर संसद में संग्राम,राहुल गांधी का सरकार और पेंगुइन पर तीखा हमला

नई दिल्ली,10 फरवरी (युआईटीवी)- पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे के अप्रकाशित संस्मरणों को लेकर संसद में जारी गतिरोध मंगलवार को और तीखा हो गया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार और पुस्तक के प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया पर सीधे तौर पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि सत्ता पक्ष एक “असुविधाजनक सच्चाई” को सामने आने से रोकने की कोशिश कर रहा है। राहुल गांधी ने दावा किया कि यह संस्मरण पहले ही सार्वजनिक डोमेन में हैं और सरकार इसे दबाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है।

मंगलवार को लोकसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित होने और अंततः स्थगित होने के बाद राहुल गांधी ने संसद परिसर में मीडिया से बात की। उन्होंने कहा कि जनरल नरवणे की किताब को लेकर जो विवाद खड़ा किया जा रहा है,वह असल में सरकार की बेचैनी को दिखाता है। राहुल गांधी ने दावा किया कि यह पुस्तक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म अमेजन पर उपलब्ध है और उन्होंने इसे साबित करने की कोशिश भी की। हालांकि प्रकाशक पेंगुइन ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है,जिससे विवाद और गहरा गया है।

राहुल गांधी ने पत्रकारों के सामने 2023 में पूर्व सेना प्रमुख द्वारा किए गए एक सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि जनरल नरवणे ने उस पोस्ट में लोगों से 2020 की गलवान घाटी झड़पों से जुड़े घटनाक्रम का विवरण देने वाले अपने संस्मरण पढ़ने का आग्रह किया था। राहुल गांधी ने कहा कि उस पोस्ट में साफ लिखा था कि लोग लिंक पर क्लिक कर किताब पढ़ सकते हैं। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “बस लिंक पर क्लिक करें और पढ़ सकते हैं,जय हिंद। अब या तो पेंगुइन झूठ बोल रहा है या फिर पूर्व सेना प्रमुख। दोनों सही नहीं हो सकते।”

पिछले एक सप्ताह से अधिक समय से लोकसभा में जनरल नरवणे की किताब को लेकर लगातार हंगामा हो रहा है। विपक्ष इस किताब में किए गए कथित “खुलासों” पर चर्चा की माँग कर रहा है,जबकि सरकार इसे सदन के भीतर उठने से रोकने पर अड़ी हुई है। विपक्ष का आरोप है कि पुस्तक में गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुए सैन्य गतिरोध से जुड़े ऐसे तथ्य हैं,जो सरकार की आधिकारिक लाइन से मेल नहीं खाते और जिनसे सत्ता पक्ष असहज है।

सोमवार को विवाद उस समय और बढ़ गया जब राहुल गांधी ने संसद के बाहर मीडिया के सामने पुस्तक की एक प्रति लहराई। इस कदम के बाद सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और तेज हो गया। सत्ता पक्ष ने इसे सदन की गरिमा के खिलाफ बताया,जबकि विपक्ष ने कहा कि यह सरकार की सच्चाई छिपाने की कोशिशों के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध था। इसके बाद से दोनों पक्षों के बीच बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला लगातार जारी है।

राहुल गांधी ने इस पूरे मामले में खुलकर जनरल नरवणे का समर्थन करते हुए कहा कि वह पूर्व सेना प्रमुख के साथ मजबूती से खड़े हैं। उन्होंने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हुए कहा, “मैं नरवणे पर विश्वास करता हूँ,पेंगुइन पर नहीं। क्या आप पेंगुइन के बजाय नरवणे पर विश्वास करेंगे?” राहुल गांधी के इस बयान को सरकार के लिए सीधी चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है,क्योंकि इसमें उन्होंने न केवल प्रकाशक की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया,बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से सरकार पर भी सच्चाई दबाने का आरोप लगाया।

विपक्षी नेताओं का कहना है कि इस किताब में कई ऐसे तथ्य हैं,जो सरकार के लिए असहज हैं और जिनसे गलवान गतिरोध को लेकर सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े हो सकते हैं। उनका दावा है कि इसी वजह से सरकार इस मुद्दे को संसद में उठने नहीं देना चाहती और कार्यवाही को बार-बार बाधित कर रही है। विपक्ष का आरोप है कि संसद में चर्चा से बचना दरअसल देश को पूरी सच्चाई से दूर रखने की कोशिश है।

इस बढ़ते विवाद के बीच प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने आधिकारिक बयान जारी कर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है। पेंगुइन ने कहा है कि पुस्तक की कोई भी प्रति न तो मुद्रित रूप में और न ही डिजिटल रूप में प्रकाशित,वितरित या बेची गई है और न ही किसी अन्य तरीके से जनता के लिए उपलब्ध कराई गई है। प्रकाशक ने अपने बयान में साफ कहा कि भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे द्वारा लिखित आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ के प्रकाशन अधिकार उनके पास हैं,लेकिन पुस्तक का प्रकाशन अभी तक नहीं हुआ है।

पेंगुइन के इस बयान के बाद विवाद और उलझ गया है। एक तरफ राहुल गांधी यह दावा कर रहे हैं कि किताब सार्वजनिक डोमेन में है,वहीं दूसरी तरफ प्रकाशक इसे पूरी तरह अप्रकाशित बता रहा है। इस विरोधाभास ने संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर सच्चाई क्या है और किसके दावे पर भरोसा किया जाए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल एक किताब तक सीमित नहीं है,बल्कि इसके केंद्र में 2020 का गलवान घाटी गतिरोध है,जो आज भी एक संवेदनशील राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दा बना हुआ है। विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेरने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहता,जबकि सरकार इसे राष्ट्रीय हित और सुरक्षा से जोड़कर संसद में विस्तृत चर्चा से बचने की कोशिश कर रही है।

फिलहाल,जनरल नरवणे की किताब को लेकर संसद में जारी गतिरोध थमने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। राहुल गांधी के ताजा हमलों और पेंगुइन के स्पष्टीकरण के बाद यह मामला और भी राजनीतिक रंग ले चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार और विपक्ष इस टकराव को किस दिशा में ले जाते हैं और क्या संसद में गलवान घाटी से जुड़े तथ्यों पर कभी खुलकर चर्चा हो पाएगी या नहीं।