नई दिल्ली,11 फरवरी (युआईटीवी)- भारतीय वायु सेना और थाईलैंड की रॉयल थाई एयर फोर्स के बीच एक महत्वपूर्ण संयुक्त वायु अभ्यास की शुरुआत हुई है,जिसे दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी का मजबूत संकेत माना जा रहा है। इस अभ्यास में अत्याधुनिक लड़ाकू विमान,निगरानी प्रणाली से लैस विमान और हवा में ईंधन भरने वाले विमान भाग ले रहे हैं। आसमान में चल रहे इस समन्वित सैन्य प्रदर्शन का उद्देश्य संचालनात्मक तालमेल को बेहतर बनाना और दोनों वायु सेनाओं के बीच इंटरऑपरेबिलिटी को सुदृढ़ करना है।
भारतीय वायु सेना के अनुसार,यह संयुक्त अभ्यास केवल एक औपचारिक सैन्य गतिविधि नहीं,बल्कि व्यावहारिक स्तर पर क्षमताओं के आदान-प्रदान और सामरिक समन्वय को बढ़ाने का अवसर है। भारतीय पक्ष से इस अभ्यास में सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान शामिल हैं,जो लंबी दूरी की मारक क्षमता और बहु-भूमिका संचालन के लिए जाने जाते हैं। इनके साथ एयरबॉर्न वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम यानी एडब्लूएसीएस भी तैनात है,जो हवा में निगरानी और कमांड एंड कंट्रोल की भूमिका निभाता है। इसके अतिरिक्त आईएल-78 मिड-एयर रिफ्यूलिंग विमान भी हिस्सा ले रहा है,जो लड़ाकू विमानों को उड़ान के दौरान ईंधन उपलब्ध कराकर उनकी परिचालन सीमा को बढ़ाता है।
दूसरी ओर,थाईलैंड की रॉयल थाई एयर फोर्स अपने ग्रिपेन लड़ाकू विमानों के साथ इस अभ्यास में भाग ले रही है। ग्रिपेन आधुनिक एवियोनिक्स,तेज प्रतिक्रिया क्षमता और बहुउद्देश्यीय संचालन के लिए जाना जाता है। इन विमानों की मौजूदगी से संयुक्त अभ्यास में विभिन्न युद्धक परिदृश्यों का अभ्यास संभव हो पा रहा है। दोनों देशों के पायलट और तकनीकी दल एक-दूसरे की कार्यप्रणाली,संचार प्रणाली और सामरिक रणनीतियों को समझने का अवसर प्राप्त कर रहे हैं।
रक्षा सूत्रों का कहना है कि इस प्रकार के अभ्यासों का उद्देश्य केवल युद्धाभ्यास करना नहीं होता,बल्कि वास्तविक परिस्थितियों में सामरिक तैयारी का आकलन करना भी होता है। आधुनिक युद्ध के परिदृश्य में बहुराष्ट्रीय सहयोग और त्वरित समन्वय बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। ऐसे में भारत और थाईलैंड के बीच यह अभ्यास क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के बीच इस तरह की साझेदारियाँ रणनीतिक महत्व रखती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस अभ्यास से दोनों देशों की वायु सेनाओं को एक-दूसरे की ताकत और क्षमताओं को करीब से समझने का मौका मिलेगा। इससे भविष्य में किसी संयुक्त मानवीय सहायता,आपदा राहत या सुरक्षा अभियान के दौरान बेहतर तालमेल स्थापित किया जा सकेगा। साथ ही,यह अभ्यास सैन्य कूटनीति का भी एक सशक्त माध्यम है,जो मित्र देशों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ाता है।
भारत और थाईलैंड के बीच रक्षा सहयोग कोई नई बात नहीं है। इससे पहले दोनों देशों की सेनाएँ संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘मैत्री’ में हिस्सा ले चुकी हैं। मेघालय के उमरोई में आयोजित उस अभ्यास में आतंकवाद-रोधी अभियानों और बंधक मुक्ति जैसे जटिल परिदृश्यों का प्रशिक्षण दिया गया था। एक अभ्यास के तहत बस को अपहरणकर्ताओं से मुक्त कराने की कार्रवाई का प्रदर्शन किया गया था,जिसमें संयुक्त सैन्य हस्तक्षेप की रणनीति अपनाई गई। इसके अलावा आतंकियों के कब्जे वाले कमरों में प्रवेश कर खतरों को समाप्त करने का अभ्यास भी किया गया था।
‘मैत्री’ अभ्यास के दौरान दोनों देशों के सैनिकों ने रॉक क्राफ्ट ट्रेनिंग के तहत दुर्गम और ऊंचे स्थानों पर चढ़ाई का प्रशिक्षण लिया था। जंगल सर्वाइवल ड्रिल्स में कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीवित रहने और संचालन की तकनीक सिखाई गई थी। इन अभ्यासों ने जमीनी स्तर पर सैन्य सहयोग को मजबूत किया था,वहीं वर्तमान वायु अभ्यास आसमान में सामरिक तालमेल की नई मिसाल पेश कर रहा है।
समुद्री क्षेत्र में भी भारत और थाईलैंड के बीच सहयोग बढ़ता रहा है। हाल ही में भारतीय नौसेना की दक्षिणी नौसैनिक कमान से समुद्र-विज्ञान अनुसंधान पोत आईएनएस सागरध्वनि थाईलैंड गया था। यह पोत रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के नौसैनिक भौतिक एवं समुद्र-विज्ञान प्रयोगशाला के अंतर्गत आता है। यह यात्रा ‘सागर मैत्री’ पहल का हिस्सा थी,जो भारत सरकार के ‘महासागर’ विजन के अनुरूप है। इस पहल का उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के साथ सामाजिक-आर्थिक और वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देना है,विशेष रूप से समुद्र-विज्ञान अनुसंधान में सहभागिता को सुदृढ़ करना।
इन सभी पहलों से स्पष्ट है कि भारत और थाईलैंड के बीच रक्षा और सामरिक संबंध लगातार गहरे होते जा रहे हैं। वर्तमान संयुक्त वायु अभ्यास इसी बढ़ती साझेदारी की कड़ी है। यह न केवल दोनों देशों की सैन्य क्षमता और पेशेवर दक्षता को बढ़ाता है,बल्कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए भी सकारात्मक संदेश देता है। आने वाले समय में ऐसे और संयुक्त अभ्यास दोनों देशों के रक्षा सहयोग को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकते हैं।
