वाशिंगटन,13 फरवरी (युआईटीवी)- अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि उसे जल्द-से-जल्द परमाणु समझौते पर सहमत होना चाहिए,अन्यथा उसे गंभीर और “बहुत दर्दनाक” परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बातचीत अनिश्चितकाल तक नहीं चल सकती और अगले एक महीने के भीतर कोई ठोस निर्णय हो जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “हमें समझौता करना ही होगा,नहीं तो स्थिति बहुत कठिन और दर्दनाक हो जाएगी। मैं ऐसा नहीं चाहता,लेकिन समझौता जरूरी है।”
ट्रंप के इस बयान को अमेरिका की दोहरी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है,जिसमें एक ओर कूटनीतिक बातचीत जारी रखने की इच्छा दिखाई दे रही है,वहीं दूसरी ओर ईरान पर स्पष्ट दबाव भी बनाया जा रहा है। जब उनसे पूछा गया कि इस प्रक्रिया की समयसीमा क्या होगी,तो उन्होंने कहा कि यह ज्यादा लंबी नहीं होनी चाहिए और ईरान को शीघ्र निर्णय लेना होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अगर वार्ता विफल होती है तो “कहानी अलग होगी” और हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।
यह बयान उस महत्वपूर्ण बैठक के एक दिन बाद आया, जो ट्रंप ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ की थी। ट्रंप ने कहा कि उनकी बैठक सकारात्मक रही और नेतन्याहू स्थिति को अच्छी तरह समझते हैं,लेकिन अंतिम फैसला उनके हाथ में है। जब उनसे यह पूछा गया कि क्या नेतन्याहू चाहते हैं कि अमेरिका ईरान के साथ बातचीत रोक दे, तो ट्रंप ने स्पष्ट किया कि वह तब तक बातचीत जारी रखेंगे,जब तक उन्हें यह सही और उपयोगी लगे।
हालाँकि,ट्रंप ने एक और सख्त संकेत देते हुए कहा कि यदि समझौता नहीं हुआ तो “फेज़ 2” शुरू किया जाएगा,जो ईरान के लिए बेहद कठोर होगा। उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस “फेज़ 2” में कौन-कौन से कदम शामिल होंगे,लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसमें आर्थिक प्रतिबंधों को और सख्त करना,कूटनीतिक दबाव बढ़ाना या क्षेत्रीय स्तर पर सैन्य उपस्थिति मजबूत करना शामिल हो सकता है। इस अस्पष्ट लेकिन कड़े बयान ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा है।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम पिछले कई वर्षों से पश्चिम एशिया में तनाव का केंद्रीय मुद्दा बना हुआ है। वर्ष 2015 में ईरान और विश्व शक्तियों के बीच हुए परमाणु समझौते को क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया था,लेकिन ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिका इस समझौते से अलग हो गया,जिसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव फिर से बढ़ गया। ईरान ने इसके बाद अपने परमाणु ईंधन संवर्धन स्तर को बढ़ाया,जिससे पश्चिमी देशों की चिंता और गहरी हो गई।
अमेरिका और ईरान के बीच यह तनाव केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं है,बल्कि इसका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। खाड़ी क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ला सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है,क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की बड़ी जरूरतें इसी क्षेत्र से पूरी करता है। यदि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव बढ़ता है,तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा सुरक्षा पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
भारत के लिए पश्चिम एशिया केवल ऊर्जा का स्रोत नहीं है,बल्कि सामरिक और मानवीय दृष्टि से भी अहम क्षेत्र है। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं और वहां की स्थिरता भारत की आर्थिक नीतियों से भी जुड़ी हुई है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी तरह की सैन्य या राजनीतिक टकराव की स्थिति भारत के लिए चिंता का विषय बन सकती है।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है,जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई मोर्चों पर तनाव जारी है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व में सुरक्षा चुनौतियाँ और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच ईरान का मुद्दा फिर से सुर्खियों में आ गया है। अमेरिका की ओर से दी गई चेतावनी यह संकेत देती है कि वॉशिंगटन कूटनीति के साथ-साथ दबाव की नीति भी अपनाए हुए है।
विश्लेषकों का मानना है कि आने वाला एक महीना निर्णायक हो सकता है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच किसी सहमति का रास्ता निकलता है,तो इससे क्षेत्रीय तनाव में कमी आ सकती है,लेकिन अगर वार्ता विफल होती है और “फेज़ 2” जैसी कठोर कार्रवाई शुरू होती है,तो इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है।
फिलहाल दुनिया की नजरें वॉशिंगटन और तेहरान पर टिकी हैं। ट्रंप के सख्त बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका इस मुद्दे पर जल्द परिणाम चाहता है। अब देखना यह होगा कि ईरान इस दबाव का किस तरह जवाब देता है और क्या कूटनीतिक रास्ता दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को कम कर पाता है या नहीं।
